सस्पेंस थ्रिल से भरी है गुलशन देवैया और दृष्टि धामी स्टारर वेब सीरीज दुरंगा, मगर The Next 365 days के तीसरे पार्ट में सेक्स सीन की भरमार क्यों है? क्या मलयालम फिल्म हैवन देखी जानी चाहिए? और कितनी दमदार है नेटफ्लिक्स पर आई फिल्म शाबाश मिथु?

असगर: नमस्कार आदाब दोस्तों। आप सुन रहे हैं अपना फेवरिट पॉडकास्ट आओ बिंज करें। मैं हूं मोहम्मद असगर और मेरे साथ हैं उपमा सिंह। बताइए उपमा इस हफ्ते 5 शोज या फिल्मों के बारे में, जिन्हें दर्शक देख सकते हैं ओटीटी पर।

उपमा:
आज हम बात करेंगे, जी फाइव पर स्ट्रीम हो रही सीरीज दुरंगा की और मलयालम फिल्म हैवन की। नेटफ्लिक्स पर आई फिल्म शाबाश मिथु और द नेक्स्ट 365 डेज की। इसके अलावा, थिएटर्स के बाद एमेजॉन प्राइम विडियो पर पहुंची बिग बजट फिल्म शमशेरा की।

असगर: तो सबसे पहले बात कर लेते हैं दुरंगा की।

1- दुरंग रिव्यू (Duranga Review)

उपमा : असगर, दुरंगा का मतलब होता है, दो रंगों या दोहरे चरित्र वाला और यह बात सीरीज के नायक गुलशन देवैया पर बखूबी बैठती है, जो एक ओर हंसते-खेलते परिवार के परफेक्ट पति-परफेक्ट पिता समित पटेल तो दूसरी ओर स्याह अतीत वाले इमोशनलेस अभिषेक बाने की दोहरी जिंदगी जीते हैं। ये सीरीज कोरियन ड्रामा फ्लावर ऑफ ईवील का अडाप्टेशन है और अगर आपने ओरिजिनल सीरीज नहीं देखी तो कहानी पहले ही सीन से आपका ध्यान खींचती है, जब समित यानी गुलशन यूट्यूब पर विडियो देखकर मुस्कुराना सीख रहा होता है। आपको तुरंत ही एक इस शख्स में रुचि हो जाती है कि आखिर ये कैसा आदमी है जिसे मुस्कुराना भी सीखना पड़ रहा है। लेकिन लगभग पहले ही एपिसोड में समित की असलियत का अंदाजा भी लग जाता है, जिससे एकबारगी सारा मजा किरकिरा होता लगता है।
खैर, रिव्यू की डीटेल में जाने से पहले आपको शॉर्ट में कहानी बता देते हैं। कहानी यूं है कि समित पटेल यानी गुलशन देवैया अपनी पुलिस ऑफिसर बीवी ईरा यानी दृष्टि धामी और बेटी के साथ 11 साल से खुशहाल शादीशुदा जिंदगी जी रहा है। लेकिन समित का एक खौफनाक अतीत है। पहले ही एपिसोड में जब पूरा परिवार समित का जन्मदिन मना रहा होता है, ईरा को एक बूढ़ी औरत के मर्डर की खबर मिलती है। इस मर्डर में एक 17 साल पुराने साइको सीरियल किलर बाला बाने की मॉडस ऑपरेंडी इस्तेमाल की गई होती है और शक की सुई बाला के बेटे अभिषेक बाने की ओर मुड़ती है। सीरीज आपको ये बताने में भी कोई देरी नहीं लगाती कि असल में समित ही अभिषेक बाने है और तब आपको लगता है कि यार, अब बचा ही क्या कहानी में। सारा राज तो खुल गया, लेकिन अगर आपने ये सोचकर सीरीज बीच में ही छोड़ दी तो आप गलती करेंगे, क्योंकि कहानी एपिसोड दर एपिसोड अभिषेक के अतीत में झांकती है और नए-नए राज खोलती है। इस वजह से आप अभिषेक की कहानी से जुड़ते जाते हैं।

