इंडियन मैचमेकिंग 2 में शादियां कराई जा रही है, मगर ये शो बकवास क्यों है? क्यों नहीं देखा जाना चाहिए? नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हो रही फिल्म वेडिंग सीजन में क्या है खास? क्या ये दर्शकों को लुभाने में रही कामयाब? साथ ही जानें क्राइम सस्पेंस थ्रिलर कैडवर फिल्म का रिव्यू। राष्ट्र कवच ओम कहां शुरू-कहां खत्म? कितनी बचकानी है आदित्य रॉय कपूर की ये फिल्म?

असगर : नमस्कार, आदाब दोस्तों, ले आए हैं आपका पसंदीदा पॉडकास्ट आओ बिंज करें। मैं हूं मोहम्मद असगर और मेरे साथ हैं उपमा सिंह। बताइए उपमा आज कौन से वो पांच शोज या फिल्में हैं जिनका रिव्यू करेंगे हम?

उपमा:
आज हम बात करेंगे नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हो रही फिल्म वेडिंग सीजन और सीरीज इंडियन मैचमेकिंग सीजन 2 की। डिज्नी प्लस हॉटस्टार की फिल्म कैडवर की। एमेजॉन प्राइम विडियो पर रिलीज हुई सीरीज माइंड द मल्होत्राज सीजन 2 की और थिएटर्स के बाद जी फाइव पर आई फिल्म राष्ट्र कवच ओम की।

1. इंडियन मैचमेकिंग सीज 2 रिव्यू (INDIAN MATCHMAKING SEASON 2 REVIEW)
असगर : सबसे पहले बात इंडियन मैचमेकिंग 2 की। भारतीय शादी को संस्कारों और समारोहों का पूरा पैकेट माना जाता है। भारतीय समाज में तो शादी के कई रूप है। कई तरीके हैं। रस्में हैं रिवाज हैं। उन सबमें प्रेम विवाह तो मानो आज भी गुनाह है। लड़का लड़की का मिलन समाज एक्सेप्ट नहीं करता। इसके प्रमाण कई बार तथाकथित ऑनर किलिंग के तौर पर सामने आते हैं। मर्जी के खिलाफ या गैर बिरादरी में जाकर शादी करने वालों को मार तक दिया जाता है। और फिर उसे नाम दिया जाता है ऑनर किलिंग। जो समाज पर कलंक की तरह है। ऐसे में इंडियन मैचमैकिंग जैसे शो का होना अच्छा है, उससे उम्मीद की जाती है कि वो समाज की बेड़ियों को तोड़ने का काम करेगा। मगर इसमें जब लड़के लड़कियां अपनी साथी के लिए शर्ते गिनाते हैं तो उसमें एक जकड़न सी दिखती है। उसी दकियानूसी सोच की जकड़न, जहां आज भी शादी एक बड़ा मुद्दा है। उसे आसान बनाने के बजाय उससे उम्मीदें ज्यादा पाली जा रही हैं। शो में सीमा टापरिया हैं। जो लोगों के रिश्ते करा रही हैं। मैचमेकिंग कर रही हैं। मगर जब वो खुद निक जोनस और प्रियंका चोपड़ी की शादी पर कमेंट करती हैं। उन्हें मिस मैच बताती हैं, तो लगता है कि वो भी कहीं ना कहीं दकियानूसी सोच से ग्रस्त हैं। मिस मैच होने के पीछे वो तर्क उम्र के अंतर का होना देती हैं।

सीमा अपने हर क्लाइंट को बोलती हैं, ''थोड़ा एडजस्ट तो करना पड़ेगा। 100% किसी को नहीं मिलेगा"। ये सुन सुनकर ऐसा लगता है जैसे किसी प्रोडक्ट की सेल हो रही है। शादी जैसा मिलन नहीं। जिसमें हर बात तोली जा रही है। 34 साल के अक्षय पर तो शादी का ही दोष दिखाया गया है। चाइनीज एस्ट्रोलॉर से लेकर पंडित तक का सहारा लिया गया है। शो में सारे कपल इतने हाई फाई दिखाए गए हैं कि ऐसी शादियां सपना ही लगें। नासिक से लेकर न्यू जर्सी तक सबकुछ एकदम सेलिब्रिटी वाला फील। तो ये शादियां भारतीय परंपरा वाली नहीं दिखतीं। 8 एपिसोड हैं। तकरीबन 40 40 मिनट के। जो देखने के बाद आप खुद को ठगा हुआ महसूस करेंगे।

