यह आलेख क्यों पढ़ें?

  • कौन है सीरियल किलर राजा कोलंदर?
  • इंडियन प्रिडेटर : द डायरी ऑफ अ सीरियल किलर रिव्यू
  • The Lord Of The Rings-The Rings Of Power रिव्यू
  • खुदा हाफिज चैप्टर 2 अग्नि परीक्षा का रिव्यू

असगर : नमस्कार आदाब दोस्तों। हाजिर है आपका फेवरिट पॉडकास्ट आओ बिंज करें। हम आपको बताएंगे इस हफ्ते पांच उन फिल्मों और वेब सीरीज के बारे में, जो ओटीटी पर हो रही हैं स्ट्रीम। तो इस हफ्ते उपमा आज के टॉप 5 क्या हैं? उस बारे में बताइए।

असगर, आज हम चर्चा करेंगे, नेटफ्लिक्स की डॉक्यूमेंट्री इंडियन प्रिडेटर: द डायरी ऑफ अ किलर और थिएटर से होकर पहुंची फिल्म एक विलन रिटंर्स की, एमेजॉन प्राइम विडियो पर आई द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स: द रिंग्स और फिल्म सीता रामम की। साथ ही बताएंगे, जी फाइव पर आई खुदा हाफिज चैप्टर 2 अग्निपरीक्षा के बारे में भी।

1. इंडियन प्रिडेटर : द डायरी ऑफ अ सीरियल किलर रिव्यू
इंडियन प्रिडेटर का पहला पार्ट जुलाई में आया था, जिसमें सीरियल किलर चंद्रकांत झा के जुर्म की दास्तान दिखाई गई थी। उस डॉक्युमेंट्री सीरीज में आपको जितनी खामियां नजर आई होंगी। वो सब खामियां इंडियन प्रिडेटर : द डायरी ऑफ अ सीरियल किलर ने दूर कर दी हैं।

अपराध की साइकॉलजी को इस तरह पेश करती है कि दिमाग सुन्न हो जाए। शो में तकरीबन 40-40 मिनट के तीन एपिसोड हैं। कहानी शुरू होती है पत्रकार के गायब होने से। जब पुलिस तफ्तीश करती है तो सामने आता है एक ऐसा अपराधी जो खुद पत्रकार का दोस्त था। नाम राम निरंजन कौल। जो अपने आप को कहता था राजा कोलंदर। केस की जांच करने वाले पुलिस अफसर डॉक्यूमेंट्री में बताते हैं कि राजा कहता था उसने आदमी का सिर 'कट कर दिया। पता नहीं वो क्या है वहशी, नर, नरपिशाच।' पुलिस की जांच आगे बढ़ाती है तो एक डायरी मिलती है। और उसमें मिलते हैं 14 नाम। ये वो नाम हैं, जिनको राजा ने कत्ल कर दिया। कत्ल कैसे किया, ये सुनकर कोई भी दहल जाएगा। सिर को काटना, लिंग को काटना, और दिमाग उबालकर पी जाना, ताकि मरने वाले की विशेषता उसके अंदर समा जाए।

आखिर क्यों करता था वो ऐसा? इस सवाल का जवाब सीरीज देती है। जिसके पीछे उसका मकसद सिर्फ पावर हासिल करना था। और एक दिलचस्प पहलू ये भी है कि उसने अपने बच्चों के नाम भी बड़े ही अजीब रखे थे। एक बेटे का नाम अदालत, एक का नाम जमानत। और बेटी का नाम आंदोलन। इसके पीछे उसकी क्या सोच थी? जेल में उसने तंत्र विद्या पर क्यों जोर दिया? वो कैसे राम निरंजन कौल से राजा कोलंदर बन गया? इन तमाम सवालों को बेहद अच्छे से बुना गया है। और सीरीज में साथ ही साथ साइकॉलजिस्ट, एन्थ्रोपॉलजिस्ट राजा कोलंदर के समाजिक समीकरण और उसकी सोच की परतें खोलते रहते हैं।
सिर्फ सीरीज में यही चौंकाने वाले एलिमेंट्स नहीं हैं कि उसने कत्ल कैसे किया। बल्कि चौंकाने वाले पहलू उस वक्त सामने आते हैं, जब कैमरे पर खुद राजा कोलंदर आता है। फुल टशन के साथ। उसका बेटा आता है। बेटी आती है। और उनके बयान जिस तरह अलग अलग सामने आते हैं, वो उसका सच सामने रख देते हैं।

