राहुल गांधी ने अपने बयान से फिर आफत मोल ले ली है। उनके अनुसार भारत राष्ट्र नहीं, राज्यों का संघ है। ऐसा नज़रिया कहां से आता है कांग्रेस नेता के पास

यह भी सुनें या पढ़ें : चुनाव में सांप्रदायिकता का खेल कांग्रेस ने शुरू किया
यह भी सुनें या पढ़ें : कौन लेगा कांग्रेस की जगह, आप या टीएमसी?

राजनीतिक आग्रह के कारण आप मान लें तो आपकी इच्छा है, और ऐसे ही किसी दुराग्रह के कारण न मानना चाहें तो भी आपकी ही इच्छा है, पर यह सच है कि देश में इस समय दो विचारधाराएं चल रही हैं। एक विचारधारा वह है, जो देश को एक मानकर चलती है। इस विचारधारा ने मान रखा है कि देश में अनेक भाषाएं हैं, अनेक जातियां हैं, अनेक जनसमूह हैं( यह विचारधारा उस अनेकता, विविधता, पृथकता को अंगीकार करते हुए भी देश को एक मानती है और उसी विचारधारा में से एक राजनीतिक नारा पैदा हुआ है- सबका साथ, सबका विकास। इसका फिर विस्तार इस रूप में होता है कि सबका विश्वास और फिर आगे विस्तार हुआ है कि सबका प्रयास।

दूसरी विचारधारा यह कहती है कि देश में विविधता है, अनेकता है, अनेकरूपता है। पर इस विचारधारा में से यह मंत्र आज तक विकसित नहीं हो पाया कि उस विविधता, अनेकता, अनेकरूपता को एक सूत्र में, एक धागे में, एकता में कैसे पिरो देना है। इसी विचारधारा ने कोशिश की थी कि धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद में से एकता के रूप खंगाल लिए जाएं, खोज लिए जाएं, पर यह विचारधारा ऐसा नहीं कर पाई। क्यों नहीं कर पाई? इसलिए कि समाजवाद एक विदेशी सोच है और कोई भी देश या समाज विदेशी सोच के सहारे खड़ा नहीं हो सकता, हुआ भी नहीं है। धर्मनिरपेक्षता तो विचारधारा भी नहीं है। वह तो देश यानी शासन-प्रशासन चलाने का एक ज़रिया भर है, जो देश, काल, समाज के हिसाब से बदलता रहता है।

राहुल गांधी जिस खानदान और खानदानी सोच के आधार पर सोचते और बोलते हैं, ये वह सोच है, जो भारत से, देश से कटी हुई है। समाजवाद यानी विदेशी सोच। धर्मनिरपेक्षता यानी विदेशी सोच। और नेहरू-गांधी खानदान इस विदेशीपन से जुड़ा हुआ है। इसी से संकट पैदा हुआ है। इसके विपरीत पीएम नरेंद्र मोदी ने सोचा कि वह हिंदू-मुस्लिम के आधार पर विकास का कोई मॉडल खड़ा ही नहीं करेंगे और उन्होंने सिद्धांत पेश कर दिया- सबका साथ, सबका विकास। राहुल गांधी अपनी जिस (नवीनतम) सोच के आधार पर, सोच के सहारे भारत और उसके संविधान को समझने की कोशिश कर रहे हैं, वह सोच इसी पिटी-पिटाई, घिसी-पिटी विविधतावादी नारे को भरपूर उछाल रही है, पर इसमें से एकता, एकरूपता, एकात्मकता का कोई फॉर्म्युला उसके पास है ही नहीं।

राहुल गांधी कह रहे हैं कि काश उनके विरोधियों ने और विरोधी तो उनका एक ही है यानी पीएम नरेंद्र मोदी ने इतिहास पढ़ लिया होता। पर यही इच्छा, यही मांग, यही उम्मीद पूरा देश कर रहा है कि काश राहुल गांधी ने अपने देश और उसके इतिहास को पढ़ा बेशक नहीं होता, इतिहास की ओर महज झांक भर लिया होता तो उनकी समस्याएं हल हो गई होतीं। उन्हें सिर्फ तीन काम करने थे। सिर्फ तीन।

