यह आलेख क्यों पढ़ें?

  • गावस्कर ने पहले वेस्ट इंडीज दौरे को किस तरह यादगार बनाया?
  • गावस्कर के करियर में 1976-80 का दौर क्यों खास है?
  • बेंसन एंड हेजेज वर्ल्ड चैंपियनशिप के फाइनल में क्या हुआ था?
  • रेकॉर्ड टूट गए, फिर भी क्यों बेहतरीन माने जाते हैं गावस्कर?


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सेंट किट्स एयरपोर्ट पर इमिग्रेशन अफ़सर ने सुनील गावस्कर का पासपोर्ट लिया, नाम पढ़ा और पूछा, ‘आप क्या करते हैं?’ गावस्कर ने जवाब दिया, मैं ओपनिंग बैट्समैन हूं। इमिग्रेशन अफ़सर ने अपने सामने खड़े उस छोटे से लड़के को सिर से पांव तक देखा, जिसकी दाढ़ी शायद ही आनी शुरू हुई थी। उसके मुंह से पहले एक दबी सी हंसी छूटी और फिर छूटा हाहा-होहो का फ़व्वारा जिसमें उनका शरीर आगे पीछे झुका, दाएं-बाएं डोला और इस दौरान उसके हाथ जांघों पर बज़ते रहे।

इस टिपिकल वेस्टइंडियन हंसी को किसी तरह रोककर उस अफ़सर ने कहा, ‘अपना सिर बचाकर रखना...।' दरअसल, ये चेतावनी थी वेस्ट इंडीज के गेंदबाजों की रफ्तार को लेकर।

सुनील गावस्कर अपनी किताब आइडल्स में लिखते हैं कि कैरिबियाई दौरे पर फ़ैस उन्हें एक असहाय बल्लेबाज़ मान रहे थे। लेकिन ऐसा तभी तक रहा, जब तक गावस्कर ने बल्ला नहीं उठाया था। अपने पहले ही टेस्ट मैच में उन्होंने 65 और नाबाद 67 रनों की पारी खेलकर भारत को पहली बार वेस्ट इंडीज़ के ख़िलाफ़ जीत दिलाई। पूरी सीरीज़ में गावस्कर ने गेंदबाजों की जमकर धुनाई की और 4 टेस्ट मैचों में 774 रन बना डाले। और हां, उनका सिर भी नहीं फूटा।

सिर वाली बात भी उनकी तकनीक को सलामी पेश करती है क्योंकि उन दिनों आज के जैसे हेलमेट नहीं होते थे और बल्लेबाज सिर्फ़ हैट या एक तरह का सोला हैट पहनकर बैटिंग करते थे

Sabse bada khiladi west indies vs india

भारतीय टीम के सम्मान में आयोजित एक पार्टी में कैलिप्सो सिंगर लॉर्ड रिएल्टर ने सन्नी भाई पर यह गाना गाया था...

.. It was Gavaskar
The Real Master
Just Like a Wall
We couldn’t out Gavaskar at all
Not at all
You know the West Indies couldn’t
Out Gavaskar at all


यानी वो गावस्कर ही थे, जो सचमुच मास्टर थे, पिच पर दीवार की तरह खड़े थे ओर वेस्टइंडीज़ उन्हें आउट नहीं कर पाई।
दरअसल गावस्कर की कहानी को कम शब्दों में लिखना बेहद कठिन है, इसलिए हम उनके खेल जीवन के कुछ अहम पड़ावों से गुज़रते चलेंगे।


साल 1976 तक गावस्कर दुनिया के टॉप बल्लेबाज़ों में अपनी जगह बना चुके थे। लेकिन उनके करियर ने असली उछाल 1976-1980 के दौरान ली, जब उन्होंने 16 शतक और दो दोहरे शतक सिर्फ़ इन 5 सालों में ठोक दिए। इस दौरान उनका औसत 62.28 का रहा। इस दौरान भारतीय टीम ने वेस्ट इंडीज़, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और पाकिस्तान जैसे टॉप देशों का दौरा किया था।

1979 के इंग्लिश दौरे में ओवल टेस्ट मैच गावस्कर के लिए ख़ास था। उस समय किसी ओपनर के सर्वाधिक शतकों का रेकॉर्ड सर लेन हटन के नाम था। उन्होंने 19 शतक जड़े थे। गावस्कर के पास एक सेंचुरी और लगाकर हटन से आगे निकलने का मौका था।

पहली पारी में इंग्लैंड ने गूच और विली के अर्धशतकों की मदद से 309 रन बनाए। जवाब में गावस्कर का शतक का सपना 87 रन पहले ही टूट गया और वो 13 रन बनाकर बॉथम की गेंद पर विकेटकीपर को कैच थमा बैठै। विश्वनाथ ने 62 रन बनाए, लेकिन इंग्लैंड ने भारत पर 100 रनों से ऊपर की लीड ले ली।

दूसरी पारी में इंग्लैंड ने फिर जमकर बैटिंग की और 334 रन पर पारी घोषित की। भारत के सामने जीत के लिए 438 रन का लक्ष्य था। गावस्कर ने अपनी करियर की बेहतरीन पारी खेलते हुए पहले विकेट के लिए चेतन चौहान के साथ 213 रनों की पार्टनरशिप की। रन चेज़ के लिए ओवर कम थे, लेकिन गावस्कर ने दिलीप वेंगसरकर के साथ एक और बड़ी साझेदारी की। दोनों ने दूसरे विकेट के लिए 153 रन जोड़ लिए थे। वेंगसरकर 52 रन बनाकर आउट हो गए। गावस्कर की पारी भी 221 रन पर खत्म हो गई। नीचे के बल्लेबाज़ों ने तेज़ी दिखाई, लेकिन टीम लक्ष्य से केवल 9 रन पीछे रह गई और मैच ड्रॉ हो गया।

