Evolution of communalism in India: यूपी में 1948 में आचार्य नरेंद्र देव ने कांग्रेस और विधायकी छोड़ दी और उपचुनाव लड़ने का फैसला किया। उस इलेक्शन में हराने के लिए राज्य की कांग्रेसी सरकार ने वही पैंतरे आजमाए, जिस पर आज पार्टी बीजेपी को कोसती है

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महात्मा गांधी की हत्या के थोड़े ही दिनों बाद जून-जुलाई, 1948 में यूपी में 12 सीटों पर उपचुनाव हुए। जो आजादी के बाद इस विधानसभा के लिए इस तरह का पहला इलेक्शन था। इस उपचुनाव की वजह भी खास थी। राज्य में तब कांग्रेस की सरकार थी। मुख्यमंत्री थे गोविंद बल्लभ पंत। इस सरकार से तालमेल न बैठा तो आचार्य नरेंद्र देव के नेतृत्व में दर्जन भर समाजवादी विधायकों ने 31 मार्च, 1948 को पार्टी छोड़ दी। विधानसभा की सदस्यता से भी इन लोगों ने इस्तीफा दे दिया। आचार्य का इरादा उपचुनाव में जीत हासिल कर असेंबली में विपक्ष की भूमिका निभाना था। पहले ये लोग कांग्रेस के अंदर समाजवादी गुट के तौर पर सक्रिय थे।

तब आचार्य नरेंद्र देव ने विधानसभा को संबोधित करते हुए कहा था, ‘जनतंत्र की सफलता के लिए विरोधी दल का होना जरूरी है। ऐसा विरोधी दल, जो जनतंत्र के सिद्धांतों में विश्वास रखता हो। जो राज्य को किसी धर्मविशेष से सम्बद्ध न करना चाहता हो, जो गवर्नमेंट की आलोचना केवल आलोचना की दृष्टि से न करे। जिसकी आलोचना रचना और निर्माण के हित में हो, न कि ध्वंस के लिए।’

आचार्य को डर था कि देश में सांप्रदायिकता का जैसा बोलबाला है। जिस तरह से देशवासी जनतंत्र के अभ्यस्त नहीं हैं। ऐसे में रचनात्मक विरोध ना हो तो सत्ताधारी दल में तानाशाही सोच पनप सकती है। नरेंद्र देव नहीं चाहते थे कि ऐसा हो। इसलिए उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा दिया।

उन्होंने एक और मजेदार बात कही। आचार्य बोले, ऐसे मौकों पर अक्सर नेता त्यागपत्र नहीं देते, ‘हम चाहते तो इधर से उठकर किसी दूसरी तरफ बैठ जाते। लेकिन हमने ऐसा करना उचित नहीं समझा। हो सकता है कि आपके आशीर्वाद से निकट भविष्य में हम इस विशाल भवन के किसी कोने में अपनी कुटी का निर्माण कर सकें। लेकिन चाहे यह संकल्प पूरा हो या नहीं, हम अपने सिद्धांतों से विचलित नहीं होंगे।’

उपचुनाव में कांग्रेस ने ग्यारह अन्य समाजवादी विधायकों की सीटों को तो उनके हाल पर छोड़ दिया। कांग्रेस और पंत सरकार का तब राज्य में बोलबाला था। उन्हें लगा कि ये ग्यारह विधायक तो पार्टी का साथ छोड़ने के बाद यों भी चुनाव नहीं जीत पाएंगे। लेकिन आचार्य नरेंद्र देव को वे हर कीमत पर हराना चाहते थे।

कांग्रेस में पंत और उनके समर्थक नेता भले ऐसा सोच रहे थे, लेकिन सबकी राय ऐसी नहीं थी। एक वर्ग चाहता था कि आचार्य के खिलाफ उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी न उतारा जाए। और वह 1946 की तरह निर्विरोध विधानसभा के लिए चुने जाएं। खुद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी इसी वर्ग में शामिल थे। 1946 में आचार्य ‘पांच नगरपालिकाओं के क्षेत्र’ के नाम से मशहूर विधानसभा सीट से निर्विरोध चुने गए थे। इसमें फैजाबाद और अयोध्या नगरपालिकाएं भी शामिल थीं। इससे पहले 1937 में भी वह विधानसभा चुनाव में विजयी हुए। तब राज्य को संयुक्त प्रांत के नाम से जाना जाता था।

