यह आलेख क्यों पढ़ें?

  • भारत के 1935-36 वाले इंग्लैंड दौरे के बारे में जानने के लिए
  • बाका जिलानी का करियर एक ही टेस्ट मैच तक सीमित क्यों रहा?
  • जिलानी का पाकिस्तान के पूर्व पीएम इमरान खान से क्या रिश्ता था?
  • इंग्लैंड दौरे के वक़्त भारतीय टीम गुटबाजी का शिकार क्यों थी?

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नार्दर्न इंडिया और सिंध के बीच क्रिकेट मुक़ाबला। इसी मैच के साथ शुरू हुआ 24 साल के एक छरहरे तेज़ गेंदबाज का प्रथम श्रेणी क्रिकेट करियर। और करियर की शुरुआत भी कैसी? मैच में कुल 12 शिकार। पहली पारी में 37 रन के एवज में 7 विकेट चटकाए, तो दूसरी पारी में 50 रन के बदले पांच बल्लेबाजों को पवीलियन का रास्ता दिखाया।

वाकया है साल 1934 का। यह हैरतंगेज कारनामा करने वाले शख़्स का नाम था- मोहम्मद बाका खान जिलानी (Mohammad Baqa Khan Jilani)। 6 फुट के जिलानी का नाता पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और मशहूर ऑलराउंडर इमरान खान, माजिद खान और जावेद बुर्की जैसे क्रिकेटरों से भी है। दरअसल, जिलानी की शादी टीम इंडिया के एक अन्य क्रिकेटर जहांगीर खान की बहन से हुई थी।

बंटवारे के बाद जहांगीर का परिवार पाकिस्तान में बस गया। इस परिवार ने पाकिस्तानी क्रिकेट जगत को कई नगीने दिए। जहांगीर के बेटे माजिद खान मशहूर बल्लेबाज बने, जबकि भतीजे इमरान खान ने बतौर ऑलराउंडर नाम कमाया और पाकिस्तान को साल 1992 में वर्ल्ड कप भी जिताया। इसी परिवार से टेस्ट बल्लेबाज जावेद बुर्की भी निकले, जो माजिद और इमरान के चचेरे भाई थे।

जिलानी दाएं हाथ के मीडियम फास्ट बोलर थे। निचले क्रम में उन्हें बल्ला भी ठीक-ठाक चलाना आता था। पहले मैच की शानदार सफलता के बाद उनका करिश्माई प्रदर्शन आने वाले मैचों में भी जारी रहा। दक्षिण पंजाब के ख़िलाफ़ मैच में तो वह साथी गेंदबाजों के साथ मिलकर विपक्षी बल्लेबाजों पर कहर बनकर टूटे। दक्षिण पंजाब की पूरी टीम महज 22 रनों पर आउट हो गई। यह 2010-11 तक रणजी ट्रॉफी का सबसे कम स्कोर रहा। मैच में जिलानी के आंकड़े थे, 4 ओवर में 7 रन देकर 5 विकेट। इसमें एक हैटट्रिक भी शामिल थी, जो रणजी इतिहास की पहली हैटट्रिक थी।

Former Pakistan captain Imran Khan

वह भारतीय क्रिकेट का शुरुआती दौर था। जाहिर तौर पर इस सनसनीखेज प्रदर्शन के बाद जिलानी से उम्मीदें काफी बढ़ गईं। भारत को ऐसे ही किसी खिलाड़ी की दरकार थी, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी चमक बिखेर सके। लेकिन, जिलानी का आगे का सफर काफी विवादित रहा। नौजवानी में ही वह कई बीमारियों के शिकार बन गए। यही वजह थी कि उनका अंतरराष्ट्रीय करियर सिर्फ एक मैच तक सीमित रहा। यह मौका उन्हें 1935-36 के इंग्लैंड दौरे पर मिला। उस दौरे पर, जिसे भारतीय क्रिकेट इतिहास का बदनुमा दाग़ कहा जाता है।

इंग्लैंड जाने वाली उस टीम में लाला अमरनाथ, कर्नल सीके नायडू, विजय मर्चेंट और सैयद मुश्ताक अली जैसे नामी गिरामी खिलाड़ी थे। लेकिन, कप्तान गजपति राज विजय आनंद की आत्ममुग्धता की वजह से टीम का माहौल बेहद खराब था। गजपति, महाराजकुमार ऑफ विजयनगरम या फिर विज्जी के नाम से भी मशहूर थे। उस वक़्त टीम में दो गुट थे - एक विज्जी का और दूसरा पूर्व कप्तान सीके नायडू का। जिलानी कप्तान यानी विज्जी के गुट में थे। उन्होंने नाश्ते की मेज पर सबसे सामने नायडू की बेइज्जती भी की। कहा जाता है कि इसी के इनाम के तौर पर उन्हें अपना पहला और आखिरी टेस्ट खेलने का मौका मिला।

