यह आलेख क्यों पढ़ें?

  • क्रिकेट के एक रोचक किस्से की जानकारी के लिए
  • ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ क्या थी इंग्लैंड की सबसे बड़ी भूल?
  • सचिन को रोकने के लिए किसका आइडिया था निगेटिव लाइन बोलिंग?
  • सहवाग की सलाह कैसे भारी पड़ी थी सचिन तेंडुलकर पर?

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Sehwag Schine Story: साल 1932 में इंग्लैड की क्रिकेट टीम पांच मैचों की एशेज टेस्ट सीरीज खेलने ऑस्ट्रेलिया जा रही थी। इससे पहले वाली एशेज में इंग्लैंड बुरी तरह से हारा था और इसकी वजह थे सर डॉन ब्रैडमैन। पांच मैचों की सीरीज में 974 रन ठोक दिए थे उन्होंने। इंग्लैंड की कमान मुंबई में जन्मे डगलस जार्डिन के हाथों में थी। उन्होंने ठान लिया कि इस बार कैसे भी करके ऑस्ट्रेलिया से पिछला हिसाब चुकता करना है।

उन्होंने अपने दो तेज़ गेंदबाजों, हेराल्ड लारवुड और जॉर्ज एलन को मीटिंग के लिए बुलाया। इसमें ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों को खामोश रखने की रणनीति पर चर्चा हुई। तय किया गया कि इसके लिए 'बॉडीलाइन' बोलिंग का सहारा लिया। सीरीज शुरू हुई। लारवुड और एलन ऑस्ट्रेलियाई बैटर्स के शरीर को निशाना बनाकर गेंद फेंकने लगे। बल्लेबाजों के पास दो ही रास्ते थे, या तो वे गेंद को अपने शरीर पर झेलें या फिर आड़ा-तिरछा शॉट खेलकर आउट हो जाएं।

इस बॉडीलाइन गेंदबाजी के सामने ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजी की दुर्गति हो गई। इंग्लैंड ने सीरीज 4-1 से जीत ली। ब्रैडमैन इस बार कुल 400 रन भी नहीं बना सके। किसी ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज की पसली टूटी, तो किसी का सिर फूटा। शरीर पर कितनी बॉल लगीं, इसकी तो कोई गिनती ही नहीं रही। ऑस्ट्रेलियाई मीडिया ने इसके लिए इंग्लैंड को जमकर लताड़ा। क्रिकेट की बाइबल कही जाने विजडन ने भी इसे सबसे डरावनी टेस्ट सीरीज बताया। यह विवाद इतना बढ़ा कि दोनों देशों के राजनीतिक संबंधों में भी खटास आ गई।

क्या इंग्लैंड ने इस विवाद से कोई सबक सीखा? इंग्लैंड के साल 2001 वाले भारत दौरे के गवाहों का जवाब होगा नहीं। दरअसल, जैसे डगलस के मन में ब्रैडमैन का खौफ था, वैसे ही 2001 में इंग्लैंड की अगुवाई करने वाले नासिर हुसैन के मन में सचिन तेंडुलकर की दहशत थी। उनका कहना था कि जब मैदान में हज़ारों दर्शकों की भीड़-भीड़ सचिन-सचिन चिल्लाती है, तो उनके गेंदबाजों का हौसला पस्त होने लगता है। लिहाजा, वह भी सचिन को रोकने योजना बनाने लगे, जैसे कि डगलस ने बनाई थी।

Negative Line Bowling,

इस बार भी अंग्रेज़ों के निशाने पर बल्लेबाजों का शरीर ही था। बस अंतर इतना था कि इस बार यह जिम्मेदारी किसी तेज़ गेंदबाज को नहीं, बल्कि एक स्पिनर को सौंपी गई। उसका नाम था एश्ले जाइल्स। दुनिया के सबसे चतुर कप्तानों में से एक माने जाने वाले नासिर ने बेंगलुरु टेस्ट में जाइल्स को सलाह दी कि वह सचिन के पैर की लाइन पर बोलिंग करें। उन्हें शॉट खेलने का मौका बिल्कुल न दें। नासिर ने लेग साइड पर फील्डरों की संख्या बढ़ा दी और जाइल्स ने उनके मनमुताबिक गेंदबाजी की।

बेंगलुरु की उस पिच में गेंदबाजों के लिए कुछ नहीं था। लेकिन, एक रफ एरिया में गिरने पर गेंद हरकत कर रही थी। वह सचिन यानी दाएं हाथ के बल्लेबाज के लेग स्टंप के बाहर का एरिया था। सचिन आक्रामक बल्लेबाज थे, लेकिन जाइल्स की निगेटिव लाइन ने उन्हें एक-एक रन के लिए तरसा दिया। आखिर में सचिन ने झल्लाकर वही काम कर दिया, जिसके लिए नासिर और जाइल्स ने यह पूरा जाल बिछाया था।