सुदीप निगम की राइटिंग और धीरज जिंदल का डायरेक्शन बहुत जबरदस्त है। जो आपको इंगेज करके रखता है। और हर सीन में चौंकाता है। कमजोर दिल वालों के लिए बेहद शॉकिंग शो है। कत्ल और खून के वीभत्स वाले सीन्स हैं। इसी वॉर्निंग के साथ देखें। अबतक की बेहतरीन इंडियन डॉक्यूमेंट्री इसे कहा जाए तो ये कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। क्योंकि विक्टिम, पुलिस अफसर और तमाम लोगों के इंटरव्यूज के साथ, जिस तरह पूरी वारदात को रीक्रिएट किया गया है, वो बेहद जानदार, शानदार और कमाल है।

2- एक विलन रिटंर्स रिव्यू
कभी फिल्म आशिकी 2 से रोमांटिक फिल्मों के निर्देशक के तौर पर अपना सिक्का जमाने वाले निर्देशक मोहित सूरी ने साल 2014 में आई रोमांटिक थ्रिलर फिल्म एक विलेन से अपनी इस पहचान को और पुख्ता किया था। मोहित सूरी की ये फिल्म खासी कामयाब रही थी और उसकी वजह थी एक प्यारी सी प्रेम कहानी, बढ़िया गाने और साइको किलर के रूप में जबरदस्त अभिनय करने वाले रितेश देशमुख। इस साल मोहित अपनी इस फिल्म का सीक्वल एक विलन रिटंर्स लेकर आए लेकिन शीर्षक के अलावा इस फिल्म को पहले वाली और कोई भी खूबी रिटर्न नहीं कर पाए हैं।

इस बार फिल्म में दो प्रेम कहानियां हैं, एक आरवी यानी तारा सुतारिया और गौतम मेहरा यानी अर्जुन कपूर की। गौतम रईस बाप का बिगड़ैल बेटा है, जिसका तकियाकलाम है कि मरना चलेगा, हारना नहीं और फिल्म में वह यह तकिया कलाम इतनी बार बोलता है कि सुनकर कान पक जाए। अपनी जिद पूरी करने के लिए वह अपनी एक्स को उसकी शादी में जाकर बेइज्जत करने से लेकर एक चर्चित सिंगर को डराने तक कुछ भी कर सकता है। आरवी सिंगर बनना चाहती है और उसका ये सपना सच करने में मदद करता है गौतम। लेकिन एक दिन आरवी अजीबोगरीब परिस्थिति में गायब हो जाती है और उसका इल्जाम आता है गौतम पर।

