कौटिल्य यानी चाणक्य ने अपने ग्रंथ अर्थशास्त्र में युद्ध नीति के बारे में कई अहम बातें कहीं हैं

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भारत और चीन के रिश्तों की बात आती है तो दोनों की सेनाओं की झड़पों का भी जिक्र उठता है और 1962 के युद्ध का भी। भारत के पास कौटिल्य यानी चाणक्य के रूप में ऐसी शख्सियत की विरासत है, जिन्होंने राजनीति से लेकर कूटनीति तक, हर पहलू पर अनमोल सीख दी है। उनके ग्रंथ अर्थशास्त्र में युद्ध नीति के बारे में भी कई अहम सूत्र हैं। आजाद भारत की कमान संभालने वालों ने अगर उनसे सीखा होता तो कई लड़ाइयों की तस्वीर अलग हो सकती थी, खासतौर से चीन के मामले में।

उस दौर के विश्व के नेताओं पर नजर डालें तो ब्रिटेन के विंस्टन चर्चिल और चीन के माओ त्से तुंग के पास सैन्य अनुभव था। इसके दम पर वे संकट के समय ठोस मिलिट्री एक्शन ले पाए। अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट की सैन्य इतिहास और रणनीति में गहरी दिलचस्पी थी। उनके पास आइजनहावर और जॉर्ज मार्शल जैसे भरोसेमंद सैन्य अफसरों का एक कोर ग्रुप था, जिसने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अहम रोल निभाया।

भारत में देखें तो जवाहरलाल नेहरू की ऐसी कोई दिलचस्पी नहीं थी। देश की आजादी के अहिंसक संघर्ष का उन पर गहरा असर था। यह प्रभाव इस हद तक था कि अहिंसा के जरिए एक नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाई जा सकती है, ऐसा वह मानने लगे थे। सेना और युद्ध की रणनीति को समझने के बजाय उन्होंने काफी जोर लगाया सिविल-मिलिट्री संबंधों पर। देश की सत्ता सेना के हाथों में न चली जाए, इसका खतरा घटाने पर उनका फोकस ज्यादा था।

जवाहरलाल नेहरू के कई प्रशंसक कहते हैं कि जब शांतिपूर्ण उपायों से बात नहीं बनी तो जवाहरलाल नेहरू ने भी पूरी ताकत का इस्तेमाल किया ही था। लेकिन ऐसे सभी कदम वक्त रहते नहीं उठाए गए। जो भी किया गया, बाद में प्रतिक्रिया में किया गया। चाहे 1947-48 में जम्मू कश्मीर का मामला हो या 1948 में हैदराबाद का या 1961 में गोवा का, हर जगह ऐसा ही दिखा।

अब आते हैं चाणक्य की सीख पर। युद्ध से पहले की रणनीति के बारे में चाणक्य कहते हैं, 'जब तक यह पता न चल जाए कि शत्रु की कमजोरियां क्या हैं, तब तक उससे दोस्ताना रिश्ते बनाए रखने चाहिए।' और ठीक यही किया चीन के माओ त्से तुंग और चाउ एन लाई ने। भारत और चीन के बीच पंचशील समझौते पर 1954 में दस्तखत हुए। उसके बाद करीब सात वर्षों तक चीन ने जो कुछ किया, उसे देखकर चाणक्य की कही बात याद आती है। चीन ने इस दौरान अपनी ताकत बढ़ाई और अपने हिसाब से समय चुनकर भारत पर हमला किया।

कौटिल्य ने बहुत साफ ढंग से कहा है कि जब कोई सेना असल युद्ध के कई दिनों पहले से मार्च करती आ रही हो, सैनिक थकान और भूख से जूझ रहे हों तो तय समझिए कि वह सेना आधी लड़ाई तो पहले ही हार चुकी है। उन्होंने इस बात का जिक्र भी किया है कि जब युद्ध स्थल के हालात और मौसम से तालमेल बनवाए बिना सैनिकों को सीधे जंग में उतार दिया जाता है, तो लड़ने की क्षमता पर इसका बुरा असर पड़ता है।