इधर, आज के समय में इस मर्डर मिस्ट्री को सुलझाने से चक्कर ईरा और समित एक दूसरे से ही चूहे-बिल्ली के खेल में उलझ जाते हैं। सीरीज के प्लस पॉइंट की बात करें, तो रोचक ट्विस्ट के अलावा तेज रफ्तार से आगे बढ़ती कहानी और कलाकारों खासकर गुलशन देवैया का सधा हुआ अभिनय इसे देखने लायक बनाता है। वहीं, कमियों की बात करें तो स्क्रीनप्ले में कई झोल हैं। मसलन, इतनी काबिल पुलिस ऑफिसर होने के बावजूद 11 साल तक ईरा को समित के बारे में कुछ अटपटा नहीं लगता, ये बात पचती नहीं है। दोनों के बीच में वैसी केमिस्ट्री भी नहीं दिखती। अभिषेक की जिंदगी में रिपोर्टर अमित का एंगल भी कई सवाल छोड़ जाता है। फिर भी, क्राइम थ्रिलर देखने के शौकीनों को ये सीरीज पसंद आएगी।

2. द नेक्सट 365 डेज़ रिव्यू (The Next 365 days Reveiw)
असगर : दूसरे नंबर पर बात 365 डेज़ फ्रेंचाइंज़ी फिल्म की। चार महीने पहले ही 365 डेज़ का पहला सीक्वल रिलीज हुआ था। और अब इसका तीसरा पार्ट द नेक्सट 365 डेज़ आ गया है। इसके पहले पार्ट को दर्शकों ने खूब पसंद किया था, उसी को कैश करने के लिए शायद नेटफ्लिक्स धड़ाधड़ 365 डेज़ बनाने में जुट गया है। इसमें कहानी से ज़्यादा सेक्स सीन हैं। अगर ये भारत में बनी होती तो इसे क्राइम थ्रिलर ना कहते, बल्कि पोर्न फिल्म कहा जाता।
The next 365 days में एक डायलॉग है, 'अगर वाकई किसी से मोहब्बत हो तो उसे जाने दो। अगर वो लौट आए तो हमेशा के लिए तुम्हारा है। अगर न आए तो वो कभी तुम्हारा था ही नहीं।'

ये डायलॉग इसलिए अच्छा लगा क्योंकि जिस तरह से जिस्म और रूह का रिश्ता फिल्म में दिखाया गया है वो बहुत अनोखा है। फिल्म दिखाती है कि शादी को मजबूरी ना बनाओ, बल्कि आज़ादी रहनी चाहिए। ऐसे रिश्ते को लेकर बॉलीवुड ने बहुत फिल्में बनाई हैं। जहां एक लड़की है। जो अपने शौहर और अपने प्रेमी के बीच प्यार के झूले में झूल रही है, जिसे समझ नहीं आ रहा है कि आखिर प्यार वो किससे करती है।

फिल्म की कहानी ज़रा सी है, पोलिश लड़की लौरा के किरदार में है अन्ना मारिया सिक्लुका(Anna Maria Siekluca) और सिसिली के गैंगस्टर मासिमो के किरदार में है मिशेल मोरोन (Michelle Morrone)। इस पहली फिल्म में लौरा को गोली लगी थी। मासिमो उसे बचा लेता है। मगर लौरा और मासिमो में दूरियां बढ़ गई हैं। क्योंकि इनके बीच है लौरा का दोस्त नाचो। नाचो के किरदार में है सिमोन सुसिन्ना। और हां नाचो मासिमो के दुश्मन गैंगस्टर का बेटा है, जो पहली फिल्म में दिखाए गए हैं। लौरा नाचो के प्यार में है। उसे अजीब तरह के ख्वाब आ रहे हैं, ख्वाब में वो नाचो और मासिमो दोनों के साथ सेक्स कर रही है। वो कशमाकश में है आखिर वो किसे प्यार करती है। लौरा किसको मिलती है यही फिल्म की कहानी है। मगर जहां खत्म हुई है, उससे साफ है कि चौथा पार्ट भी आएगा।