जाइल्स ने गेंद को अच्छी फ्लाइट दी। सचिन क्रीज छोड़कर बाहर निकले। इरादा था गेंद को मिडऑन फील्डर के सिर के ऊपर से सीमा रेखा के पार भेजना। लेकिन, गेंद सचिन के अनुमान के मुक़ाबले कुछ ज़्यादा घूमी। उछाल भी अधिक था। बल्ले के किनारे को छोड़ती हुए गेंद सीधे विकेटकीपर जेम्स फोस्टर के दस्तानों में पहुंची। फोस्टर ने गिल्लियां बिखेरने में एक पल की भी देरी नहीं की। सचिन 198 गेदों में 90 रन बनाने के बाद हताश-निराश पवीलियन लौटे। यह हताशा इसलिए भी ज़्यादा थी, क्योंकि लिटिल मास्टर अपने टेस्ट करियर में पहली दफा स्टंप आउट हुए थे। दिलचस्प बात है कि यही सचिन की आखिरी स्टंपिंग भी थी। इसके बाद वह टेस्ट में कभी स्टंप आउट नहीं हुए।

लेकिन, सचिन को उस मैच में स्टंपिंग करवाने में नासिर-जाइल्स से ज़्यादा बड़ी भूमिका वीरेंद्र सहवाग की थी। सहवाग उन दिनों मिडिल ऑर्डर में बैटिंग करते थे। उन्होंने जब देखा कि सचिन का स्कोर काफी देर से जस का तस है, तो वह उनके पास पहुंचे। सलाह दी, 'पाजी, गेंद तो घूम नहीं रही। कुछ तो एकदम तीर की तरह सीधी जा रही हैं। आप स्टेप आउट करके क्यों नहीं मारते। एक बार बाउंड्री के पार भेज देंगे, तो खेलना आसान हो जाएगा।'

Sachin Tendulkar Virender Sehwag

सचिन अनुभवी बल्लेबाज थे। उन्हें हालात के बारे में बखूबी पता था। लिहाजा, उन्होंने सहवाग की बात को अनसुना कर दिया। लेकिन, जब सहवाग ने 2-3 ओवर तक जोर दिया, तो वह तैयार हो गए। लेकिन, बदकिस्मती कि सचिन जिस गेंद को मारने के लिए बाहर निकले, वही घूम गई। सचिन जैसे ही आउट हुए, सहवाग ने अपना मुंह दूसरी तरफ फेर लिया, जैसे कि उनको जानते ही नहीं।

हालांकि, सहवाग ने सचिन के आउट होने का बदला ज़रूर निकाला। जब जाइल्स ने उन्हें निगेटिव गेंदबाजी की, तो उन्होंने उसे मिड ऑन बाउंड्री के बाहर भेजा। फिर एक तगड़े स्वीप के ज़रिए चार रन बटोरे। फिर भी सहवाग को पता था कि उन्होंने क्या ग़लती की है। यही वजह थी कि सचिन के गुस्से से बचने के लिए वह टी ब्रेक के दौरान ड्रेसिंग रूम में ही नहीं गए। बेंगलुरु में ड्रेसिंग रूम ऊपर की ओर है। सहवाग नीचे अंपायर के रूम में बैठे रहे। जब सचिन को यह बात पता चली, तो उन्होंने सहवाग को बुलवाया कि आ जाओ ऊपर, मार नहीं पड़ेगी। तब जाकर सहवाग ड्रेसिंग रूम में गए।

सचिन बनाम जाइल्स पर वापस आते हैं। जाइल्स ने हमेशा सचिन के ख़िलाफ़ निगेटिव लाइन का ही सहारा लिया। भारत में उन्होंने सचिन को करीब 70 फ़ीसदी गेंदे लेग स्टंप के बाहर फेंकीं। बेंगलुरु टेस्ट तो इस मामले में अलग ही मुकाम पर है। वहां जाइल्स ने 34 ओवरों में सिर्फ दो बॉल विकेट के आसपास डाली थी।

वनडे और टी-20 के उलट टेस्ट में अमूमन लेग स्टंप के बाहर की गेंदों को वाइड नहीं दिया जाता। लेकिन, इस तरह की निगेटिव लाइन बोलिंग क्रिकेट का मजा किरकिरा कर रही थी। इसलिए आईसीसी ने एक सख्त नियम बनाया। अगर अंपायर को लगता है कि लेग स्टंप के बाहर गेंदबाजी निगेटिव लाइन स्ट्रैटजी के तहत हो रही है, तो वह गेंद को वाइड करार दे सकता है। इस नियम ने एक तरह से इस स्ट्रैटजी को ख़त्म ही कर दिया।

आवाज़ : मोहित सिन्हा


Web Title:

Virender Sehwag Reveals Dressing-Room Secrets

(Hindi podcast on Navbharat Gold)

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