पिछले दिनों गृह मंत्री अमित शाह ने अंग्रेजी की जगह हिंदी में बात करने को कहा तो विवाद खड़ा हो गया। इस विवाद और हिंदी क्या राष्ट्रभाषा बन सकती है, इस पर क्या है फिल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह की राय? गृह मंत्री के इस बयान को वह क्यों बता रहे हैं जुमला? नसीर साउथ की फिल्मों की कामयाबी से भी खुश हैं, लेकिन क्यों? जमील गुलरेज को दिए इंटरव्यू में नसीरुद्दीन शाह ने दिए हैं इन सवालों के जवाब :

कोई ये डिफाइन करे कि हिंदुस्तानी खाना क्या होता है तो आप कौन से खाने का बयान करेंगे? पचास तरह के खाने होते हैं। इसी तरह हिंदुस्तान में ढेरों जुबानें हैं, सब की सब अपनी जगह महान हैं। किसी को भी रिप्लेस करना, एक जुबान उनके हलक में ठूंसना कि तुम्हें यही बोलनी पड़ेगी, ये जरा डरावनी बात है

इन दिनों फिल्मों में भाषा को लेकर काफी हंगामा देखने को मिल रहा है। खासकर जबसे साउथ से कुछ सुपरहिट फिल्में आई हैं। वहीं हिंदी को लेकर भी पिछले दिनों आए एक राजनीतिक बयान के बाद भी बड़े-बड़े लोगों ने बयान दिए, बहसें हुईं। उर्दू तो खैर हमेशा से ही निशाने पर रही है। इन्हीं सारी बातों पर मशहूर फिल्म और थिएटर अभिनेता नसीरुद्दीन शाह से बात की जमील गुलरेज ने। पेश हैं प्रमुख अंश :

आपके उर्दू अदब से इश्क का जो सफर है, उसके बारे में कुछ बताइए।
इत्तेफाक से यह सफर मिर्जा गालिब सीरियल करते वक्त ही शुरू हुआ। बचपन में हम लोग अंग्रेजी स्कूल में पढ़ा करते थे। तीन महीने की छुट्टियां हुआ करती थीं, जिसमें हमें कुरान शरीफ और अलिफ, बे, ते पढ़ाया जाता। कुरान शरीफ पढ़ने का फायदा मेरे तलफ्फुज में बहुत हुआ है। स्कूल में जब हम थे तो ना उर्दू में किसी से बात होती थी, ना लिखने का रियाज होता था। अम्मी और बाबा को खत लिखा करते थे कि उर्दू हमसे लिखी नहीं जाती। स्कूल में 11 साल अंग्रेजी बोल-बोलकर उर्दू मैं बिलकुल भूल गया, कोई ताल्लुक ही नहीं रहा।

फिर तो सवाल यह भी उठता है कि क्या उर्दू सिर्फ मुसलमानों की जुबान है? सारे मुसलमानों को उर्दू आती ही है?
यह बहुत बड़ी गलतफहमी है जो दूर होनी चाहिए। हालांकि इसके दूर होने का इमकान मुझे नजर नहीं आता। यह तो जबरदस्ती मुसलमानों की जुबान बनाई जा रही है। इस पर लगाम लगाई जा रही है, और क्या मालूम कि यह कब तक जिंदा रह सकेगी। यह अजीब विडंबना है कि एक ऐसी जुबान जो इसी मुल्क में पैदा हुई, पली और दुनिया के सारे मुल्कों में बस इसी मुल्क में बोली जाती है, उसे एक विदेशी भाषा का दर्जा दिया जा रहा है।

मगर अब तो उर्दू में वेबसाइटें भी हैं, हिंदी में उर्दू का ढेरों कंटेंट है। अब उर्दू का क्या फ्यूचर दिखता है?
दुआ करता हूं कि सलामत रह सके, क्योंकि मां बाप भी अपने बच्चों से अंग्रेजी में ही बात करते हैं। बचपन से ही, जबसे बच्चा सुनना शुरू करता है। यह अफसोस की बात है, लेकिन सच है। यह जुबान मर नहीं सकती क्योंकि यह इस कदर खूबसूरत जुबान है और इतने सारे लोग बोलते हैं। पाकिस्तान में कहने को उर्दू राजभाषा है लेकिन वहां 32 जुबानें और बोली जाती हैं। हमारे यहां उर्दू साउथ से नॉर्थ तक, ईस्ट से वेस्ट तक जो फैली हुई है। हजार मिटाने की कोशिश करें लेकिन मेरे ख्याल से उर्दू सलामत रहेगी।