इधर, एक प्रेम कहानी भैरव पुरोहित यानी जॉन अब्राहम और रसिका यानी दिशा पाटनी की है। टैक्सी ड्राइवर भैरव एक मॉल में सेल्स गर्ल रसिका के प्यार में पागल है। उसके लिए वह फिजूल शॉपिंग करता है। हां, इन महंगे आइट्म्स को खरीदने के लिए वो इतने पैसे कहां से लाता है, वो किसी को नहीं पता। खैर, रसिका भैरव की इसी दीवानगी का फायदा उठाती है और जब भैरव को यह अहसास होता है तो वह सभी एक तरफा आशिकों का मसीहा बनकर उनका प्यार ठुकराने वाली लड़कियों को मौत के घाट उतारने लगता है। अब गौतम और भैरव के रास्ते कैसे एक-दूसरे से टकराते हैं, कौन किसकी कहानी का हीरो बनता है और कौन विलेन? इसी लाइन पर फिल्म में सस्पेंस और थ्रिल पैदा करने की कोशिश की गई है, जिसमें मोहित सूरी पूरी तरह नाकाम रहते हैं। फिल्म में ट्विस्ट तो आखिर तक डाले गए हैं, लेकिन वे बिना किसी लॉजिक यानी बे सिर पैर के होने के चलते कोई असर नहीं छोड़ पाते। न तो किरदारों के बैकग्राउंड के बारे में ठीक से पता चलता है, न उनकी हरकतों की वजह भरोसे लायक लगती है। डायलॉग्स में विलन शब्द तो ऐसे जबरदस्ती ठूंसा गया है कि आपको रट जाए। इसी तरह, फिल्म में पुलिस भी है, पर उसकी भूमिका किलर को पकड़ने की उसकी साइकोलॉजी समझाने की ज्यादा दिखती है। कुल मिलाकर, फिल्म उबाऊ है। ऐक्टिंग में भी सिर्फ अर्जुन का काम कुछ ठीकठाक है, वरना जॉन तो पूरे वक्त फ्लैट फेस रहे हैं, तो दिशा और तारा ग्लैमर ऐड करने के अलावा कुछ नहीं करती। पिछली एक विलन में जहां गाने बड़ी यूएसपी थे, यहां मैंने तेरा नाम दिल रख दिया के अलावा कोई गाना याद रखने लायक नहीं है। थिएटर में इस फिल्म को पब्लिक पहले ही रिजेक्ट कर चुकी है, अब ओटीटी पर आपको इसमें अपना समय खपाना है या नहीं, आप खुद तय कर लीजिए।

3. The Lord Of The Rings-The Rings Of Power रिव्यू
असगर : द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स : रिंग्स ऑफ पॉवर अब तक की सबसे महंगी सीरीज बनने जा रही है। एमेजॉन प्राइम विडियो पर अभी इसके दो एपिसोड आए हैं। मगर वादा पांच सीजन बनाने का है। रिव्यू से पहले इस सीरीज के बनने की कहानी जान लेते हैं। साल 2001 की बात है जब 'द फेलोशिप ऑफ द रिंग्स’ फिल्म बनी थी। उसके बाद 2002 और 2003 में ‘द टू टॉवर्स’ और ‘द रिटर्न ऑफ द किंग’ नाम से फिल्में बनीं। ‘लॉर्ड ऑफ द रिंग्स’ सीरीज की इन तीन फिल्मों ने दुनियाभर में धूम मचा दी। क्योंकि बनीं 28 करोड़ डॉलर में थीं। मगर कमाई 299 करोड़ डॉलर की कर डाली थी। अब इन्हीं कहानियों पर वेब सीरीज बनाने के लिए 25 करोड़ डॉलर में तो इसके राइट्स खरीदे गए हैं। इसके बाद कलाकारों की फीस, बनाने की लागत वगैरा वगैरा...। तो इस लिहाज से ये महंगी सीरीज बन रही है। लेकिन अब सवाल है कि क्या उस वक्त की ये चमत्कारिक कहानियां अब भी दर्शकों को पसंद आएंगी, तो चलिए जानते हैं दो एपिसोड का रिव्यू।

जे आर आर टोल्किन के नॉवेल द लॉर्ड ऑफ दे रिंग्स पर बनी फिल्मों को रिंग्स ऑफ द पॉवर में पेश किया जा रहा है। मगर पहले एपिसोड में जब हम एंट्री करते हैं। तो एक के बाद एक किरदार सामने आते हैं। और कई कहानियां शामिल होती जाती हैं। इन तमाम किरदारों की अलग अलग दुनिया बसी है। पहला ही एपिसोड आपको इतने बड़े फलक पर ले जाता है कि आपका ज़हन किरदारों को संभालने में नाकाम सा होता जाता है। हजारों साल पहले की कहानियां आपको उलझाने लगती हैं।

या ये कहा जाए कि पहले दो एपिसोड किरदारों को विस्तार देने में लगे हैं, आने वाले एपिसोड में अपनी दुनिया में ये दर्शकों को लेकर जाएंगे। अगर डायरेक्शन की बात की जाए तो ऐसा लगता है जैसे हाई टेक्नीक में स्टूडियो के पेच लगा दिए गए हैं। बर्फ के सीन्स देखकर साफ दिख रहा होता है कि कैमरे को घुमाकर शूट किए गए हैं। और एक्टर फालतू के एक्सप्रेशन दे रहे हैं।