Rahul Gandhi

एक काम यह करना था कि उन्होंने भारत के स्मृतिग्रंथों के कुछ पन्ने पलट लिए होते। वैसा करना अगर मुश्किल था तो भारत रत्न पीवी काणे लिखित 'भारत का धर्मशास्त्र' (चार खंडों में) के चंद पन्ने देख लिए होते और उन्हें अपना अज्ञान-अंधकार चंद मिनटों में ही दूर होता नज़र आ जाता। भारत का धर्मशास्त्र यानी भारत का प्रत्येक स्मृतिग्रंथ, जिनमें मनुस्मृति भी शामिल है, आपको बिना ख़ास मेहनत किए ही बता देते कि देश में अनेक जातियां, अनेक भाषाएं, अनेक जनसमूह और इतने राज्य क्यों हैं? क्यों इनके यही नाम हैं और कैसे इन राज्यों की ये सीमाएं खिंच गईं?

राहुल गांधी को यह सब मालूम पड़ जाएगा। पर चूंकि वह अकेले ऐसे हैं, जो सब कुछ जानते हैं, इसलिए जाहिर है कि उनके अलावा कोई कुछ नहीं जानता। इसीलिए समस्या आ रही है और यह समस्या भी उन्हें आ रही है। देश को कोई समस्या नहीं आ रही, क्योंकि देश को तो सब पता है। देश को सब पता इसलिए है, क्योंकि इसी कांग्रेस के भारत-विज्ञ नेताओं ने, जिनका अविभाज्य संबंध इसी कांग्रेस पार्टी से रहा है, ऐसे लाला लाजपत राय, केएम मुंशी, बालासाहेब भीमराव आम्बेडकर, सरदार पटेल, सुभाषचंद्र बोस जैसे कांग्रेस धुरंधरों से ही इन सर्वज्ञ राहुल गांधी को सब मालूम पड़ जाता क्योंकि देश के स्वातंत्र्य आंदोलन से जुड़े इन सभी धुरंधरों की राजनीति और इनके तमाम राजनीति-कर्म से हमेशा राष्ट्रवादी सोच का ही विकास होता रहा है। पर जब से सारा ज्ञान 'भारत एक खोज' की संदूक में सिमट गया और फिर उसी संदूक में बंद हो गया और उस संदूक की मिल्कियत भी फिर विदेशी हाथों को थमा दी गई, तब से इस देश की इसी कांग्रेस ने सोचने का काम बंद कर रखा है और अपनी आंखों पर विदेशी पट्टी भी बांध ली है। दिमाग पर ताला भी लगा दिया है।

राहुल गांधी जो भी राजनीति करते हैं, जो भी राजनीतिक सोच रखते हैं। जो भी राजनीतिक ऊंच-नीच करते हैं, वह सब उसी संदूकची में से निकलता है, जिस पर विदेशीपन का ताला लगा होता है अन्यथा राहुल गांधी के पास आम्बेडकर, मुंशी और लाला लाजपत राय की सोच भी उपलब्ध है, पर वह सब जानने-पढ़ने-समझने के लिए खानदान की चारदिवारी को लांघकर खुले में आना होता है। जो शायद अब इस बासी पड़ चुके खानदान के किसी भी शख़्स के लिए संभव ही नहीं है।

पर नहीं, राहुल गांधी को तो ये सब बड़े नाम भी नहीं मालूम होंगे। उन्हें तो ख़ुद अपने परनाना/परदादा का नाम तक याद नहीं रहता होगा। फिर अपने कुल, शील, गोत्र का पता वह भला क्यों रखेंगे? इतना भर भी अगर वह तरीके से पढ़ लेते, पढ़ते नहीं तो तरीके से अपने भरोसे के लोगों से ही पढ़वा लेते, तो उन्हें समझ में आ जाता कि भारत के संविधान में आए इन विविधतावादी, अनेकतावादी शब्दों का क्या मतलब है। पर उन्हें यह सब करना नहीं है। उन्हें तो बस कुछ अंड-बंड बोलकर देश-दुनिया में हमेशा की तरह हंसी का पात्र ही बनना है। उन्हें अगर यही करना है तो वह ऐसा करने को स्वतंत्र हैं। देश में खुला लोकतंत्र है, जो उन्हें कुछ भी करने की आज़ादी देता है।

आवाज़ : बबीता जैन

आलेख रेट करें

आज ही न्यूजलेटर और नोटिफिकेशंस को सब्सक्राइब करें

हिन्दी हैं हम! भारत की दुनिया, दुनिया में भारत

Copyright @2022 BCCL. All Rights Reserved