दुनिया कोविड के साथ जीना सीख रही है, लेकिन चीन की तानाशाह हुकूमत वायरस को लॉकडाउन से ख़त्म करने की बेवकूफी कर रही है। इससे उसकी जनता को तो तकलीफ झेलनी ही पड़ रही है, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी ख़तरा मंडराने लगा है

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कोरोना महामारी की वजह से दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं को तगड़ी चोट पहुंची। फिर सबने धीरे-धीरे महामारी के साथ जीना सीख लिया। लेकिन अब ग्लोबल इकनॉमी दोबारा डांवाडोल हो सकती है। इसकी वजह होगी चीन की तानाशाही रवैये वाली सरकार की जीरो-कोविड स्ट्रैटजी। यह संभावित अस्थिरता पूंजीवाद और अकेले फैसला लेने वाली सरकार के विरोधाभास को उजागर करती है। इससे यह भी जाहिर होता है कि चीन जैसे देश में भी ऐसी राजनीतिक व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें जनहित को ध्यान में रखकर आर्थिक फैसले लिए जा सकें।

पहले अनुमान था कि 2021 में चीन 8.1 फ़ीसदी की दर से विकास करेगा, लेकिन आखिरी तिमाही में कोविड लॉकडाउन के चलते ग्रोथ सिर्फ 4 प्रतिशत रही। दिक्कत बस इतनी नहीं है। चीन का रियल एस्टेट सेक्टर भी चरमरा गया है। इस सेक्टर की सबसे बड़ी कंपनी एवरग्रैंड कर्ज़ के बोझ से दबी हुई है। चीनी सरकार ने नए कर्ज़ लेने से जुड़े नियमों को भी सख्त कर दिया। इन नियमों ने एवरग्रैंड जैसी दिग्गज कंपनियों को भी मौका नहीं दिया कि वे कर्ज़ से चलने वाली अपनी रणनीति को बदल सकें।

चीन ने पिछले साल तकरीबन साढ़े तीन ट्रिलियन डॉलर का निर्यात किया। इसके दम पर उसका ट्रेड सरप्लस बढ़कर 676 अरब डॉलर के हैरतंगेज स्तर पर पहुंच गया। अभी महामारी के चलते लोग घरों से बाहर नहीं निकल रहे। अभी भी घूमने-फिरने या बाहर खाने जैसे शौक पूरा करने में डर रहे हैं। इसका मतलब खर्च हो रहा है, तो चीज़ें खरीदने में। और ज़्यादातर माल बन-ठनकर चीन से ही आता है यानी अगर चीन में कोरोना की वजह से कुछ हुआ, तो उसकी मार पूरी दुनिया को झेलनी पड़ेगी।

चीन की बात करें, तो वह कोविड महामारी की शुरुआत से ही संक्रमण रोकने के लिए लॉकडाउन लगाता आ रहा है। बेशक यह रणनीति अर्थव्यवस्था पर चोट करती है, लेकिन कोविड के ख़िलाफ़ कारगर भी है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर चीन फिर से कोरोना की रोकथाम के लिए सभी शहरों में लॉकडाउन लगाता है, तो क्या होगा?

जब कोविड के चलते वुहान प्रांत पहली बार बंद हुआ, तो दक्षिण कोरिया और जापान की कार कंपनियों का प्रोडक्शन रुक गया। इनका अधिकतर माल वुहान से ही आता था। कोविड से पहले कंपनियों की इनवेंटरी घटाने की तैयारी थी। वे ज़रूरत पड़ने पर माल मंगाने वाले मॉडल पर अमल कर रही थीं। लेकिन कोविड के खौफ के बाद कच्चा माल जमा करने लगीं।

उस दौरान कंपनियां चीन से प्रोडक्शन यूनिट हटाने की बात भी करने लगी थीं। वह चीन के बाहर यानी भारत और वियतनाम जैसे देशों में भी फैक्ट्री खोलने की योजना पर काम करने लगीं, ताकि दोबारा ऐसे हालात पैदा होने पर सप्लाई पर असर न पड़े। लेकिन उसके बाद पश्चिमी देशों ने भी कोविड की रोकथाम के लिए लॉकडाउन लगाना शुरू कर दिया। तब तक चीन ने वायरस पर काबू पा लिया था और वहां प्रोडक्शन यूनिटें फिर से खुल गईं। फिर प्रोडक्शन यूनिट हटाने की बात सिर्फ बात ही बनकर रह गई।

ऐसे में एक अहम सवाल उठता है कि चीन बाकी दुनिया के अनुभव से सबक क्यों नहीं ले रहा? वह कोविड के साथ जीना नहीं सीख रहा, बल्कि वायरस जहां भी सिर उठा रहा है, वहां वह उसे पूरी ताकत से कुचलने में जुटा है। अब तो ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों ने भी जीरो-कोविड केस वाली रणनीति पर अमल करना छोड़ दिया, जबकि ये द्वीपीय देश हैं। चीन के मुक़ाबले यहां कोरोना संक्रमण की रोकथाम करना कुछ हद तक आसान हो सकता है। लेकिन जब ये देश भी कोरोना के साथ जीना सीख रहे हैं, तो फिर चीन टोटल लॉकडाउन लगाकर सप्लाई चेन को चौपट करने पर क्यों तुला है?