अब सवाल है कि फिल्म कैसी है क्या देखी जानी चाहिए, तो पोर्न देखने वालों के लिए तो फिल्म बढ़िया है। मगर फिल्म देखने वालों को द नेक्सट 365 डेज़ निराश करती है। ना क्राइम है ना सस्पेंस, ना थ्रिल। ना कहानी, ना डायलॉग, बस फिल्मांकन है। खूबसूरत सेट हैं। इंटिमेसी के भरपूर सीन हैं। लंबे किसेज़ हैं। अदकारी करने का मौका कलाकारों के पास नहीं रहा है, क्योंकि हर दो मिनट बाद सेक्स सीन। और गानों की भरमार इतनी है लगता है जैसे आप पोएट्री सुन रहे हैं। अब आप तय कर लें कि आपको ये फिल्म देखनी है या नहीं।

3. शमशेरा रिव्यू
उपमा : तीसरे नंबर पर बात करते हैं, रणबीर कपूर की मुख्य भूमिका वाली फिल्म शमशेरा की। रणबीर ने चार साल बाद इस फिल्म के बड़े पर्दे पर वापसी की थी मगर उन्हें दर्शकों का वैसा प्यार मिल नहीं पाया। हालांकि, फिल्म में रणबीर अपनी अब तक की फिल्मों से एकदम अलग ठेठ, धोती कुर्ता पहनने वाले, घोड़ा दौड़ाने वाले, हथियार चलाने वाले ऐक्शन अवतार में हैं, वो भी डबल रोल में। फिल्म का निर्देशन भी अग्निपथ जैसी हिट फिल्म बनाने वाले करण मल्होत्रा ने किया है पर कुछ बेहतरीन विजुअल्स के बावजूद ढीली लिखाई और बेवजह खींची हुई पटकथा ने रंग में भंग डाल दिया है।

फिल्म की कहानी 18वीं सदी में सेट खमेरन जनजाति की है, जिन्हें विस्थापन के बाद काजा नामक काल्पनिक शहर में ठौर तलाशनी पड़ी। जात-पात मानने वाले काजा वासियों ने छोटी जाति के खमेरन को अपनाया नहीं, तो अपने सरदार शमशेरा (रणबीर) के नेतृत्व में वे लूटपाट कर गुजर-बसर करने लगे। तब काजा वासियों की गुहार पर अंग्रेजों का भेजा दरोगा शुद्ध सिंह (संजय दत्त) धोखे से शमशेरा और उसके लोगों को किले में कैद कर लेता है, जिन्हें आजादी दिलाने के लिए शमशेरा खुद को कुर्बान कर देता है। कहानी 25 साल आगे बढ़ती है और उसका मस्तमौला बेटा बल्ली(रणबीर कपूर) अपने पिता की हकीकत जानने के बाद उसके सपने को अपना बना लेता है। अब बल्ली खमेरन को आजादी दिलाने का अपने पिता का सपना सच कर पाता है या नहीं, ये जानने के लिए ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है और ये प्रिडिक्टेबल कहानी फिल्म की एक बड़ी कमजोरी है।
अग्निपथ जैसी सफल कमर्शल फिल्म बनाने वाले करण मल्होत्रा ने इस बार भी कोशिश वही की है, लेकिन कुछ उम्दा सीन, बढ़िया सिनेमटोग्रामी, वीएफएक्स और बैकग्राउंड स्कोर के बावजूद वे कहानी को भरोसेमंद और पटकथा को चुस्त नहीं बना पाए हैं। फिल्म में काजा की जो काल्पनिक दुनिया और किरदार उन्होंने गढ़े हैं, उससे कोई जुड़ाव महसूस नहीं होता। उल्टे बेड़ियों में जकड़े मैले-कुचैले खमेरन कभी केजीएफ के कैदियों की याद दिलाते हैं, तो दांत फाड़कर हंसते शुद्ध सिंह अग्निपथ के कांचा चीना और केजीएफ 2 के अधीरा का सस्ता वर्जन लगते हैं। फिल्म सपाट तरीके से आगे बढ़ती है, जिसमें रोमांच की कमी अखरती है।
अदाकारी की बात करें, तो रणबीर कपूर की मेहनत साफ दिखती है। वह फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी हैं। एक कलाकार के तौर पर उन्होंने नया प्रयोग करने की कोशिश की है। शुद्ध सिंह के रूप में संजय दत्त अपना असर छोड़ते हैं, लेकिन उनके किरदार को क्रूर बनाना है या हसौड़, ये करण मल्होत्रा समझ नहीं पाए हैं। वाणी कपूर के पास अभिनय के नाम पर कुछ खास करने को था नहीं, हां, काले नैना और फितूर गाने में वह खूबसूरत लगी हैं। गानों की बात करें तो जी हुजूर और फितूर जैसे गाने पहले ही हिट हो चुके हैं, जबकि कुछ गाने सिर्फ फिल्म की लंबाई बढ़ाने में योगदान करते हैं। ऐसे में, फिल्म देखनी है या नहीं, आप खुद तय कीजिए।