सीरीज के राइटर हैं पैट्रिक मैकके, जॉन डी पाइन, जैसन काहिल, जस्टिन डॉबल और जेनिफर हचिन्सन। अब ये लोग मिलकर आगे कमाल कर पाए हैं या नहीं या फिर कहानी को कर दिया गडमड ये तो अगले एपिसोड देखकर ही पता चलेगा। अदाकारी की जाए तो अभी तो कुछ ऐसा खास नहीं, जिसके लिए कुछ कहा जाए। लेकिन आगे मोरफिड क्लार्क, रॉबर्ट अरमायो, नाजनीन बोनियाडी, बेंजामिन वाकर और सिंथिया अड्डाई रॉबिनसन क्या कमाल कर पाएंगे? उसके लिए इंतजार करिए।

4- सीता रामम रिव्यू
प्यार के कई कालजयी किस्से आपने सुने होंगे, कुछ सिनेमाई पर्दे पर भी देखे होंगे, सीता रामम ऐसे ही प्यार की खूबसूरत दास्तान है। जिस तरह कभी सीता मैया ने अपने राम के लिए महलों का सारा सुख-वैभव त्याग वन का कठिन जीवन चुना था। वैसे ही, यहां भी एक सीता है, जो अपने राम के लिए सारा धन-ऐश्वर्य खुशी-खुशी त्याग देती है। एक नेकदिल राम है, जो दुश्मन देश की एक मासूम बच्ची को बचाने की खातिर अपना सब कुछ कुर्बान कर देता है और ये कहानी इन दोनों के प्यार की है।

कहानी दो कालखंडो में चलती है। एक 1964 के दौर में, जहां लेफ्निटेंट राम यानी दुलकर सलमान अपनी मद्रास बटालियन के साथ कश्मीर में तैनात है। यहां एक गांव में धार्मिक हिंसा भड़कने पर राम अपनी सूझबूझ और दिलेरी से न केवल तमाम लोगों की जान बचा लेता है बल्कि वहां वापस धार्मिक सौह्रार्द बनाने में भी कामयाब रहता है और बन जाता है नैशनल हीरो। वो हीरो, जिसके रेडियो पर अनाथ होने की खबर सुन सारा देश अपना बना लेता है और उसे चिठ्ठियां भेजने लगता है। कोई उसे अपना बेटा मान लेता है, तो कोई भाई। इन्हीं चिठ्ठियों में सीता की चिठ्ठी भी आती है, जो उसे अपना पति बताती है। राम को इन बिना बिना पते वाली चिठ्ठियां लिखने वाली सीता से प्यार हो जाता है और वह उसे ढूंढ़ने निकल पड़ता है।

इधर, एक कहानी बीस साल बाद यानी 1984 में चलती है, जहां पाकिस्तानी सेना के एक अधिकारी की लंदन रिटर्न पोती आफरीन यानी रश्मिका मंदाना अपने दादा की जायदाद पाने के चक्कर में उसका आखिरी काम पूरा करने हिंदुस्तान आती है। उसे राम का एक खत सीता तक पहुंचाना है लेकिन सीता की ये तलाश उसे कहां तक ले जाती है? क्या जिसे सब सीता समझ रहे हैं, वही उसकी असली पहचान है? उसके दादा और सीता-राम का क्या कनेक्शन है? ये सारी बातें बड़ी मुलायमियत से कहानी में पिरोई गई हैं।