इस मैच में इंग्लैंड के दिग्गज बल्लेबाज वाली हैमंड ने 217 रनों की शानदार पारी खेली। भारत यह मैच पारी के अंतर से हारा। जिलानी का प्रदर्शन बेहद साधारण था। उन्होंने पहली पारी में नाबाद चार और दूसरी में 12 रन बनाए। गेंदबाजी में 15 ओवर में 55 रन खर्च करने के बाद भी कोई विकेट नहीं मिला। उनकी फिर कभी टीम इंडिया में वापसी नहीं हुई। फर्स्ट क्लास क्रिकेट में भी उनके करियर का ग्राफ लगातार गिरता रहा। शुरुआती दो रणजी सीजन में वह अपने उफान पर थे। जिलानी ने इस दौरान 16 मैचों में 66 विकेट चटकाए। लेकिन, अगले 15 मैचों में वह सिर्फ 17 खिलाड़ियों को ही पवीलियन की राह दिखा सके।

Imran Khan

जाहिर है इस तरह के साधारण प्रदर्शन के बाद टीम इंडिया में वापसी की बात बेमानी है। लेकिन, जिलानी की परफॉर्मेंस डाउन होने की सबसे बड़ी वजह थी बीमारी। इस बारे में उनके साथी खिलाड़ी कोटा रामास्वामी ने बड़े विस्तार से लिखा है। रामास्वामी के मुताबिक, 'जिलानी को हाई ब्लड प्रेशर और नींद में चलने की बीमारी थी। उन्हें मिरगी भी आती थी। गुस्सा तो जैसे उनकी नाक पर रहता। कोई नहीं बता सकता था कि वह कब सामान्य हैं और कब एकदम से बेकाबू हो जाएंगे। पूरे टूर के दौरान वह दवाओं के भरोसे ही चल रहे थे।'

उस जमाने में अंतरराष्ट्रीय टीमें क्लबों से भी खूब मैच खेलतीं। आधिकारिक सीरीज से पहले भी और उसके बाद भी। भारत ने इंग्लैंड दौरे का अपना आखिरी मैच इंडियन जिमखाना के ख़िलाफ़ खेला। उस मैच के लिए रामास्वामी ही कप्तान थे। इसमें जिलानी का बर्ताव बेहद बुरा था। उन्होंने स्लिप में फील्डिंग कर रहे एमजे गोपालन पर ख़तरनाक तरीके से गेंद फेंकी। जब गोपालन स्लिप से हटकर कवर पर फील्डिंग करने चले गए, तो जिलानी ने उस पर भी नाराज़गी जताई और उन्हें काफी भलाबुरा कहा, जबकि जिलानी और गोपालन अच्छे दोस्त माने जाते थे।

जिलानी क्षेत्ररक्षण के दौरान बैठकर फील्डिंग कर रहे थे। एक गेंद को पकड़ने के बजाय बाउंड्री की तरफ लात भी मार दी। थ्रो भी जानबूझकर गेंदबाज से दूर ही फेंकते, ताकि वह पकड़ न पाए। रामास्वामी ने इन सब पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उन्होंने कहा, 'मुझे पता था कि उसका दिमागी संतुलन ठीक नहीं है। इसलिए मैंने यह मान लिया कि वह मैदान पर है ही नहीं।' इस तरह के बर्ताव के बाद किसी भी खिलाड़ी का टीम में बने रहना मुश्किल होता है। जिलानी को भी फौरन टीम से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और वह फिर कभी नैशनल टीम का हिस्सा नहीं बन पाए।

इन्हीं गंभीर बीमारियों के चलते वह काफी कम उम्र में ही दुनिया छोड़ गए। साल 1941 में उन्हें मिरगी का दौरा पड़ा। उस वक़्त वह बालकनी में खड़े थे। अचानक दौरा पड़ने से वह ख़ुद को संभाल नहीं पाए और नीचे गिर गए। उनकी मौके पर मौत हो गई। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने तनाव के चलते खुदकुशी की थी। जो भी हो, उस हादसे के ठीक 18 दिन बाद उनका 30वां जन्मदिन था। उनसे कम उम्र में सिर्फ एक टेस्ट क्रिकेटर ने दुनिया छोड़ी, वह थे अमर सिंह। निमोनिया की वजह से अमर सिंह का मई 1941 में इंतकाल हुआ। उस वक़्त उनकी उम्र थी 29 साल 169 दिन। लेकिन, 30 साल की कम उम्र में इतनी बीमारियों और विवादों वाले जिलानी शायद इकलौते टेस्ट क्रिकेटर हैं।

आवाज़ : मोहित सिन्हा

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