2. वेडिंग सीजन रिव्यू (Wedding Season Film Review)
उपमा :
दूसरे नंबर पर भी बात शादियों की है यानी बात करेंगे फिल्म वेडिंग सीजन की। असगर, रोमांटिक कॉमिडी फिल्मों की बात करें तो आपको लगभग लगभग पता ही होता है कि आखिर में क्या होगा? यानी कोई बड़ा सस्पेंस नहीं, फिर भी कुछ प्रेम कहानियां सीधी, सिंपल होने के बावजूद आपको प्यारी लगती हैं और यही बात लागू होती है, फिल्म वेडिंग सीजन पर।

कहानी विदेश में बसे दो हिंदुस्तानी आशा यानी पल्लवी शारदा और रवि यानी सूरज शर्मा की है। इंवेस्टमेंट बैंकर आशा अपने एक प्रोजेक्ट के लिए इंस्वेस्टर्स से फंड हासिल करने के लिए जीतोड़ मेहनत कर रही है। लेकिन तमाम हिंदुस्तानी मम्मियों की तरह उसकी मां को भी उसे जल्द से जल्द सेटल करने की फिक्र है। ऐसे में, वह एक मैट्रिमोनियल साइट पर उसकी प्रोफाइल अपलोड कर देती है और उस पर मैच होने वाले लड़कों से मिलने के लिए दबाव बनाने लगती है। इसी कड़ी में उसकी मुलाकात होती है, रवि यानी सूरज शर्मा से। रवि के घर पर भी कमोबेश यही हाल है। उसके पापा ने भी अपने एमआईटी रिटर्न बेटे की प्रोफाइल नमक-मिर्च का तड़का लगाकर अपलोड की होती है। खैर, रवि और आशा के बीच पहली मुलाकात में बात नहीं बनती तो आशा की मां उसे कम्यूनिटी की तमाम शादियों में शामिल होने पर मजबूर कर देती है, ताकि इन शादियों में ही उसे कोई दूल्हा मिल जाए। यहां, रवि एक बार फिर आशा से टकराता है और पड़ोसी ऑन्टियों की चुगली और तानों से बचने के लिए आशा उसे अपना बॉयफ्रेंड बता देती है। दोनों अपने परिवारों और इन ऑन्टियों से पीछा छुड़ाने के लिए फेक बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड का नाटक करते हैं पर धीरे-धीरे सच में एक दूसरे के प्यार में पड़ जाते हैं।

देखा जाए, तो ये कहानी पहले आ चुकी तमाम लव स्टोरीज की ही तरह है लेकिन आशा और रवि के किरदार, उनके बीच की केमिस्ट्री, उनके सपने, उनकी उम्मीदें आपको लुभाती हैं। हिंदुस्तानी परिवारों में बच्चों पर करियर चुनने से लेकर दूल्हा चुनने तक के लिए जिस तरह मां-बाप दबाव बनाते हैं, उससे भी आप पूरी तरह रिलेट करते हैं। हां, टॉम डे निर्देशित ये फिल्म कहीं कहीं आपको लाउड भी लगती है जैसा कि विदेशी चश्मे से हिंदुस्तानी परिवारों को देखने पर अक्सर होता है। फिर भी, पल्लवी शारदा और सूरज शर्मा की फ्रेश जोड़ी से सजी ये प्यारी सी फिल्म आपको फील गुड वाला ही अहसास कराएगी। इसलिए, फ्री टाइम में देख डालिए।

3. कैडवर (Cadaver Film Review) फिल्म रिव्यू
असगर :
तीसरे नंबर पर बात डिज्नी प्लस हॉटस्टार पर स्ट्रीम हो रही सस्पेंस, क्राइम, थ्रिलर फिल्म कैडवर की। कैडेवर का पहला सीन इतना जबरदस्त है कि पूरी फिल्म में दिलचस्पी जगाने की भरपूर कोशिश करता है। वो सीन कैरेक्टर का बेस भी तैयार करता है। मर्डर केस में परेशान पुलिसवाला माइकल यानी मुनीशकांत एक मुर्दाघर में एंट्री लेता है। वहां भयानक गंध आती है। इतनी भयानक कि माइकल को अपना रूमाल बाहर निकालना पड़ा और अपनी नाक और मुंह दोनों को ढंकना पड़ा। यहां कैसे काम करते हैं, वह खुद से बड़बड़ाता है, और वहां काम करने वाले से भी पूछता है, यह वह जगह नहीं है जहां आप जाना चाहेंगे। यह ऐसी जगह नहीं है जहां आप कुछ मिनट भी बिताना चाहेंगे।