Chinese economy

इसका जवाब है चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की साख। अगर चीन में कोरोना के मामले बढ़ते हैं, इसका देश पर लंबे समय तक असर रहता है, तो चिनफिंग की साख पर बट्टा लगेगा। और जो नेता चाहता है कि सारी दुनिया उसे सलाम ठोके, वह भला अपनी साख पर आंच कैसे आने देगा। भले ही उसकी क़ीमत बाकी दुनिया के साथ उसके अपने लोगों को भी चुकानी पड़े।

चीन में कोविड जिस भी शहर में फन उठाता है, उसे बिना किसी नोटिस के बंद कर दिया जाता है। कोरोना संक्रमण जितना फैलने के बाद नुकसान करता, उससे ज़्यादा बर्बादी तो चिनफिंग प्रशासन अपने तानाशाही भरे फैसलों से कर रहा है। इससे सिर्फ उनकी अपनी अवाम को बेइंतहा दुख झेलना पड़ रहा है। बात बस इतनी नहीं है कि चीनी सरकार यह मान ले कि वह कोविड वायरस को ख़त्म करने के लिए जो रणनीति अपना रही है, वह ग़लत है। उसे यह भी स्वीकार करना होगा कि उसकी कोविड वैक्सीन भी पूरी तरह से कारगर नहीं।

कोविड वायरस के साथ जीने के लिए हर्ड इम्युनिटी हासिल करनी होगी। इसके दो रास्ते हैं। पहला, आप सभी को संक्रमित होने दें। इसमें आप अपनी मेडिकल क्षमता के मुताबिक बहुत बीमार लोगों का इलाज कर पाएंगे, बाकियों को मरने के लिए छोड़ देंगे। दूसरा रास्ता है, सभी का टीकाकरण करें। लेकिन इसके लिए एक असरदार वैक्सीन की ज़रूरत होगी, जो चीन के पास नहीं है। चीन अगर फाइजर, मॉडर्ना या एस्ट्राजेनेका की कोरोना वैक्सीन मंगाता है, तो इससे उसकी कमजोरी जाहिर होगी। भारत से टीका मंगाने की बात तो वह सपने में भी नहीं सोच सकता। ऐसे में फिर एक ही रास्ता बचता है, जनता को तानाशाही की लाठी से हांका जाए। अपने लोगों पर जुल्म करके कोरोना पर काबू पाने की कोशिश की जाए।

चीन की जनता कम्युनिस्ट पार्टी और उसके 'विचारवान' नेताओं पर आंख मूंदकर भरोसा करती है। ऐसे में अगर चिनफिंग सरकार अपनी रणनीतिक नाकामी कबूल करती है, तो जनता के उस भरोसे को गहरा आघात लगेगा। चीनियों ने हमेशा से मिखाइल गोर्बाचेव की ग्लासनोस्त पॉलिसी को बेवकूफी और सोवियत संघ की बर्बादी की वजह माना।

सोवियत संघ के पूर्व राष्ट्रपति गोर्बाचेव शासन व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए ग्लासनोस्त पॉलिसी लाए थे। इसमें जनता गोर्बाचेव प्रशासन की खामियों पर खुलकर चर्चा कर सकती थी, उन्हें दूर करने के लिए सुझाव भी दे सकती थी। लेकिन चीन पारदर्शिता का घनघोर विरोधी है। यही वजह है कि चाहे कुछ भी हो जाए, चीनी हुक्मरान कभी अपनी ग़लती नहीं स्वीकारते।

कम्युनिस्ट तानाशाहों की क्रूर नीतियों की वजह से सोवियत संघ और चीन में लाखों लोग मारे गए। रूस में तो आज भी सामूहिक रूप से दफनाए गए लोगों के कंकाल मिलते हैं। चीन इस मामले में काफी सतर्क रहता है। वह उन्हीं चीज़ों को उजागर करता है, जो उसके गौरवशाली अतीत का बखान करते हैं। फिर चाहे शिंजियांग में दुनिया की चावल की सबसे पुरानी खेती हो या फिर जियान में टेराकोटा योद्धाओं की क़ब्र।

चीन का समाजवाद अब भेड़ के कपड़ों में खून से सने दांतों वाला पूंजीवाद बन चुका है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था वाले देशों ने देर-सवेर लोकतंत्र का लिबास ज़रूर ओढ़ा। इससे जनहित से जुड़े फैसले लेने का अधिकार तानाशाह से छिन गया। जनता को स्वतंत्रता और समानता का अधिकार भी मिला।

पूंजीवाद की सांस नई टेक्नॉलजी और इनोवेशन के सहारे चलती है। अगर सभी आर्थिक फैसले नियम-क़ानून के मुताबिक होंगे, तो इनोवेशन की रफ्तार धीमी हो जाएगी और पूंजीवाद का दम घुटने लगेगा। इसीलिए पूंजीवाद को तानाशाही की ज़रूरत पड़ती है, ताकि असहमतियों को कुचलकर फैसले लिए जा सकें।

जर्मनी, इटली, इंडोनेशिया, कोरिया, ब्राजील और चिली जैसे देशों में पूंजीवाद निरंकुश सरकारों के सहारे फला-फूला। लेकिन एक वक़्त के बाद अंतर्विरोध के चलते उनमें टकराव हुआ और वे टूट गए।

चीन को लगता है कि वह अपवाद है और उसका पूंजीवाद हमेशा कायम रहेगा। वह सोचता है कि तरक्की के नारे के सहारे निरंकुश शासन चलता रहेगा। चीन कोरोना को ख़त्म करने के लिए जिस तरह का अड़ियल रुख अपना रहा है, यह उसके उसी बनावटी भरोसे का एक नमूना है।

आवाज़ : रोहित उपाध्याय

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