4. हैवन रिव्यू (Heaven Reveiw)
असगर : अब बात मलयालम फिल्म 'हैवन' की। फिल्म की शुरुआत एक क्राइम सीन से होती है, जिसमें पीटर को आरोपी बनाया गया है। और फिर पूरी फिल्म बैकग्राउंड में ही चलती है। फिल्म में सूरज वेंजारामूडु ने सर्किल इंस्पेक्टर पीटर का किरदार निभाया है। पीटर की पत्नी की मौत हो चुकी है। उसके परिवार में एक बेटा है और एक मां। पत्नी की मौत के बाद से पीटर खुद को अपनी नौकरी में बिजी रखता है। परिवार पर ध्यान नहीं देता। बेटा चाहता है पिता उसके साथ वक्त बिताएं। मगर जब तक पीटर बेटे की मोहब्बत में गिरफ्तार होता है, तबतक बहुत देर हो जाती है। पीटर के बेटे सेबिन, उसकी फ्रेंड और फ्रेंड के परिवार की हत्या हो जाती है। पीटर हत्यारे तक कैसे पहुंचता है, पीटर के साथ कोर्ट में आखिर क्या फैसला लेता है? ये फिल्म देखकर ही पता चलेगा। प्यार, परिवार, जज्बात, एहसास, जिम्मेदारी ये ही फिल्म की कहानी के एलिमेंट्स हैं।

सूरज वेंजारामूडु ने एक निश्चित तौर पर बेहद ही सहजता के साथ भूमिका निभाई है। सूरज चेहरे के भाव और बॉडी लैंग्वेज से दमदार छाप छोड़ते हैं। जाफर इडुकी ने भी शानदार परफॉर्मेंस दी है। एलेन्सियर, जॉय मैथ्यू, सुदीश, सुदेव नायर और बाकी कलाकार ने भी वैसा ही काम किया है, जैसा उन्हें सौंपा गया था। जो दर्शक मलयालम सिनेमा से परिचित नहीं है, उन्हें फिल्म का पहला भाग थोड़ा धीमा लग सकता है, लेकिन जो परिचित हैं उनके लिए हैवन काफी अट्रैक्टिव क्राइम सस्पेंस थ्रिलर है। फिल्म किसी भी मोड़ पर दर्शकों की बुद्धि का अपमान नहीं करती है, ना ही चुनौती पेश करती है। बल्कि लय के साथ चलती चली जाती है। सिनेमैटोग्राफर विनोद इलमपल्ली का काम आंखों को सहजता देता है। गोपी सुंदर का संगीत ठीकठाक है। डायरेक्टर उन्नी गोविंदराज ने पीएस सुब्रमण्यम के साथ फिल्म का लेखन भी किया है। क्राइम स्टोरी पसंद करने वालों के लिए ये एक बढ़िया फिल्म है देख सकते हैं।

5- शाबाश मिथु रिव्यू
अब आखिर में बात शाबाश मिथु की। यतो हस्त: ततो दृष्टि, यतो दृष्टि ततो मन: यानी जहां हाथ हैं, वहां नजर होनी चाहिए। जहां नजर है वहीं मन होना चाहिए। भरतनाट्यम के इस मूल मंत्र के सहारे क्रिकेट का ककहरा सीखने वाली मिथु यानी मिताली (तेलुगु में मिथाली) राज की जिंदगी पर बनी प्रेरणायक फिल्म शाबाश मिथु की नजर, नजरिया और आत्मा सब एकदम सही जगह पर है। देश की सफलतम क्रिकेटर्स में से एक भारतीय महिला क्रिकेट टीम की पूर्व कप्तान मिताली राज की ये बायॉपिक एक ओर जहां मिथु (मिथाली का निकनेम) के भरतनाट्यम करते-करते क्रिकेटर बनने और फिर एक बिना पहचान वाली महिला क्रिकेट टीम को अपने खेल के दम पर पहचान दिलाने के संघर्ष को दिखाती है, तो साथ ही घर से लेकर क्रिकेट तक में लड़के और लड़की के बीच के भेदभाव पर भी सवाल उठाती जाती है।

