Indi-Pakistan Issue: भारत के दो दुश्मन देश चीन और पाकिस्तान पहले से ज़्यादा करीब आ गए हैं। इस वजह से उस इलाक़े में भी मोर्चा खुलता दिख रहा है, जिसके बारे में उम्मीद तक नहीं थी

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चीन और पाकिस्तान के रिश्ते एक लंबी प्रक्रिया में गहरे हुए हैं। भारत से दोनों की साझा शत्रुता इनके बनने की एक बड़ी वजह भले ही रही हो, लेकिन दोनों को आपसी संबंधों से इसके अलावा भी काफी फायदा पहुंचा है। इन पहलुओं की जानकारी सड़क के आम आदमी को है, तो राहुल गांधी को भी होगी ही। संसद में उन्होंने चीन और पाकिस्तान को जोड़ने का आरोप मोदी सरकार पर लगाया। इसके पीछे उनकी यह समझ नहीं रही होगी कि यह जुड़ाव बीते आठ वर्षों की चीज़ है। भारत की सीमाओं की सुरक्षा के लिए चीन और पाकिस्तान का फौजी जुड़ाव चिंता पैदा करने वाली बात तो है, लेकिन इससे संभावित ख़तरों का जायजा लेने के लिए सबसे पहले हमें यह समझना चाहिए कि पिछले दो-तीन वर्षों में या मोटे तौर पर कहें तो संविधान के अनुच्छेद-370 के खात्मे के बाद से इस सिलसिले में नया क्या हुआ है।

एक तो यही कि चीन और पाकिस्तान के बीच कई साझा सैन्य अभ्यास हुए। इनमें सबसे चिंताजनक अभ्यास की जगह दोनों ने ही नहीं बताई। लेकिन चीनी मीडिया ने जो चित्र जारी किए, उनसे ऐसा लगता है कि यह जगह लाइन ऑफ कंट्रोल (एलओसी) और लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलओएसी) के मिलन स्थल के आसपास थी। दो देशों के बीच होने वाले युद्धाभ्यास एक या दूसरे देश के प्रभाव क्षेत्र में होते हैं। लेकिन ये दोनों देशों की दावेदारी वाले किसी ऐसे इलाके़ में हों, जो किसी तीसरे मुल्क के साथ विवाद में हो, इससे सीधे तौर पर उस तीसरे देश के ख़िलाफ़ शत्रुतापूर्ण गोलबंदी का पता चलता है। ध्यान रहे, एलओसी पर जम्मू-कश्मीर में भारत और पाकिस्तान की, जबकि एलओएसी पर लद्दाख में भारत और चीन की सेनाएं आमने-सामने खड़ी हैं, और ये दोनों रेखाएं भारत के नक़्शे के भीतर पड़ती हैं।

हमारे लिए सबसे बड़ी परेशानी है चीन और पाकिस्तान के बीच ड्रोन्स के साथ हुआ साझा युद्धाभ्यास। हालांकि इसमें पाकिस्तान के जिन ड्रोन्स ने हिस्सा लिया, उनमें से ज़्यादातर को उसने चीन से ही खरीद रखा है। ध्यान रहे, कुछ ही समय पहले पाकिस्तान ने चीन से विंग लुंग-2 नाम के अनमैन्ड कॉम्बैट ऐरियल वीइकल (यूसीएवी) खरीदे हैं, जिनकी गिनती अभी दुनिया के सबसे ख़तरनाक ड्रोन्स में हो रही है। चीनी मीडिया ने इन ड्रोन्स को ऊंचाई पर तैनात भारतीय फौजियों के लिए बहुत ख़तरनाक बताया है, लेकिन भारतीय सेना ने अपने बयानों में इन्हें कुछ ख़ास तवज्जो नहीं दी। इस अभ्यास के हफ्तेभर बाद जम्मू स्थित भारतीय वायुसेना के कुछ ठिकानों पर ड्रोन हमले हुए, जिनमें एक कर्मचारी घायल हुआ और एक हेलिकॉप्टर को थोड़ा नुकसान पहुंचा। बाद में मार गिराए गए ये ड्रोन्स जांच-पड़ताल में खासे मजबूत पाए गए, लेकिन विंग लुंग-2 जैसे महंगे मिलिट्री क्लास ड्रोन ये नहीं थे।

