इमरान खान सरकार ने अमेरिका में नए पाकिस्तानी राजदूत के रूप में मसूद खान (Masood Khan) का नाम बढ़ाया, मंजूरी देने पर अमेरिका ने चुप्पी साधी

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पाकिस्तान के लिए दुनिया के सामने बेइज्जत होना अब कोई नई बात नहीं रह गई है। लेकिन इस बार जो कुछ उसके साथ हो रहा है, वह काफी अलग है। इस बार पाकिस्तान का जुलूस निकला है इमरान खान सरकार के एक कदम पर अमेरिका की चुप्पी से। मामला है अमेरिका में पाकिस्तान के नए राजदूत की नियुक्ति का। पाकिस्तान ने नए राजदूत के रूप में नाम बढ़ाया मसूद खान का। लेकिन दो महीने से ज्यादा समय हो गया, अमेरिका ने उसे मंजूरी नहीं दी है। दरअसल दशकों तक पाकिस्तान को पुचकारते रहने वाले अमेरिका के लिए भी मसूद खान के चलते सांप-छंछूदर वाली हालत हो गई है।

पाकिस्तान ने पिछले साल नवंबर के दूसरे हफ्ते में मसूद खान का नाम बढ़ाया। मसूद को अमेरिका में पाकिस्तानी राजदूत असद मजीद खान की जगह लेनी थी। लेकिन मसूद के नाम पर अमेरिका न तो हां कह रहा है और न ही ना। मामला दिलचस्प इसलिए हो गया है कि ऐसी कूटनीतिक नियुक्तियों में इस तरह की देर आमतौर पर नहीं होती। अमेरिकी विदेश विभाग दो-चार हफ्तों में पाकिस्तानी राजदूतों की नियुक्ति को मंजूरी देता रहा है।

मसूद खान पिछले साल अगस्त तक पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर का प्रेसिडेंट था। 2008 से 2012 तक वह चीन में भी पाकिस्तान का राजदूत रह चुका है। लेकिन उसके रेज्युमे में केवल इतना भर नहीं है। काफी विवाद जुड़े हैं मसूद के साथ। और जब इमरान खान सरकार ने अमेरिका में पाकिस्तानी राजदूत बनाने के लिए मसूद का नाम बढ़ाया तो ये विवाद एक बार फिर सतह पर आ गए।

अमेरिकी सांसद स्कॉट पैरी ने तो अपने राष्ट्रपति जो बाइडेन को पत्र लिख दिया कि मसूद की नियुक्ति को मंजूरी न दी जाए। उन्होंने साफ कहा है कि अमेरिका में 'इस जिहादी' को बैठाने की पाकिस्तान सरकार की कोशिश नाकाम कर दी जाए। पैरी ने यह भी लिखा कि मसूद 'आतकंवादियों का समर्थक' है। वह हिज्बुल मुजाहिदीन की तारीफ करता रहा है। उसने हिज्बुल के कमांडर रहे बुरहान वानी का समर्थन किया था। कश्मीर में भारतीय सुरक्षा बलों के हाथों मारे गए हिज्बुल कमांडर बुरहान वानी की पांचवीं बरसी पर मसूद ने उसे 'दुनियाभर के फ्रीडम फाइटर्स के लिए रोल मॉडल' करार दिया था। वानी को 8 जुलाई 2016 को सुरक्षा बलों ने मारा था।

