इस आलेख को क्यों पढ़ें

  • ऋषभ पंत को उनके स्वाभाविक खेल से क्यों नहीं रोकना चाहिए?
  • पंत ने ऐसा क्या कर दिया जो बाकी भारतीय विकेटकीपर नहीं कर पाए?
  • पंत की तुलना एडम गिलक्रिस्ट से क्यों हो रही है?

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    92,92,97, 96 रन - यह वो चार पारियां हैं, जहां अगर ऋषभ पंत के बल्ले से 8, 8, 3 और 4 रन और बन जाते, तो 31 टेस्ट के बाद उनके शतकों की संख्या पांच न होकर नौ होती। 31 टेस्ट के बाद नौ शतक जो सुनील गावसकर ने पहले 32 मैच में अपने करियर में बनाए थे, पंत उसे तोड़ने के बेहद करीब हो सकते थे। लेकिन, पंत का खेलने का अंदाज़ अनूठा है और ऐसे खिलाड़ी कभी भी रेकॉर्ड की परवाह नहीं करते। बन गए तो ठीक, नहीं बने तो भी कोई बड़ी बात नहीं। बर्मिंघम टेस्ट की पहली पारी के दौरान पंत ने जिस तरीके से विध्वंसक बल्लेबाज़ी करते हुए शतक जड़ा, उससे स्थानीय फैंस को भले ही उनके चौके-छक्के याद न रहें, लेकिन वे कभी यह नहीं भूल पाएंगे कि जेम्स एंडरसन जैसे महाबली को उन्हीं के घर में पंत ने रिवर्स शॉट खेला।

    महेंद्र सिंह धोनी के रिटायरमेंट के बाद टीम इंडिया के विकेटकीपर की भूमिका में पंत को काफी मौके मिले हैं। इस बात में कोई दो राय नहीं कि पंत जीनियस हैं। धोनी सफेद गेंद की क्रिकेट के बादशाह थे, लेकिन लाल गेंद की क्रिकेट में उनकी तुलनात्मक नाकामी को मुद्दा नहीं बनाया जाता था। पंत के साथ भी इस रवैये को अपनाने की ज़रूरत है। पंत का आकलन करते समय हर बार यह बात क्यों दोहराई जानी चाहिए कि, अरे! वो वनडे और टी-20 में इस तरीके से बल्लेबाज़ी क्यों नहीं कर पाता?

    सफेद गेंद को फिलहाल भूल जाएं, लाल गेंद की क्रिकेट में पंत जैसे बल्लेबाज़ सदी में एक ही बार आते हैं। कई मायनों में देखा जाए तो सिर्फ 31 मैच के करियर में पंत ने खुद को धोनी से काफी बेहतर टेस्ट बल्लेबाज़ साबित कर दिया है। इंग्लैंड जैसे देश में भी जानकार उन्हें एडम गिलक्रिस्ट का सही उत्तराधिकारी मानने लगे हैं। इत्तेफाक भी देखिए कि बचपन में पंत के हीरो गिलक्रिस्ट ही हुआ करते थे। ड्रीम इलेवन के विज्ञापन को किनारे रखकर पंत के पुराने इंटरव्यू देखें तो इस बात की तस्दीक होती है।

    Rishabh Pant Hundred

    पंत की ख़ासियत यह नहीं है कि वह मुश्किल हालात के दौरान संकटमोचक बनकर उभरते हैं। शानदार बात यह है कि वह विदेशी ज़मीं पर बेहद नाज़ुक हालात में भी अपनी बेस्ट क्रिकेट खेलते नज़र आते हैं। इंग्लैंड में दो, ऑस्ट्रेलिया में एक और साउथ अफ्रीका में एक शतक, ऐसा रिकॉर्ड तो सेना (SENA) मुल्कों में वीवीएस लक्ष्मण, सौरव गांगुली और वीरेंद्र सहवाग जैसे खिलाड़ियों को 100 टेस्ट खेलने के बाद भी हासिल नहीं हुआ। जबकि पंत सिर्फ एक शुद्ध बल्लेबाज़ भी नहीं। विकेटकीपर बल्लेबाज़ और छठे नंबर पर उनके जैसा मैच विनर टेस्ट क्रिकेट में भारत की तरफ से कोई नहीं आया है। ख़ासकर विदेशी ज़मीं पर।

    कम उम्र में अपने खाते में अहम आंकड़े जोड़ने की फेहरिस्त लंबी है पंत की। विदेशी ज़मीं पर खेले गए मैचों में पंत ने अब तक सिर्फ 31 टेस्ट के छोटे-से करियर में 4 शतक महज 23 मैचों में जड़ दिए। वहीं, बाकी के भारतीय विकेटकीपर बल्लेबाज़ मिलकर भी 260 टेस्ट मैचों में ऐसा नहीं कर पाए। यही वजह है कि पंत को बड़े खिलाड़ी के तौर पर देखा जा रहा है।