हाल तक हम यह मानकर चल रहे थे कि चीन और पाकिस्तान में चाहे जितना भी दोस्ताना क्यों न हो जाए, लेकिन भारत के साथ दोनों देशों की सीमाएं आपस में जहां पर मिलती हैं, वह संसार के सबसे दुर्गम इलाक़ों में से एक है। हमारे ख़िलाफ़ उपग्रह के स्तर पर सूचनाओं का साझा वे भले कर लें, लेकिन ज़मीनी स्तर पर किसी तरह का सैन्य समायोजन वे नहीं कर पाएंगे। अभी ऐसा लग रहा है कि शिनच्यांग और तिब्बत में स्थित चीनी फ़ौजी कमान और कश्मीर के उत्तरी इलाक़ों में मौजूद पाकिस्तानी फ़ौज की कमान आपस में सूचनाएं बांट रही हैं। साथ ही पिछले साल हुए युद्धाभ्यास के क्रम में भारत के विरुद्ध सीधे तालमेल बनाकर काम करने की स्थिति में जा रही हैं। जिसे अभी तक हम 'टू-फ्रंट वॉर' की काल्पनिक स्थिति मानते आए हैं, उसका मतलब पाकिस्तान या चीन के साथ किसी टकराव की हालत में ब्रह्मपुत्र की गहरी घाटियों से लेकर कच्छ के रन तक का मोर्चा खुलना हो सकता है। जाहिर है, इस बारे में हमें फ़ौजी नज़रिये से ज़्यादा कूटनीतिक नज़रिये से सोचने की ज़रूरत है।

पिछले 20 वर्षों में पाकिस्तान टैंकों से लेकर लड़ाकू विमानों तक के मामले में चीन पर निर्भर होता गया है। इससे पहले अपने ज़्यादातर हथियार वह अमेरिका से लेता था- कुछ खरीदकर तो कुछ मदद की शक्ल में। लेकिन 2001 में पाकिस्तान ने चीन के साथ एक साझा उपक्रम के ज़रिये अपना मेन बैटल टैंक एमबीटी-2000 बनाना शुरू किया और 2007 में मुख्य लड़ाकू विमान जेएफ-17 थंडर। हाल में उसने चीन से वीटी-4 टैंक और जे-10बी युद्धक विमान भी खरीदे हैं, जो अपने-अपने क्षेत्र में आगे बढ़े हथियार बताए जाते हैं। इस तरह की चीज़ें महाशक्तियां उन्हीं देशों को बेचती हैं, जिन्हें वे अपना ग्राहक या सहयोगी नहीं बल्कि रणनीतिक विस्तार मानती हैं। संसद में विपक्षी नेता का जवाब देते हुए सरकार चाहे जो भी रुख अपनाए, लेकिन दो शत्रुतापूर्ण पड़ोसियों की ऐसी निकटता को उसे हल्के में नहीं लेना चाहिए।

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अतीत में जाएं तो चीन को एक संप्रभु देश की मान्यता पाकिस्तान से पहले भारत ने दी थी। चीन और भारत के रिश्ते भी 1956 तक चीन-पाकिस्तान संबंध की तुलना में कहीं ज़्यादा गहरे थे। चीन-पाक रिश्तों की ज़मीन तैयार करने का श्रेय दिल्ली में जन्मे प्रगतिशील कहानीकार अहमद अली को जाता है, जो 1948 तक नानचिंग यूनिवर्सिटी में अंग्रेज़ी पढ़ाते थे। 1936 में लखनऊ में प्रेमचंद की अध्यक्षता में हुए प्रगतिशील लेखक संघ के स्थापना सम्मेलन में उन्होंने 'आर्ट का तरक्कीपसंद नज़रिया' शीर्षक वाला मशहूर पेपर पढ़ा था। लेकिन 1948 में उन्होंने भारत वापसी की अर्जी लगाई तो चीन में भारत के तत्कालीन राजदूत केपीएस मेनन ने यह कहकर मना कर दिया कि बतौर विजिटिंग प्रफेसर उनकी नियुक्ति ब्रिटिश सरकार ने की थी और भारत-पाक विभाजन के समय उन्होंने भारत में ही रहने का लिखित आग्रह नहीं किया था। नतीजा यह कि अहमद अली को मजबूरी में नानचिंग से कराची जाकर जीविका के लिए एक अकेडमीशियन से डिप्लोमैट बनना पड़ा। यह एक विचित्र बात थी कि जिस समय पाकिस्तान अमेरिकी खेमे के सबसे ख़ास देशों में था, उसी समय वामपंथी मिजाज के इस नए-नवेले राजनयिक की कोशिशों से घोर अमेरिका विरोधी चीन के साथ उसके नजदीकी रिश्ते भी बन रहे थे।