पैरी ने मसूद के कारनामों का पूरा चिट्ठा बाइडेन के पास भेजा है। उन्होंने लिखा है कि अमेरिका ने 2017 में जब हिज्बुल के सरगना पर प्रतिबंध लगाया तो मसूद ने उसे अनुचित करार दिया था। यही नहीं, 2019 में मसूद को हरकत उल मुजाहिदीन के फाउंडर फजलुर रहमान खलील के साथ देखा गया था। यह इस बात के बावजूद था कि खलील को तब तक स्पेशली डेजिग्नेटेड ग्लोबल टेररिस्ट करार दिया जा चुका था। वहीं, हरकत उल मुजाहिदीन को अमेरिका ने आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था। पैरी ने लिखा है कि मसूद ने यह सब जानबूझकर किया क्योंकि अमेरिका 2014 में ही बता चुका था कि खलील अल कायदा के सरगना ओसामा बिन लादेन का करीबी है। पैरी ने लिखा है, 'ओसामा बिन लादेन ने अमेरिका पर हमले के लिए 1998 में जो पहला फतवा दिया था, उस पर खलील ने भी दस्तखत किए थे।'

Masood Khan in US

अमेरिकी सांसद का कहना है कि इस्लामिक टेररिज्म से मसूद खान के रिश्ते के ढेरों सबूत हैं और उसका नाम बढ़ाने से एक बार फिर साफ हो गया है कि 'पाकिस्तान ने सुपर टेररिस्ट स्टेट के रूप में अपनी पहचान बना ली है।' पैरी ने लिखा है कि मसूद खान 'हमारे सहयोगी भारत के सुरक्षा हितों के खिलाफ' भी काम करता रहा है। वह कश्मीर को भारत से अलग करने का समर्थक है। पाकिस्तान ने मसूद खान का नाम आगे बढ़ाकर 'अमेरिका की तौहीन की है।'

भारतीय मूल के अमेरिकी लोगों के एक संगठन ने भी जो बाइडेन से अपील की है कि मसूद खान की नियुक्ति को मंजूरी न दी जाए। फाउंडेशन फॉर इंडिया एंड इंडियन डायस्पोरा स्टडीज (FIIDS) ने मसूद को 'जिहादी टेरिरस्ट सिंपैथाइजर' करार दिया। उसने लिखा, 'मसूद ने लेडी अल-कायदा के नाम से कुख्यात आफिया सिद्दिकी जैसे आतंकवादियों का समर्थन किया था। जमात ए इस्लामी के लिए उसका सपोर्ट किसी से छिपा नहीं है।'

आफिया की रिहाई के लिए मसूद खान ने मई 2020 में ट्वीट किया था, 'अमेरिका सरकार आफिया सिद्दिकी को छोड़ने का रास्ता तलाश सकती है। अमेरिका ने तालिबान से शांति समझौता कर लिया है, जिसे वह कभी दुश्मन मानता था। ऐसे में आफिया की आजादी के लिए भी गुंजाइश बनाई जानी चाहिए।'

मसूद पर जमात ए इस्लामी को सपोर्ट करने का भी आरोप है। जमात ए इस्लामी ने बांग्लादेश में 1971 में बांग्लादेशियों की सामूहिक हत्याओं में पाकिस्तान सेना की मदद की थी। लश्कर ए तैयबा के साथ भी जमात के करीबी रिश्ते रहे।

दरअसल मसूद खान के काले कारनामों की लिस्ट काफी लंबी है। FIIDS ने इसी वजह से बाइडेन को लिखा है, 'अमेरिका में अगर मसूद खान को कूटनीतिक जिम्मेदारी दी गई तो आतंकवादी संगठनों को अमेरिकी संस्थानों में घुसपैठ का रास्ता मिल जाएगा। पाक अधिकृत कश्मीर के प्रेसिडेंट के रूप में उसने जो कुछ किया है, उसे देखते हुए अमेरिका के सामरिक साझेदार भारत के साथ रिश्तों पर भी असर पड़ेगा।'

जो बाइडेन प्रशासन हालांकि मसूद खान के मसले पर खुलकर कुछ भी नहीं कह रहा। नवंबर के दूसरे हफ्ते में नाम सामने आने के बाद से मामला ठंडे बस्ते में है। कुछ हलकों में कहा जा रहा है कि नवंबर के बाद सालाना छुट्टियों के दिन आ गए, लिहाजा फैसला होने में देर हो गई। लिहाजा इसे सामान्य प्रक्रिया में देर का मामला माना जाना चाहिए।