प्रिया एवेन की लिखी और सृजित मुखर्जी निर्देशित ये फिल्म मिथु (तापसी पन्नू) के बचपन से लेकर बतौर कप्तान 2017 के विश्व कप में फाइनल तक के सफर का रचनात्मक दस्तावेजीकरण है। इस सफर की शुरुआत में मिथु रूपी इस सचिन को पहले दोस्त नूरी के रूप में अपनी कांबली मिलती है, जो उसे खेल का पहला नियम सिखाती है कि आउट नहीं होना है। फिर, पहली नजर में उनकी प्रतिभा पहचानने वाले कोच संपत (विजय राज) उसे जिंदगी का मूल मंत्र देते हैं कि ये मैदान भी जिंदगी की तरह है, यहां कोई दर्द बड़ा नहीं, सिर्फ खेल बड़ा है। अपनी प्रतिभा और इन मंत्रों के सहारे मिताली हर चुनौती को पार करके भारतीय महिला क्रिकेट टीम की सबसे कम उम्र की कप्तान बनती है।

हालांकि, आम तौर पर जिस तरह के आर्थिक-सामाजिक संघर्ष हम अपने नायकों और नायिकाओं की जिंदगी में देखते हैं, वैसी कोई दिक्कत मिताली को नहीं रही। न पैसों की तंगी, न मां-बाप को मनाने की जद्दोजहद। बल्कि उसकी सहेली नूरी से लेकर उसकी टीम में शामिल एक चायवाले, एक लोहार, चमड़ा बनाने वाले की बेटियों का संघर्ष कहीं बड़ा लगता है। लेकिन हां, लड़की होने की कमतरी का अहसास मिथु बचपन से सहती रही है। भाई के बजाय उसके टीम पर सिलेक्ट होने पर दादी और भाई की नाखुशी उसने साफ देखी। महिला क्रिकेट खिलाड़ियों और पुरुष क्रिकेट खिलाड़ियों के भेदभाव को हर वक्त महसूस किया। फिल्म के कई सीन, जैसे पुरुष क्रिकेटर्स के होर्डिंग के सामने बैठकर महिला क्रिकेटर्स का यूरीन करना, एक लड़की का भारतीय महिला टीम की इस कप्तान से पुरुष क्रिकेटर के साथ उसकी फोटो खींचने को कहना, एयरपोर्ट कर्मियों का महिला क्रिकेटर्स के साथ बर्ताव आदि आपको भी वो भेदभाव और दर्द महसूस करने पर मजबूर कर देता है।

लेकिन फिल्म की एक बड़ी कमजोर कड़ी है उसकी सुस्त रफ्तार। कई सीन बेवजह खींचे हुए लगते हैं। खासकर इंटरवल के बाद मिताली के हार मानकर लौटने के बाद का घटनाक्रम ऊब पैदा करता है। उस पर अमित त्रिवेदी के गाने भी फिजूल में फिल्म की लंबाई बढ़ाने का काम करते हैं। फिल्म को कम से कम 20 मिनट कसा जाना चाहिए था। आखिर में विश्व कप क्रिकेट के दौरान भी मिताली का योगदान सही ढंग से हाईलाइट नहीं हो पाता। लेकिन अदाकारी की बात करें, तो तापसी की मेहनत रंग लाई है। उन्होंने बिना भारी भरकम डायलॉगबाजी के पूरी ईमानदारी से मिताली को पर्दे पर उतारा है। हालांकि, उनके लुक पर और बेहतर काम किया जा सकता है। उनके चेहरे का डार्क मेकअप ध्यान भटकाता है। विजय राज अपने किरदार में फबते हैं। उसके अलावा नन्हीं मिथु के रूप में इनायत वर्मा और छोटी नूरी के रूप में कस्तूरी जगनाम दिल जीत लेती हैं। ऐसे में, इस नेक नियत वाली फिल्म को एक मौका जरूर देना चाहिए।

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