फिल्म राम और सीता के प्यार के बहाने नफरत पर प्यार की जीत, बुराई पर अच्छाई की जीत, धर्म पर इंसानियत की जीत जैसी कई बड़ी बातें कहती है और इसके लिए को-राइटर और डायरेक्टर हनु राघवपुडी की भरपूर तारीफ बनती है। उन्होंने फिल्म को बहुत ही प्यार से बनाया है। हर फ्रेम बेहद खूबसूरती से रचा है, जिसमें उन्हें सिनेमटोग्राफर पीएस विनोद और श्रेयस का अच्छा साथ मिला है। इसके चलते, कश्मीर की वादियों में सेट ये फिल्म ओस की बूंद सी ताजगी महसूस कराती है। साथ ही दुलकर सलमान और मृणाल ठाकुर जैसे कलाकारों ने उनके राम और सीता को भी जीवंत कर दिया है। दुलकर की पर्सनैलिटी से राम की अच्छाई हर पल टपकती है, वहीं मृणाल ठाकुर जितनी खूबसूरत लगी हैं, उतनी ही जहीन अदाकारी भी की है। बाकी किरदारों में रश्मिका मंदाना, सचिन खेड़ेकर, भूमिका चावला, प्रकाश राज आदि ने भी अपने किरदारों संग न्याय किया है। ऐसे में, संडे की छुट्टी में इस फिल्म को देखना बनता है। हालांकि, मूल रूप से तेलुगु में बनी यह फिल्म थिएटर में तो हिंदी में भी आ चुकी है, पर ओटीटी पर यह हिंदी में मौजूद नहीं है, जो हिंदी भाषी दर्शकों के लिए थोड़ी निराशा की बात हो सकती है।

5. खुदा हाफिज चैप्टर 2 अग्नि परीक्षा रिव्यू

और अब बात खुदा हाफिज़ के दूसरे पार्ट की। जिसको नाम दिया गया है खुदा हाफिज चैप्टर 2 अग्निपरीक्षा। विद्युत जामवाल की ये फिल्म पहले थिएटर में आ चुकी है। अब जी5 पर स्ट्रीम हो रही है। फिल्म में एक्शन है, ड्रामा है, इमोशन है। मगर कहानी अपने आपको दोहराती हुई है। बॉलिवुड में पहले भी इस थीम पर फिल्में बनती रही हैं कि जब किसी इंसान पर जुल्म होता है तो वो बदला लेने के लिए कैसे गैंगस्टर, बाहुबली, या फिर क्रिमिनल बन जाता है। मगर फिल्मों के साथ एक दिक्कत है कि क्रिमिनल तो बदला लेने के लिए बनता है। होता क्रिमिनल है, मगर उसे ऐसे पेश किया जाता है जैसे वो मासूम, बेगुनाह हो। जुर्म का बदला जुर्म तो कभी नहीं हो सकता। खैर बात करते हैं फिल्म की कहानी की, तो फिल्म में विद्युत जामवाल और शिवालिका ओबेरॉय के किरदारों की प्रेम कहानी को दिखाया गया है। नरगिस अपने अतीत को नहीं भुला पा रही है। समीर उसको उस दर्द से उबारने की हर कोशिश करके थक गया है। अब उसने एक दोस्त की भतीजी को गोद लिया है। जिंदगी पटरी पर दौड़ने लगती है, मगर तभी उसका किडनैप हो जाता है, और फिर नरगिस का अतीत लौट आता है। वही दर्द उस छोटी सी बच्ची को मिलता है, बच्ची का रेप किया जाता है। और फिर मर्डर कर दिया जाता है। इसका बदला विद्युत जामवाल लेते हैं, कैसे लेते हैं, यही दिखाने के लिए भरपूर एक्शन डाला गया है।

ठाकुर जी के रोल में शीबा चड्ढा हैं, उनके किरदार को और स्पेस देना चाहिए था। शानदार काम रहा है उनका। शिवालिका ओबरॉय को स्क्रीन टाइम कम मिला है। सादगी में वो बहुत खूबसूरत लगी हैं। शुरुआती सीन्स को छोड़कर अदाकारी के लिए कुछ खास नहीं रहा है उनके पास। विद्युत जामवाल एक्शन करते हुए जबरदस्त लगते हैं। कुछ सीन्स फिल्म में बहुत पॉवरफुल रहे हैं। बच्ची के किरदार में रिद्धी शर्मा की एक्टिंग जबरदस्त रही है।

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