भारत, चीन और पाकिस्तान के त्रिकोण में बदलाव 1956 से आने शुरू हुए, जब तिब्बत में चीनी हुकूमत के ख़िलाफ़ बगावत शुरू हुई। पहली बार चीन को यह लगा कि भारत के ज़रिये अमेरिका विद्रोही तिब्बती नेतृत्व के हाथ मजबूत कर रहा है। चीन-पाकिस्तान मैत्री संधि पर हस्ताक्षर भी इसी साल हुए, जो उस समय के लिए एक अनोखी बात थी। सोशलिस्ट और कैपिटलिस्ट खेमों के बीच बंटी दुनिया में एक खेमे के देश का दूसरे खेमे के देश के साथ घनिष्ठ रिश्ते बनाना। निकटता के इस ग्राफ में एक बड़ा उछाल भारत-चीन युद्ध के तुरंत बाद 1963 में आया, जब पाकिस्तान ने कराकोरम पर्वत शृंखला के दूसरी तरफ पड़ने वाली शक्सगाम घाटी चीन को सौंप दी। ध्यान रहे, यह घाटी जम्मू-कश्मीर रियासत का हिस्सा रही है और आज भी इसपर भारत और पाकिस्तान, दोनों का दावा है। इसको किसी तीसरे देश को सौंपने का कोई अधिकार पाकिस्तान के पास नहीं था, लेकिन अपनी इस पहल से उसने चीन के साथ अपनी दोस्ती पक्की कर ली। अभी चीनी फौजें यहां ऐसे जमी हैं, जैसे यह घाटी हमेशा उनकी ही रही हो।

दोनों देशों की नजदीकी का अगला दौर 1978 में कराकोरम राजमार्ग के निर्माण के साथ आया, जिसकी थोड़ा पहले तक कल्पना भी नहीं की जाती थी। बताया जाता है कि 1965 के भारत-पाक युद्ध के बाद अयूब खां ने चाऊ एनलाई को सहायता के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया तो उन्होंने कहा कि लड़ाई में वे और ज़्यादा मदद कर सकते थे, बशर्ते दोनों देशों को सीधे जोड़ने वाली कोई सड़क मौजूद होती। वहां से शुरू हुई प्रक्रिया 13 साल में पूरी हुई और दोनों देशों का 'मैत्री मार्ग' अस्तित्व में आया। दुर्गम कराकोरम पर्वतमाला को पार करके चीन के शिनच्यांग प्रांत को पाकिस्तान से जोड़ने वाला यही राजमार्ग अभी चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) की धुरी बना हुआ है। तीन साल पहले इसी रास्ते से चीनी माल ग्वादर बंदरगाह पहुंचना शुरू हुआ है और ईरान से तेल और गैस की पाइपलाइन चीन पहुंचने की प्रक्रिया में है। चीन-पाक रेलवे भी आने वाले दिनों में यहीं से गुजरती नज़र आ सकती है, लेकिन असली करामात तब होगी जब छंग्तू से ल्हासा और शीगर्ची आने वाली रेलवे चीन की मुख्यभूमि को एक छोटे रास्ते से पाकिस्तान के साथ जोड़ देगी। ये सारे विकास भारत के लिए चिंता का ही कारण बनेंगे, स्वाभाविक है।

सवाल यह है कि क्या इनके लिए भारत की कोई रणनीतिक ग़लती जिम्मेदार है, जिसका दोष मोदी सरकार पर आना चाहिए? घटनाएं तो बीते आठ वर्षों में दो ही हुई हैं। चीन की फ़ौजों का 2017 में भूटान के डोकलाम इलाके़ में अपने सामरिक ढांचे खड़े करना और 2020 में पूर्वी लद्दाख के कुछ ऐसे इलाक़ों में अपनी चौकियां बना लेना, जहां भारतीय सेना गश्त लगाया करती थी। डोकलाम में भारत ने अपनी रणनीतिक ज़रूरत और भूटान के साथ रक्षा संधि को देखते हुए हस्तक्षेप किया और चीन को पीछे हटने को मजबूर कर दिया। पूर्वी लद्दाख में हमारी फ़ौजों के रहते चीनी सेना कैसे आगे बढ़ आईं, यह ऐसा सवाल है, जिसका जवाब देर-सबेर हमारी सरकार को देना होगा। अच्छी बात यह रही कि दोनों ही मामलों में भारत ने ख़ुद से काफी बड़ी ताकत का पलटकर मजबूती से जवाब दिया। विपक्ष का सरकार से सवाल पूछना वाजिब है, लेकिन ग़लतियां तो राष्ट्रहित में राजनीतिक मतैक्य बनाकर ही सुधारी जा सकेंगी।

आवाज़ : आशिता सेठ

Web Title:

India China Border Dispute | India-Pakistan Border Tension | India China Pak Border Issue | Why China Against India

(Hindi podcast on Navbharat Gold)

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