यह बात 1962 में नामका चू में सातवीं ब्रिगेड के मामले से समझी जा सकती है। ब्रिगेडियर दलवी और उनके सैनिकों ने अस्थायी रक्षा चौकियों पर कब्जा तो किया, लेकिन तब तक वे थक चुके थे। इसी तरह 1971 के युद्ध से पहले छंब ब्रिगेड ने आक्रामक अभियान के लिए खुद को तैयार कर लिया था। जब उसे अचानक रक्षात्मक अभियान के लिए कहा गया, तो उसकी रणनीति बिखर गई। उन्हें चाक-चौबंद चौकियां बनाने का समय ही नहीं मिल पाया। मौसम और हालात से वाकिफ रहने का कैसा फायदा मिलता है, इसका एक उदाहरण अक्टूबर 1947 में मिलता है। तब सिख और कुमाऊं रेजिमेंट्स के सैनिकों को विमानों से श्रीनगर में उतारा गया। पाकिस्तानी संख्या में ज्यादा थे, लेकिन भारतीय सैनिकों ने उनके छक्के छुड़ा दिए।

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चीन के बारे में बात करें तो 1961 में भारत ने जब फॉरवर्ड पॉलिसी अपनाई, तो उससे पहले पर्याप्त ताकत नहीं जुटाई गई। इस खामी का साया आने वाले कई वर्षों तक भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा पर बना रहा। भारत-चीन युद्ध के लिहाज से अर्थशास्त्र की एक और बात याद आती है। इसमें कहा गया है कि युद्ध के दौरान सेना को नेतृत्व विहीन नहीं होना चाहिए। मौके पर मदद के लिए पीछे से सेना की टुकड़ी भी भेजी जानी चाहिए। लेकिन 1962 में ईस्टर्न सेक्टर में भारत की हार में ऐसे कई उदाहरण हैं, जिनमें अर्थशास्त्र के सिद्धांतों को नजरंदाज किया गया। लेफ्टिनेंट जनरल कौल तो युद्ध क्षेत्र से भाग ही गए। बाद में दिल्ली में वह सामने आए, एक रहस्यमय बीमारी के साथ।

लद्दाख में हालांकि लेह और चुशूल में चौकियों पर पीछे से सैनिक भेजे गए। साथ ही, लेफ्टिनेंट जनरल दौलत सिंह की मजबूत लीडरशिप भी थी। इसके चलते युद्ध के दूसरे चरण में आर्मी कमांडर और ब्रिगेडियर 'टैपी' रैना के सामने आगे बढ़ने में चीनियों को दो बार सोचना पड़ा। चीनियों ने पूर्वी सेक्टर में तो साफ तौर पर जीत हासिल की, लेकिन पश्चिमी इलाके में इस मुकाम से पहले रुक गए। दरअसल माओ ने चीन के युद्ध कला विशेषज्ञ सुन जू की बातों पर अमल किया। उनके मुताबिक, दुश्मन को पूरी तरह नेस्तनाबूद करने से बचना चाहिए। चाणक्य ने भी साफ तौर पर कहा है, 'आमने-सामने की जंग में नष्ट हो जाने के बजाय सेना को पीछे हटने का मौका देना बेहतर होता है। इसे सामने और पीछे मौजूद दुश्मन के बीच सैंडविच जैसी हालात में नहीं फंसाना चाहिए।'

नामका चू में जो हार हुई, उसकी वजह थी फ्रंटल अटैक के सामने सातवीं ब्रिगेड की कमजोरी और इसकी घेराबंदी। सेला गैरिसन को भी ऐसे ही हालात का सामना करना पड़ा। उसके कई सैनिकों ने बहुत बहादुरी दिखाई। ब्रिगेडियर होशियार सिंह के रूप में उसके पास युद्ध में तपे हुए फील्ड कमांडर थे, लेकिन कहीं न कहीं कसर रह ही गई।