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टेस्ट क्रिकेट के साथ गावस्कर ने वनडे में भी अपनी छाप छोड़ी थी। क्रिस श्रीकांत के साथ उनकी ओपनिंग जोड़ी बहुत चली थी। गावस्कर ने वनडे में अपना इकलौता शतक 1987 के वर्ल्ड कप में न्यूजीलैंड के खिलाफ बनाया था।

1983 के वर्ल्ड कप की जीत तो सभी याद करते हैं, लेकिन अस्सी के दशक में ऑस्ट्रेलिया में वनडे की बेंसन एंड हेजेज वर्ल्ड चैंपियनशिप जीतना भी भारतीय टीम के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी।

इस टीम के कप्तान सुनील गावस्कर थे। फ़ाइनल में भारत का मुक़ाबला पाकिस्तान से था। मैच से एक दिन पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस में गावस्कर ने ट्रोफ़ी के साथ फ़ोटो खिंचवाई तो पाकिस्तानी कप्तान जावेद मियांदाद ने कहा, ‘सन्नी भाई, आज आप ट्रोफी रख लो, कल तो ये मेरे पास होगी।‘ मैच के दौरान भी मियांदाद ने अच्छा फॉर्म दिखाया और भारत के लिए खतरा बनते नज़र आ रहे थे, लेकिन चतुर कप्तान गावस्कर ने मियांदाद को विकेटकीपर सदानंद विश्वनाथ से उलझाए रखा जो विकेट के पीछे से लगातार बातें कर रहे थे। ओवरों के बीच में मियांदाद ने गावस्कर से शिकायत भी की थी कि अपने विकेटकीपर से कहें कि चुप रहे, यहां इंसान खेल रहे हैं, जानवर नहीं। गावस्कर की हंसी छूट गई और उन्होंने पाकिस्तान को पीछे की सीरीज़ याद दिलाई जिसमें पाकिस्तान की वाइड गेंद पर भी विकेटकीपर वॉट ए गुडबॉल की शाबाशी देते थे।

खैर मियांदाद ज्यादा देर चल नहीं सके और भारत के सामने एक साधारण सा टारगेट आया जिसे टीम ने पूरा किया और बेंसन एंड हेज़ेज ट्रोफी गावस्कर के ही हाथ में आई।

गावस्कर के लंबे करियर में उन पर यह इल्ज़ाम भी लगता रहा कि वह पर्सनल रेकॉर्ड के लिए खेलते हैं। लेकिन उन्होंने ऐसे वक्त में भारतीय क्रिकेट को संभाला, जब टीम को काफी कमज़ोर माना जाता था। गावस्कर टीम में प्रफ़ेशनलिज़म लेकर आए और विदेशी धरती पर भी जीतने के लिए टीम को कई बार तैयार किया।

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उनके दमदार डिफेंस को उनकी बैटिंग की जान माना जाता था। तेज़ गेंदबाज़ों को खेलने में शायद ही किसी और बल्लेबाज़ की तकनीक उनसे बेहतर रही हो। गावस्कर लिखते हैं कि उन्हें पहले शॉर्ट बॉल पर सीधा हुक लगाने की आदत थी। वह शॉर्ट गेंद को एक चैलेंज मानते थे जिसे छोड़ना उन्हें गवारा नहीं था। लेकिन बाद में उन्होंने अपना यह अंदाज़ बदला और ज़रूरत पड़ने पर ही हुक खेलते, नहीं तो गेंद के रास्ते से हट जाते थे। इस तरह उन्होंने अपने विकेट की क़ीमत और बढ़ा दी थी।

उनका डिफ़ेंस तो मज़बूत था ही, लेकिन शायद ही कोई ऐसा शॉट था जिसे वह खेल नहीं सकते थे। गावस्कर ने सबसे पहले 10 हजार रनों का आंकड़ा पार किया और 34 शतक लगाए। उनके ये रेकॉर्ड सचिन तेंदुलकर ने तोड़े, लेकिन गावस्कर के वक्त की बोलिंग शायद क्रिकेट जगत में सबसे मज़बूत बोलिंग की मिसाल थी। वेस्ट इंडी़ज़ के मार्शल, गार्नर, होल्डिंग और रॉबर्ट्स के अलावा इंग्लैंड के जॉन स्नो, ब्रुस विलिस, इयान बॉथम, ऑस्ट्रेलिया के लिली और थॉमसन, पाकिस्तान के इमरान खान, अब्दुल कादिर और सरफ़राज़ नवाज़, न्यूज़ीलैंड के रिचर्ड हैडली... ये सब के सब उसी ज़माने में अपने पीक पर थे।

उस वक्त पिच भी रात को कवर नहीं की जाती थी। इससे गेंदबाज़ों को बहुत मदद मिलती थी। ऐसे में बिना हेलमेट के बल्लेबाज़ जब बैटिंग करते तो कहीं न कहीं उनके मन में ख़ौफ़ भी रहता था। आज क्रिकेट बहुत हद तक बल्लेबाज़ों का खेल बन चुका है, लेकिन असली मज़ा तो तभी आता था, जब बैट और बॉल की बराबर की टक्कर होती थी। इस टक्कर में अक्सर विपरीत परिस्थितियों में भी जीत सुनील मनोहर गावस्कर की ही होती थी।

वेस्ट इंडीज के कैलिप्सो सिंगर लॉर्ड रिएल्टर ने यूं ही नहीं गाया था...

We couldn’t out Gavaskar at all
Not at all
You know the West Indies couldn’t
Out Gavaskar at all.

आवाज़: आशिता सेठ

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