यह आलेख क्यों पढ़ें

  • नीरज चोपड़ा कैसे बने हरियाणा की लड़कियों के आदर्श
  • नीरज के सीनियर हनुमान सिंह दे रहे हैं इन्हें कोचिंग
  • गरीब घरों की लड़कियां क्यों जा रही हैं जेवलिन अकैडमी
  • हरियाणा में जेवलिन कैसे बना स्टेटस सिंबल

यह भी सुनें या पढ़ें: नीरज चोपड़ाः संयोग ने बदला खेलों का इतिहास
यह भी पढ़ें: एक और इतिहास से जरा सा चूक गए नीरज

जब वह रोटी बेलती है तो नक्शे तैयार हो जाते हैं। तरह-तरह के मैप्स। भारत का नक्शा, अफ्रीका का नक्शा, रूस के विस्तारवादी सपने का नक्शा। सातवीं क्लास के एटलस के पन्नों पर दर्ज नक्शे उसकी बेलन से उभरते रहते हैं। शायद मीनाक्षी यही चाहती भी है अंदर ही अंदर। ये रोटियां मन में दबे उसके सपने को आकार देती हैं कि ऐसी हो उसकी दुनिया। हर बार रोटी का आकार बदलता रहता है। रोटियां तो उसे रोज बनानी होती हैं, सुबह-शाम। वह भी घर में झाड़ू देने, हैंडपंप से पानी भरने, भैंसों को चारा देने, दूध दुहने, छोटे भाई को नहलाने, उसके स्कूल का होमवर्क कराने के अलावा। और मीनाक्षी की उम्र कितनी है? महज 11 साल। जिस उम्र में उसे ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए था, उस उम्र में ये नन्हे हाथ इतने सारे काम निपटाते हैं। उससे रोटियों का जिक्र कीजिए और शरमाती हुई सी आवाज में कहती है, ‘मैप्स ही बनते हैं, गोल तो कभी-कभी।’

लेकिन इन हाथों को भाला फेंकते हुए देखना चाहिए, हर दोपहर। पास के ही ऊबड़-खाबड़ मैदान में जिसे बनगांव में लोग अकैडमी कहते हैं। जिस दिन हम वहां पहुंचे, उसने अपने रेग्युलर थ्रो के मुकाबले 5 मीटर दूर फेंका था भाला। पिछली बार की उसकी दूरी थी 25.8 मीटर जबकि उस दिन पूरे 30 मीटर दूर गिरा था उसका भाला। ‘वह आपको प्रभावित करने की कोशिश कर रही है। उसे मालूम था, आप देख रहे हैं।’ हंसते हुए कहते हैं कोच हनुमान सिंह।

जिस सीजन में स्टेट एथलेटिक सर्किट में उनके जूनियर रहे नीरज चोपड़ा ओलिंपिक चैंपियन और वर्ल्ड चैंपियनशिप में सिल्वर जीत चुके हैं, उसमें हनुमान सिंह अपने इस दड़बे में हैं। उधार ली हुई दो एकड़ जमीन का यह टुकड़ा, जिसमें एक तरफ कामचलाऊ सी गोशाला बनी है तो दूसरी तरफ चारा रखने का गोदाम है। इस गोदाम को इक्विपमेंट रूम बना दिया गया है। पिछले साल तोक्यो ओलिंपिक में गोल्ड जीतने के बाद नीरज चोपड़ा जिस तरह अपने प्रदर्शन से अंतरराष्ट्रीय फलक पर छाए हुए हैं, उससे जेवलिन को यहां के स्पोर्ट्स हलकों में स्टेटस सिंबल के साथ ही जरूरत के रूप में भी देखा जाने लगा है। सरकारी आंकड़ों की बात करें तो हरियाणा में वर्तमान सालाना स्पोर्ट्स बजट 260 करोड़ रुपये है। राज्य में 1100 रजिस्टर्ड स्पोर्ट्स अकैडमी हैं और उनमें 25000 रजिस्टर्ड स्पोर्ट्सपर्सन्स।