कौटिल्य ने दुश्मन को कमजोर करने के लिए गुप्त अभियानों की भी वकालत की है। उन्होंने गूढ़ युद्ध पर जोर दिया है। इसमें असल में युद्ध छेड़े बगैर परदे के पीछे से कदम उठाने की बात की गई है। उन्होंने एजेंटों, डबल एजेंटों, सहयोगियों, कबीलों के सरदारों और दुश्मन के समर्थकों का सहारा लेने पर जोर दिया।

ब्रिटिश मिलिट्री इंटेलिजेंस भारत में स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं की हरकतों पर नजर रखती थी। आजादी के तुरंत बाद नेहरू ने मिलिट्री इंटेलिजेंस का पूरा स्ट्रक्चर खत्म कर दिया। परदे के पीछे से युद्ध से जुड़ी गतिविधियां चलाने का पूरा जिम्मा इंटेलिजेंस ब्यूरो को दे दिया गया। यह एक नया संगठन था, जिसके पास शत्रु के इलाके में कोई भी गोपनीय अभियान चलाने लायक तैयारी नहीं थी।

दुश्मन के खेमे में घुसकर जानकारी जुटाने में मिलिट्री बैकग्राउंड के एजेंटों को महारत हासिल होती है। जैसा कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान फ्रांस में ब्रिटिश इंटेलिजेंस ने जर्मनी के खिलाफ किया। लेकिन 1950 के दशक में यह इकाई लगभग ठप हो चुकी थी। ऐसे में भारत की रणनीति बनाने वालों को पता ही नहीं था कि अक्साई चिन और तिब्बत में क्या हो रहा है। उन्हें इंटेलिजेंस ब्यूरो की हल्की-फुल्की रिपोर्टों से ही काम चलाना पड़ा।

इंदिरा गांधी ने लेकिन इस युद्ध शैली का शानदार इस्तेमाल किया। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान में परंपरागत सैन्य अभियान शुरू करने से पहले उन्होंने गूढ़ युद्ध शैली अपनाई। इस काम के लिए उन्होंने रॉ (R&AW) का सहारा तो लिया ही, उन्होंने गोपनीय अभियानों का जिम्मा भारतीय सेना को भी दिया। इसकी वजह यह थी कि खुफिया जानकारी जुटाने के दौरान सशस्त्र संघर्ष भी हो सकता था। इंदिरा गांधी को अहसास था कि उनकी तीनों सेनाओं के प्रमुखों को परंपरागत युद्ध की तैयारी के लिए वक्त चाहिए। ऐसे में उन्हें पूर्वी पाकिस्तान में सैन्य ढांचे पर दबाव बढ़ाना था। इंदिरा को उम्मीद थी कि इससे एक तो सामूहिक हत्याओं पर कुछ अंकुश लग पाएगा और भारत में शरणार्थियों के आने में कमी आएगी, वहीं पाकिस्तान की सेना पर लगातार मनोवैज्ञानिक दबाव पड़ेगा। इस मोर्चे पर रॉ, आर्मी और एयर फोर्स से चुने गए अधिकारियों ने काम किया। उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों में पश्चिमी पाकिस्तान के शासकों के खिलाफ गुस्से को भुनाया। उन्होंने मुक्तिबाहिनी को प्रशिक्षण दिया। इससे अगले छह महीनों तक पाकिस्तानी सेना पर हर तरह से दबाव बढ़ा। इस रणनीति से दो बड़े फायदे हुए। एक तो दुश्मन दिमागी तौर पर कमजोर पड़ गया। दूसरा, हमें दुश्मन के इलाके की अच्छी खुफिया जानकारी मिल गई। इन दोनों बातों ने दिसंबर 1971 में सफलता दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई।

(यह अंश लेखक की पुस्तक 'India's Wars: A Military History, 1947-1971' पर आधारित है)
आवाज़ : आशिता सेठ

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