लेकिन यह वह जगह है जहां हम पहली बार डॉ. भद्रा बनीं अमला पॉल को देखते हैं। कई लाशों और आसपास की बदबू के बीच, वह खाना खा रही हैं, बिल्कुल इस तरह जैसे किसी रेस्तरां में। वह माइकल को कुछ खाना देती है। वो ये देखकर चौंकता है कि यहां कोई खाना कैसे खा सकता है। इसके बाद खुलने लगते हैं केस के पेंच। किसका मर्डर हुआ, क्यों हुआ। किसने किया? और अब उसका बदला लेने के लिए कौन मर्डर कर रहा है। आखिर फिल्म में विलेन कौन है, ये जानने के लिए आप तमाम करैक्टर पर शक करते चले जाते हैं। क्योंकि फिल्म लेखक ने ऐसे ही करैक्टर बुने हैं ताकि आप हर किसी पर शक करें बस उस पर नहीं, जो पूरे गेम के पीछे है। क्लाइमेक्स में कहानी को हैपी एडिंग बनाया गया है।

अदाकारी की बात की जाए तो अमला पॉल ने बढ़िया परफॉर्मेंस दी है। हरीश उथमन और मुनीशकांत भी अपने किरदारों में फिट हैं। डायरेक्टर अनूप पनिकर का डायरेक्शन ठीकठाक लगा। संगीत भी अच्छा है। मगर गाने फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने में मदद नहीं करते। कहानी प्रेजेंट टाइम में कम, पास्ट में ज्यादा चलती है। अगर कोई सीन मिस किया तो कहानी मिस हो जाएगी। क्राइम थ्रिलर पसंद करने वाले ये फिल्म देख सकते हैं, बाकी को चेतावनी है कि उन्हें कुछ सीन विचलित कर सकते हैं।

4. माइंड द मल्होत्राज 2 रिव्यू (Mind The Malhotras 2 Review)
उपमा : आज की चौथी पेशकश है माइंड द मल्होत्राज 2, ओटीटी के डार्क और क्राइम ड्रामों की भीड़ में पारिवारिक नोक झोंक और कपल्स के रोजमर्रा के छोटे-छोटे मुद्दे लेकर मल्होत्रा परिवार एक बार फिर दर्शकों से रूबरू है। पिछले सीजन की तरह ही इस सीजन में भी मल्होत्रा जोड़ी, ऋषभ मल्होत्रा यानी साइरस साहूकार और शेफाली यानी मिनी माथुर अपने रिश्ते की खत्म होती गर्माहट और परिवार की उलझनों से निबटने के लिए थेरेपिस्ट डॉक्टर गुलफाम यानी डेंजिल स्मिथ का सहारा लेते हैं। परिवार में ऋषभ और शेफाली के तीन बच्चे, पढ़ाकू दीया यानी निक्की शर्मा, सोशल मीडिया इंफ्लूएंशर जिया यानी अनंदिता पैग्निस और पर्यावरण एक्टिविस्ट योहान यानी जेसन डीसूजा की अपनी-अपनी कलाबाजी भी चलती रहती है।

शेफाली इधर अपना कुकिंग चैनल पॉप्युलर करने की कोशिश कर रही है, तो ऋषभ अपनी कंपनी के मर्जर के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहा है। ऐसे में, घर और बच्चों को संभालना, एक बैलेंस बना पाना दोनों के लिए चुनौती बन जाती है। उस पर, उनकी जिंदगी में शेफाली के एक्स बॉयफ्रेंड ऋषभ यानी समीर कोचर की एंट्री इनके रिश्ते में और कॉम्प्लिकेशन बढ़ाती है। दूसरी तरफ ऋषभ की मां सुनीता यानी सुष्मिता मुखर्जी को रोशन यानी दिलीप ताहिल से प्यार हो जाता है, जिसे वह अपने बेटे से छिपाकर रखती है। कुल मिलाकर, इस डिस्फंक्शनल फैमिली में सभी के अपने ट्रैक चल रहे होते हैं।