हरियाणा के बनगांव में 2010 में शुरू हुए इस माई जंप एंड थ्रो अकैडमी में सुविधाओं की जो भी कमी हो, जोश और मनोबल भरपूर है। और उसके बूते ही सही, लेकिन इसने छोटी सी अवधि में अपना नाम भी अच्छा बना लिया है। पिछले साल दिल्ली में अंडर 16 कैटिगरी में फुल पोडियम प्रदर्शन से बनगांव की लड़कियों ने अपनी इस अकैडमी का झंडा बुलंद कर दिया था। खुद भी स्टेट सर्किट के जेवलिन थ्रोअर रह चुके कोच महावीर सिंह सुधरे हुए बाहुबली हैं। वह कहते हैं कि अगर अपने पुराने रंग-ढंग पर कायम रहते तो अब तक शायद जेल में होते। उन्हें सुधारने में जेवलिन की बड़ी भूमिका रही। वह मानते हैं कि स्पोर्ट हर उस शख्स को सिखाया जा सकता है जिसमें बचपन से ही रुझान दिखे।

Neeraj Chopra

यहां वह सिर्फ लड़कियों को सिखा रहे हैं। हालांकि उन्होंने शुरुआत लड़कों और लड़कियों दोनों के साथ की थी। लेकिन दोनों पर ध्यान बनाए रखना मुश्किल हो रहा था। इसलिए जल्दी ही उन्होंने लड़कों की जिम्मेदारी बगल के शहर में अपने एक दोस्त को सौंप दी और अपना फोकस पूरी तरह से यहां की लड़कियों पर रखने का फैसला किया। इस अकैडमी में दस लड़कियां बनगांव की होती हैं और दो बाहरी, जिनमें से एक या तो दलित होती है या आदिवासी। वह कहते हैं, आगे चलके अगर नैशनल कैंप में आएं तो वो सक्सेस है, उससे पहले उन्हें कम उम्र में ढूंढ़ना और आकार देना मेरा काम है।’

करीब 1500 घरों का जाट बहुल गांव बनगांव इस मिथक को तोड़ता है कि आधुनिक दौर में कॉरपोरेट सपोर्ट के बगैर स्पोर्ट्स जीवित नहीं रह सकता। वैसे फंड की जरूरत तो होती ही है और इसका हमेशा स्वागत भी रहता है, लेकिन यह मूलत: आत्मनिर्भर माइक्रो मॉडल है, जिसे हम यहां फलते-फूलते देख रहे हैं। इस अकैडमी को लें तो यह हरियाणा सरकार की उदारता के अलावा अच्छे प्रदर्शन की बदौलत जीते कैश रिवॉर्ड्स पर ही निर्भर करता है। जो भी कैश इनाम में मिलता है वह अकैडमी के कोष में जमा हो जाता है।

‘क्या इसमें अकैडमी के लक्ष्यों और परिवार की जरूरतों के बीच का विरोध आड़े नहीं आता?’ इस सवाल पर हनुमान सिंह मुस्कुराते हैं, ‘कैश रिवॉर्ड तो हमारे फंड का मुख्य स्रोत है। यहां के परिवार इस बात को समझते हैं कि हम क्या हासिल करना चाहते हैं। उन्हें मालूम है कि वे पैसे हमारे ज्यादा काम आएंगे बनिस्बत इसके कि उनकी बचत का हिस्सा बन जाएं।’

Haryana Girls And Neeraj Chopra

इस तरह से देखें तो मीनाक्षी का जज्बा समझना मुश्किल नहीं है। उसकी विधवा मां 300 रुपये दिहाड़ी कमाती है खेतों में काम करके। घर के बाकी काम संभालते हुए मीनाक्षी, वही करने की कोशिश कर रही है जो हनुमान चाचा हर शाम गांव की लड़कियों को समझाते हैं। मां को भी यह बिल्कुल ठीक लगता है। समझना मुश्किल नहीं कि इसके पीछे अपनी बेटी का बेहतर भविष्य सुनिश्चित करने की उसकी इच्छा काम कर रही है। इससे यह मान्यता बल पाती है कि जेवलिन से बेहतर भविष्य संभव है जो आगे की राह थोड़ी आसान बनाता है।

उदाहरण के लिए, राजबाला को ही लीजिए। वह छूटते ही कहती हैं, ‘मैं क्यों रोकूंगी उसे?’ 34 साल की राजबाला अपनी बेटी दीपिका की बात कर रही हैं, जो 16 साल की उम्र में पंचकूला में खेलो इंडिया यूथ गेम्स में गोल्ड जीत चुकी है। वह कहती हैं, ‘जेवलिन कैसे फेंका जाता है यह मुझे नहीं पता, लेकिन यह आपको कितना कुछ दे सकता है यह मैं जानती हूं।’

आवाज़ : शबनम

आलेख रेट करें

आज ही न्यूजलेटर और नोटिफिकेशंस को सब्सक्राइब करें

हिन्दी हैं हम! भारत की दुनिया, दुनिया में भारत

Copyright @2022 BCCL. All Rights Reserved