Chunav me sampradayikta

गोविंद बल्लभ पंत कैंप ने आचार्य को हराने का इरादा तो कर लिया था, लेकिन उसे कोई मजबूत प्रत्याशी नहीं मिल रहा था। आखिर में पार्टी ने देवरिया जिले की बरहज तहसील के जाने-माने संत योगीराज अनंत महाप्रभु के शिष्य और स्वतंत्रता सेनानी बाबा राघवदास को उनके सामने ला खड़ा किया।

उपचुनाव में कांग्रेसी जहां भी प्रचार करने जाते, पहले आचार्य की तारीफों के पुल बांधते। कहते कि हिन्दी-उर्दू पर उनकी असाधारण पकड़ है। आचार्य कई अन्य भाषाओं के भी ज्ञाता हैं। धाराप्रवाह बोलते हैं। उनमें भाषण देने की कुदरती योग्यता है। विचारों का तो कहना ही क्या। आम से लेकर खास, सब उनकी सोच से आकर्षित होते हैं। वे अच्छे शिक्षक भी हैं। कुछ वाक्यों में ही किसी भी विषय को साफ-साफ समझा सकते हैं।

फिर पलटी मार जाते, ‘लेकिन वह मार्क्सवादी हैं। ईश्वर को नहीं मानते। भगवान राम को तो मानने का सवाल ही नहीं। अयोध्या से अगर आचार्य जीत गए तो वह धर्मध्वजा नीची हो जाएगी, जो अभी यहां खूब ऊंची फहराती है। इसलिए आप लोग उनके बजाय बाबा राघवदास को जिताइये और अयोध्या में धर्म की ध्वजा को नीची होने से बचाइए।’

आजादी के बाद कांग्रेस की ओर से आचार्य के खिलाफ किया गया यह सांप्रदायिकता का पहला सबसे बड़ा अपराध था। इसके लिए पार्टी को आज तक आचार्य के विचारों को मानने वालों ने माफ नहीं किया है। खैर, इस चुनाव में कांग्रेस ने जिस तरह से सांप्रदायिकता का इस्तेमाल किया, उसकी वजह से आचार्य चुनाव हार गए। इस हार से उनके मुकाबले में जीतने वाले बाबा राघवदास तक हैरान थे। बाबा ने कहा कि उन्हें जीत की खुशी कम और आचार्य की हार का दुख ज्यादा है क्योंकि आचार्य जीत डिजर्व करते थे। जिस सांप्रदायिकता और तानाशाही सोच से लड़ने के लिए उन्होंने विधायकी छोड़ी थी, उन्हीं वजहों से वह चुनाव हार गए।

आचार्य की उस हार को लेकर एक ही बात से तसल्ली होती है कि तब देश में सभी बालिगों को वोट देने का अधिकार नहीं था। सिर्फ वही लोग मतदान कर सकते थे, जो पढ़े-लिखे, आयकरदाता या पांच रुपये से ज्यादा लगान देने वाले भूस्वामी हों। तब तक न भारत का संविधान अस्तित्व में आया था, न चुनाव आयोग। आचार्य के साथ जिन लोगों ने इस्तीफा देकर चुनाव लड़ा था, उनमें से सिर्फ एक ही शख्स को उपचुनाव में जीत मिली। उनका नाम था, गजाधर प्रसाद। आचार्य नरेंद्र देव के खेमे के लोगों की इस हार से कांग्रेस के अंदर समाजवादी मूल्यों को गहरा धक्का पहुंचा। पार्टी के बाहर भी खुद को समाजवादी कहने वालों की राजनीतिक संभावनाओं को इसने लंबे अरसे के लिए धराशायी कर दिया।

आवाज़ : अंजुम शर्मा


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