पहले साहित्य भाषा गढ़ता था, पर लंबे अरसे से सिनेमा भाषा गढ़ रहा है। हम देख रहे हैं कि फिल्मों में गालियों का बड़ी बेबाकी से इस्तेमाल हो रहा है। आपकी क्या राय है?
आपके और हमारी जवानी के दिनों में फिल्मी गानों उर्दू के अल्फाज आम थे। अब आप देखिए, आप घटा, जुल्फ या सहर लफ्ज गानों में नहीं सुनेंगे। और जुबान में बेहूदगी डाल देना, लोगों को लगता है कि जुबान में कुछ ताकत आ जाती है। हमारे ऊपर यह अमेरिकी फिल्मों का असर है, खासतौर से ओटीटी पर तो बहुत ही ज्यादा है। मैं उम्मीद करता हूं कि यह एक फेज है, जो गुजर जाएगा।

अब भाषाओं को लेकर एक हंगामा सा मचा है। एक बयान आया कि अंग्रेजी छोड़ सब हिंदुस्तानियों को हिंदी में बात करनी चाहिए। साउथ के राज्यों ने इस पर हंगामा किया हुआ है। आपकी क्या राय है?
मुझे याद है कि ऐसा पंडित नेहरू के जमाने में भी हिंदी को राष्ट्रभाषा डिक्लेयर करने की बात हुई थी। तब मैं डिबेट के लिए विशाखापट्टनम गया था और वहां हर जगह 'हिंदी डाउन' लिखा रहता था। यह कोशिश पहले हो चुकी है और नाकाम रही है। दोबारा क्यों यह मसला उठाया जा रहा है, मेरी समझ में नहीं आ रहा। हो सकता है कि यूपी इलेक्शन से पहले यह जुमला इस्तेमाल किया गया होगा। हिंदी हमारी नैशनल जुबान बन ही नहीं सकती। कोई ये डिफाइन करे कि हिंदुस्तानी खाना क्या होता है तो आप कौन से खाने का बयान करेंगे? पचास तरह के खाने होते हैं। इसी तरह हिंदुस्तानी जुबान कौन सी है तो जवाब है कि हिंदुस्तानी। हिंदुस्तान में ढेरों जुबानें हैं, सब की सब अपनी जगह महान हैं। किसी को भी रिप्लेस करना, एक जुबान उनके हलक में ठूंसना कि तुम्हें यही बोलनी पड़ेगी, ये जरा डरावनी बात है। क्योंकि होम मिनिस्टर कुछ कहते हैं, प्रधानमंत्री कुछ कहते हैं। एक तरफ होम मिनिस्टर ने यह बयान दिया, दूसरी ओर प्रधानमंत्री चेन्नै में कहने लगे कि तमिल पर हमें गर्व है। मेरे ख्याल से यह जुमला ही था जो खत्म हो जाएगा, क्योंकि इसको लागू करना नामुमकिन है। अब हजार आप रोक लगाते रहें, शराब बेचने वालों का धंधा बंद थोड़े ही हुआ होगा! हजार आप नोटबंदी करिए, काला धन खत्म थोड़े ही हुआ!

साउथ की फिल्में ज्यादा छाई हुई हैं हिंदी में भी। लोग कह रहे हैं कि साउथ वाले हावी हो जाएंगे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री पर...
बहुत अच्छी बात है कि हावी हो जाएंगे, क्योंकि साउथ हमसे हमेशा एक कदम आगे रहा है। जब विडियो टेप्स वगैरह शुरू हुए थे तब तेलुगु की फिल्में हिंदी फिल्मों से ज्यादा कमाती थीं। बहुत अच्छा नहीं कह सकते उन फिल्मों को क्योंकि वो कर्मशल दायरे में ही आती हैं। लेकिन उस दायरे में भी उनकी फिल्मों में बेहतरीन टेक्निकल एक्सिलेंस और फिनिश होती है। कई तमिल फिल्मों में टेस्ट बहुत खराब होता है लेकिन आमतौर पर कन्नड़ या मलयालम की फिल्में हमेशा हमारे मुंबई सिनेमा से आगे रही हैं। मुंबई सिनेमा ने कई बार उन फिल्मों को दोबारा बनाया है, और मजे की बात ये कि साउथ वालों ने उस हिंदी फिल्म को दोबारा बनाया है। उनमें कहीं पर ओरिजनैलिटी तो है वर्ना ऑडियंस क्यों जाती है उन्हें देखने और हिंदी फिल्मों में क्यों नहीं जा रही है? तंग आ गए हैं लोग मेरे ख्याल से।

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