कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी ने जाति को लेकर नियम बनाया है। अमेरिका में रंग और नस्ल के साथ यहां अब जाति के आधार पर भी भेदभाव नहीं हो सकेगा

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अमेरिकी कॉरपोरेट वर्ल्ड के बाद यूनिवर्सिटी सिस्टम में भी जाति के नाम पर होने वाले किसी भेदभाव को रोकने की तैयारियां शुरू हो गई हैं। शुरुआत की है कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी सिस्टम ने। इसके तहत राज्य के 20 से अधिक कॉलेज आते हैं यानी हज़ारों स्टूडेंट्स, शिक्षक और बाकी स्टाफ।

शिक्षकों की यूनियन इस मामले में जनवरी में ही एक प्रस्ताव लेकर आई थी। इसमें कहा गया था कि जाति को भी उस सूची में डाला जाए, जिसमें धर्म, रंग, नस्ल को रखा गया है। इसका मतलब हुआ कि धर्म, रंग, नस्ल के साथ जाति के आधार पर भी किसी के साथ यूनिवर्सिटी में भेदभाव नहीं किया जाएगा। कुछ शिक्षकों ने प्रस्ताव का विरोध किया। ख़बरों के अनुसार, भारतीय मूल के 80 प्रफेसरों ने प्रस्ताव के विरोध में चिट्ठी लिखी थी। हिंदू अमेरिका फाउंडेशन ने ट्विटर पर इस मामले में अपना विरोध जताया। कोर्ट जाने की बात कही।

हालांकि फाउंडेशन के विरोध के बाद पूरे अमेरिका से दक्षिण एशियाई समुदाय के लोग इस प्रस्ताव के समर्थन में आ गए। कैलिफोर्निया में शिक्षकों की यूनियन के साथ-साथ ट्रेड यूनियन और नागरिक अधिकार संस्थानों ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया। व्यापक समर्थन मिलने के बाद यूनिवर्सिटी के ट्रस्टियों ने प्रस्ताव को पारित कर दिया है और अब यह नियम लागू हो जाएगा।

नियम का फायदा यह होगा कि इस यूनिवर्सिटी के तहत आने वाले किसी भी कॉलेज में छात्रों के साथ अगर जाति के नाम पर भेदभाव होता है, तो वे इसकी शिकायत अधिकारियों से कर सकते हैं। इस पर आगे कार्रवाई हो सकती है। पिछले साल हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने भी जाति के आधार पर भेदभाव को रोकने के लिए ऐसा क़दम उठाया था। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के तहत कोई और कॉलेज नहीं है।

पिछले कुछ समय में कुछ और कॉलेजों में भी जाति को लेकर बहस छिड़ी है। अमेरिका में दक्षिण एशिया से आए कई छात्र इस बात की शिकायत करते हैं कि उनके साथ जाति के आधार पर भेदभाव किया जाता है। एक अमेरिकी मीडिया चैनल से बात करते हुए प्रेम परियार ने बताया कि वह नेपाल से भागकर अमेरिका आए, क्योंकि अपने देश में उनके साथ दलित होने के कारण भेदभाव किया जाता था। प्रेम के अनुसार, अमेरिका के कॉलेज में भी उन्हें जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा। इस प्रस्ताव को यूनिवर्सिटी सिस्टम तक लाने और पारित कराने में प्रेम परियार का ख़ास योगदान रहा है।

America

प्रस्ताव के समर्थक इसे लेकर उत्साहित हैं। वहीं, यूनिवर्सिटी ने भी इसका स्वागत किया है। विश्वविद्यालय के जोसेफ कास्त्रो ने शिक्षकों और छात्रों की तारीफ करते हुए कहा कि उनकी मेहनत के कारण ही यह प्रस्ताव पारित हुआ, जो यूनिवर्सिटी की साहसिक आकांक्षाओं के अनुरूप है।

असल में अमेरिका में कार्यरत भारतीय प्रफेसर जाति को भारतीय समस्या बताकर खारिज करते रहे हैं। अधिकतर प्रफेसर यह मानते हैं कि अमेरिका आने के बाद भारतीयों के लिए जाति कोई बड़ी चीज़ नहीं रह जाती। पिछले कुछ वर्षों में यह बात बिल्कुल ग़लत साबित हुई है। कई छात्रों ने कहा कि जाति के नाम पर उनके साथ भेदभाव किया जाता है।

अमेरिका में इक्विटी लैब्स नाम की गैर सरकारी संस्था जातिगत भेदभाव से जुड़े आकड़े इकट्ठा करती है। 2016 में लैब ने अमेरिका में दक्षिण एशिया से आए 1500 छात्रों के बीच एक सर्वे किया। इसमें तीन में से एक दलित छात्र ने कहा कि अमेरिका में पढ़ाई के दौरान उन्होंने भेदभाव झेला है। तीन में से दो दलितों ने कहा कि अमेरिका में नौकरियों में उन्होंने भेदभाव होता पाया।

कैलिफोर्निया में ही पिछले साल सिस्को कंपनी में जातिगत भेदभाव का मुद्दा सामने आया था। इस मामले में एक दलित इंजीनियर ने आरोप लगाया था कि उनके साथ दो वरिष्ठों ने जाति के आधार पर भेदभाव किया। इस मामले ने तूल पकड़ा और सिविल राइट्स के लिए काम करने वाली संस्थाओं ने मांग की थी कि जाति के मसले पर कंपनियों को नियम बनाने चाहिए। आने वाले समय में अगर कंपनियों और देश की अलग-अलग यूनिवर्सिटियों में जाति को भेदभाव की कैटेगरी में रखा जाए, तो कई आश्चर्य नहीं। ऐसा इसलिए भी संभव है क्योंकि न केवल दफ्तरों, बल्कि कॉलेजों और शिक्षण संस्थानों में भारतीय लोगों की संख्या पिछल कुछ बरसों में तेज़ी से बढ़ी है।

माना जाता है कि भारत से निकलने के बाद लोग अमेरिका आकर अपनी नई पहचान बनाते हैं। जन्म से जुड़ी पहचान की बजाय वो अपनी शिक्षा और मेहनत से नए मुकाम पर पहुंचते हैं। हालांकि पिछले कुछ बरसों की घटनाओं को देखते हुए और इक्विटी लैब के सर्वे की मानें, तो दक्षिण एशिया के लोग अमेरिका आने के बाद भी अपनी जन्म से जुड़ी जातिगत पहचान को नहीं छोड़ते। इस आधार पर वो दूसरों के साथ भेदभाव भी कर रहे हैं।

आवाज़ : रोहित उपाध्याय
*ये लेखक के निजी विचार हैं

Web Title:

Caste discrimination in the United States | Discrimination in US

(Hindi podcast on Navbharat Gold)

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