लेकिन करण शर्मा और निर्देशक साहिल सांघा के इजराइली शो ला फैमिलिया के इस अडाप्टेशन की सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि आप इस परिवार से कनेक्ट नहीं महसूस करते। सीरीज सिटकॉम स्टाइल में बनाई गई है, लेकिन इसमें देख भाई देख या साराभाई वर्सेज साराभाई जैसी कोई बात नहीं है। कहानी में ह्यूमर ऐसा नहीं है कि आपको मजा आए। एक साधारण तरीके से ट्रैक आगे बढ़ते रहते हैं, जिसे देखकर लगता है कि इसे क्यों देख रहे हैं। सीरीज बेशक कुछ सोशल मुद्दे, मसलन उम्रदराज लोगों का अकेलापन और उनके प्यार को अपनाने, होमोसेक्सुएलिटी को नॉर्मलाइज करने जैसी चीजें उठाती है, लेकिन मल्होत्राज की जिंदगी की ये उथल पुथल आपके मनोरंजन का सबब नहीं पाती। हां, ऐक्टिंग के मामले में कलाकारों की तारीफ जरूर बनती है। मिनी माथुर, सुष्मिता मुखर्जी, साइरस साहूकार सभी ने अपने किरदार को ईमानदारी से जिया है। तो आपको ये सीरीज देखनी है या नहीं, खुद तय कीजिए।

5. राष्ट्र कवच ओम रिव्यू
असगर : और आखिर में बात करते हैं जी5 पर स्ट्रीम हो रही राष्ट्र कवच ओम की, जो थिएटर में तो ज्यादा नहीं टिकी अब ओटीटी पर कितना टिक पाएगी ये वक्त तय करेगा।

राष्ट्रभक्ति के मसाले से भरपूर ये फिल्म 15 अगस्त के मौके पर ओटीटी पर आई है। मगर फिल्म के अंदर हीरो एकदम स्पाइडर मैन बना पड़ा है। सिक्स पैक एब्स के साथ मारधाड़ कर रहा है। और जब वो पिटता है तो फिर लाइफलाइन बनकर हीरोइन एंट्री लेती है। जो गुंडों की धुलाई इस अंदाज में करती है जैसे आप कैंडी क्रश खेल रहे हों। जैसे स्क्रीन पर लिखा आता है धूम्रपान सेहत के लिए हानिकारक है, वैसे अब हिंदी फिल्मों में डायरेक्टर को स्क्रीन पर लिखना चाहिए। फिल्म में लॉजिक ढूंढना हिंदी सिनेमा के लिए हानिकारक है। बिना सिर पैर की मारधाड़ देखने के बात जब आप कहानी, डायरेक्शन, सिनेमेटोग्राफी, अदाकारी देखने की कोशिश करते हैं तो सब औसत से भी कम नजर आता है।

कहानी की बात की जाए तो एक पैरा कमांडो ओम यानी आदित्य रॉय कपूर की कहानी है। जो अपने एक्शन सीन्स के जरिए अपने पिता देव राठौर पर लगे देशद्रोही टैग को हटा रहा है। और उनकी देशभक्त साबित करने के लिए देश के गद्दारों से लड़ रहा है। हुआ ये है कि ज्यादातर देशों के पास परमाणु शक्ति है। मगर उससे बचने का फॉर्मूला नहीं। उस फॉर्मूले को भारतीय वैज्ञानिक बनाने वाले थे। मगर उनका किडनैप हो जाता है। और वो फॉर्मूला किसी और के हाथ में पहुंच जाता है। उसे ही बचाने की पटकथा है राष्ट्र कवच ओम।

आदित्य रॉय कपूर अब तक बॉलिवुड के आशिक किरदारों में नजर आए, और अब एक्शन अवतार में। रॉ एजेंट मूर्ति के किरदार में प्रकाश राज हैं। देव राठौर जैकी श्रॉफ और जय राठौर बने हैं आशुतोष राणा, काव्या के किरदार में संजना संघी हैं। मगर अदाकारी बिना कहानी के कितना फिल्म को संभाल पाती। खराब डायरेक्शन और वीएफएक्स की भेंट काबिल अदाकार चढ़ गए हैं।

हिंदी सिनेमा को लॉजिक की तरफ जरूर ध्यान देना चाहिए, नहीं तो ऐसे ही हंसी के पात्र बनते रहेंगे और फ्लॉप होते जाएंगे।

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