दरअसल पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्तों में इतने उतार-चढ़ाव हैं कि जो दिखता है, वह आमतौर पर होता नहीं है। इनके बीच की नरमी-गरमी एक तरह से नूराकुश्ती रही है। पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ युद्ध के नाम पर बरसों तक अमेरिका से भारी-भरकम रकम ऐंठता रहा, तो अमेरिका भी अफगानिस्तान में रूसी मौजूदगी की काट तैयार करने और एशिया की महाशक्ति भारत पर दबाव बनाने के लिए अपने पिठ्ठू की हौसला अफजाई करता रहा। बीच-बीच में थोड़ी डांट-डपट भी चलती रही।

हाल के महीनों में पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्तों में ठंडापन बढ़ा है। खासतौर से भारतीय उप-महाद्वीप में बदले राजनीतिक हालात के चलते। अमेरिकी निगाहों के साए तले पाकिस्तान में तैयार किए गए तालिबान अफगानिस्तान की सत्ता में आ चुके हैं। अफगानिस्तान में अमेरिका की अब कोई बहुत दिलचस्पी बची नहीं है क्योंकि खुद पर हुए हमले का बदला लेने के लिए वह अल-कायदा लीडरशिप का सफाया कर चुका है और तालिबान से उसने एक तरह से करारनामा लिखवा लिया है कि वह अपने काम से काम रखेगा, अमेरिका की ओर नजर नहीं उठाएगा। इधर कथित जियो-पॉलिटिकल बैलेंस बनाने के लिए भारत पर दबाव डालने की कोई जरूरत अमेरिका के लिए नहीं रह गई है क्योंकि भारत पिछले कुछ वर्षों से उसका एक अहम रणनीतिक सहयोगी है और भारत-प्रशांत क्षेत्र में चीन को चुनौती देने वाली एक अहम साझेदारी क्वॉड का हिस्सा भी है। अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्तों में आई ठंड को इस लिहाज से समझा जा सकता है। वहीं, चीन के साथ पाकिस्तान की बढ़ती करीबी से भी अमेरिका चिढ़ा हुआ है।

मसूद मामले में अमेरिका दरअसल कोई कड़ा फैसला करने के बजाय बीच का रास्ता निकालना पसंद करेगा। उसकी नजर पाकिस्तान को चीनी खेमे से खींचने पर भी होगी। चीन और रूस की करीबी अमेरिका के लिए सिरदर्द बनती जा रही है। अमेरिका नहीं चाहेगा कि उसका पाला-पोसा पिट्ठू चीनी खेमे के साथ जाए। मसूद का नाम खुले तौर पर खारिज करना पाकिस्तान को बड़ा झटका देगा और इमरान सरकार के लिए शर्मिंदगी का सबब भी बनेगा।

वैसे भी मसूद इससे पहले 2005 से 2008 तक जेनेवा में यूनाइटेड नेशंस में पाकिस्तान का स्थायी प्रतिनिधि रह चुका है। फिर 2012 से 2015 तक वह न्यूयॉर्क में यूनाइटेड नेशंस में पाकिस्तान का स्थायी प्रतिनिधि रहा। इस बार के मामले में भी अगर इतना हल्ला न मचता तो अमेरिका सरकार को उलझन नहीं होती। यह याद रखा जाना चाहिए कि अमेरिका में चाहे जिस पार्टी की सरकार हो, अमेरिकी पिट्ठुओं से आंख नहीं फेरी जाती। बाइडेन प्रशासन भी इमरान सरकार को हो सकता है कि मुश्किल में न डाले। यह तो तय है कि मसूद के नाम पर अमेरिका और पाकिस्तान, दोनों ही अपने रिश्तों की बलि नहीं देने वाले। देखना यह है कि इस नूराकुश्ती में बीच का रास्ता क्या निकलता है?

आवाज़ : रोहित उपाध्याय

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