    2022 में जब पंत इंग्लैंड दौरे पर क्रिकेट खेलने के लिए गए, तो उनके सामने कई चुनौतियां थीं। लेकिन, पंत ने ऐसी ताबड़तोड़ पारी खेली कि चयनकर्ता तो क्या, कोई भी उन्हें आड़े हाथों लेने की कोशिश नहीं कर सकता। पंत को इस मैच से ठीक पहले यह संदेश दिया गया कि उन्हें अभी काफी कुछ हासिल करना है ताकि उन्हें भविष्य का कप्तान बनाने के बारे में सोचा जा सके। फिलहाल, भविष्य के कप्तान के दावेदार पंत ही थे, लेकिन वह जानते हैं कि स्थानीय फैंस को मायूस करना सही नहीं। इसलिए पंत ने एक बार फिर से अपने बल्ले से ही चयनकर्ताओं को जवाब देने की कोशिश की।

    Rishabh Pant Comeback

    पंत जब बर्मिंघम में प्रेस कॉन्फ्रेंस में आए, तो अपने खेल की चर्चा करते हुए उन्होंने अनायास ही अपने गुरु तारिक सिन्हा का ज़िक्र कर डाला। सिन्हा भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन पंत अपने गुरु को एक दिन के लिए भी नहीं भूल पाते। मुझे याद है 15 जून 2016 का वह दिन, जब पंत दिल्ली के सरोजनी नगर के पास एक सड़क पर आधे घंटे तक तारिक सिन्हा का इंतज़ार कर रहे थे।

    तारिक सिन्हा के साथ मुझे मुंबई जाना था और रास्ते में अचानक पंत से हमारी मुलाकात हुई। कार के ड्राइवर ने हमसे सवाल किया कि यह युवा खिलाड़ी कौन हैं? जवाब में मैंने कहा कि अरे, यह भविष्य के धोनी हैं। आज इनके साथ ऑटोग्राफ ले लो या फोटो खींचा लो। पंत ने बेहद मासूमी से जवाब दिया, 'नहीं भइया, माही भाई जैसा तो कोई दूसरा हो ही नहीं सकता।' यह बात धोनी ने भले ख़ुद से नहीं सुनी हो, लेकिन आज जब वह पंत को टेस्ट क्रिकेट खेलते देखते होंगे, तो उन्हें भी यही लगता होगा कि पंत जैसा कोई और नहीं हो सकता।

    बर्मिंघम में पंत के शतक ने एक बार फिर से फैंस को उनका दीवाना बना दिया है, लेकिन यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि जितनी पंत की तारीफ होती है, उतनी ही उनकी ट्रोलिंग भी। और तो और, सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस टेस्ट मैच से पहले दो दिन अभ्यास सत्र में पंत ने बल्ला भी नाम का ही छुआ। बावजूद इसके उनकी बल्लेबाज़ी पर किसी तरह का असर नहीं दिखा। पंत के खेलने का तरीका ही ऐसा है कि वह हर बार कामयाब नहीं हो सकते, लेकिन जिस दिन चलते हैं, तो मैच और सीरीज़ जिताकर ही लौटते हैं।

    Rishabh Pant

    कभी सुनील गावसकर तो कभी रवि शास्त्री ने पंत की टेस्ट क्रिकेट में इसी आक्रामक और बेपरवाह अंदाज़ में खेलने की शैली को लेकर आलोचना की। उनका मानना है कि स्वाभाविक गेम कुछ भी नहीं होता। हर खिलाड़ी को टीम की ज़रूरत के हिसाब से अपनी शैली और रवैये में बदलाव लाना चाहिए। पंत ने तमाम आलोचनाओं के बावजूद अपने नैसर्गिक खेल पर किसी तरह की आंच नहीं आने दी है।

    अगर पंत ऐसे ही खेलते रहे तो वह दिन दूर नहीं, जब टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में भारत की तरफ से पंत का योगदान वैसे ही लिखा जाएगा, जैसे धोनी की कप्तानी की महानता बताने के लिए वनडे और टी-20 क्रिकेट में उनके योगदान को दिखाया जाता है। बर्मिंघम टेस्ट मैच अगर टीम इंडिया जीतती है, तो पंत के लिए अगला टारगेट गिलक्रिस्ट की बराबरी करना होगा।

    आवाज़ : बबीता जैन
    *यह लेखक के निजी विचार हैं

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