यह आलेख क्यों पढ़ें?

  • कश्मीर में हिंदु और मुसलमान पंडित टाइटल क्यों लगाते हैं?
  • महाराजा रणबीर सिंह के शासन काल में कौन से कदम उठाए गए?
  • क्या महाराजा रणजीत सिंह के दौर में भी कश्मीर मुसलमानों की ‘घर वापसी’ की कोशिशें हुईं?
  • कश्मीर मुसलमानों की ‘घर वापसी’ पर बनारस के पंडितों ने क्यों जताया ऐतराज?

History of Maharaja Ranbir Singh & Kashmir Muslim: 22 जून 2017 की रात थी। श्रीनगर में एक मस्जिद के पास भीड़ ने डीएसपी मोहम्मद अयूब पंडित की पीट-पीटकर हत्या कर दी। तन पर एक कपड़ा भी नहीं छोड़ा। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में शरीर की हर हड्डी टूटी मिली। आप सोच रहे होंगे कि मुसलमानों की ‘घर वापसी’ का इस घटना से क्या वास्ता? उस वक्त एक विडियो वायरल हुआ था। उसमें डीएसपी अयूब पंडित को कश्मीरी हिंदू बताकर भड़काने का प्रयास किया गया। मुसलमानों के पंडित टाइटल को लेकर भी तब खूब चर्चा हुई।

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दरअसल कश्मीर में इस्लाम आने से पहले सिर्फ हिंदू थे। जिनका मुख्य काम पढ़ना और पढ़ाना था, उन्हें पंडित टाइटल मिला। मुसलमान शासकों ने जब जबरन धर्म परिवर्तन कराया तो काफी हिंदुओं ने इस्लाम कबूल कर लिया। लेकिन कई हिंदू पंडितों ने मुसलमान बनने के बाद भी अपने टाइटल को नाम के साथ जोड़कर रखा। मोहम्मद अयूब पंडित भी ऐसे ही मुसलमान थे। उनके पुरखे हिंदू पंडित थे।

हिंदुओं और मुसलमानों के कई सरनेम भी इसी वजह से मिलते-जुलते हैं। भट या भट्ट, बट या बट्ट, डार या धर, ये सरनेम हिंदू और मुसलमान दोनों के मिलते हैं। देश के कई हिस्सों में मुसलमान अपने नाम के साथ पीर लगाते हैं। कश्मीर में हिंदू भी ऐसे मिलेंगे, जिनके नाम के साथ पीर लगा होता है। इतिहास और सरनेम भले ही दोनों का एक हो, लेकिन घाटी में इनके बीच की खाई बहुत बड़ी है। महाराजा रणबीर सिंह ने अपने शासनकाल में इसी खाई को पाटने का प्रयास किया था।

कश्मीरी मुस्लिम घर वापसी

महाराजा गुलाब सिंह बीमार चल रहे थे। 1857 में उन्होंने अपनी सल्तनत तीसरे बेटे रणबीर सिंह को सौंप दी। महाराजा रणबीर सिंह ने 1857 से 1885 तक कश्मीर में राज किया। उनके शासन के दौरान ही शियाओं और सुन्नियों के बीच बड़ा टकराव हुआ। कई दिनों तक मारकाट मची रही। ईरान से शियाओं को मदद मिल रही थी। महाराजा परदे के पीछे से सुन्नियों के साथ थे। सुन्नी भारी पड़े और शियाओं को घाटी छोड़नी पड़ी। हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने वालों की कतार में सुन्नी ही ज्यादा थे।

महाराजा रणबीर सिंह सार्वजनिक तौर पर इस विवाद से दूर ही रहे। किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं किया, लेकिन जिनका नुकसान हुआ, उन्हें राजकोष से मुआवजा जरूर दिया। मदद पाने वाले ज्यादातर सुन्नी थे। यानी ऐसे मुसलमान, जिन्होंने हिंदू धर्म छोड़ा था। इतिहासकार मानते हैं कि यह मुआवजा नहीं, बल्कि एक लालच था। लालच दोबारा हिंदू धर्म में वापसी का। संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी के विद्वान रणबीर सिंह ने कई मंदिर और स्कूल भी बनवाए थे। बनारस के पंडितों के बीच भी उनका खूब प्रभाव था। वेद, व्याकरण और संस्कृत भाषा पर मजबूत पकड़ की वजह से वाराणसी के पंडितों में उनकी खूब इज्जत थी।

उधर, घाटी के करीब 90 पर्सेंट मुसलमान महाराजा रणबीर सिंह की उदारता से खुश थे। 1877 का वह दौर था। देश के कई हिस्से अकाल की चपेट में आ चुके थे। कश्मीर में भी अकाल पड़ा। महाराजा रणबीर सिंह ने अपने राज्य के मुसलमानों की खूब मदद की। यही दरियादिली मुसलमानों को ‘घर वापसी’ के लिए सोचने पर मजबूर करने लगी। महाराजा तक यह प्रस्ताव पहुंचा तो उन्होंने फौरन बनारस के पंडितों से मशविरा किया। लेफ्टिनेंट जनरल के के नंदा ने अपनी किताब ‘1971 भारत पाक युद्ध’ में लिखा है कि तब घाटी के करीब 90 पर्सेंट मुसलमान हिंदू धर्म में वापसी के लिए तैयार थे। लेकिन बनारस के पंडितों तक यह खबर पहुंची तो वे विरोध करने लगे। बनारस का कोई पंडित इनकी ‘घर वापसी’ कराने के लिए तैयार नहीं हुआ।

कश्मीरी मुस्लिम घर वापसी

इतिहासकारों का मानना है कि रणबीर सिंह के शासन में सिर्फ मंदिरों पर ध्यान दिया गया। संस्कृत और वेद की पढ़ाई वाले स्कूल ज्यादा खुले। मुसलमानों को लगने लगा था कि हिंदू धर्म अपनाने के बाद कई और लाभ भी मिल सकते हैं। यही कारण था कि वे दोबारा हिंदू बनना चाहते थे। कश्मीर विस्थापितों के संगठन से जुड़े अजय पंडिता का कहना है कि कश्मीर में सिर्फ 5 पर्सेंट ही बाहरी थे, बाकी यहीं के रहने वाले हिंदू थे। सिकंदर बुतशिकन के दौर से इनका धर्मांतरण करके मुसलमान बनाया गया था। यह बात 1860-61 की है। रणबीर सिंह की न्याय व्यवस्था और मदद के तरीकों ने सुन्नियों को फिर हिंदू धर्म में वापसी के लिए प्रेरित किया। कई वर्षों तक बनारस के पंडितों को मनाने का दौर चला। लेकिन, बनारस के पंडित इन्हें दोबारा हिंदू बनाने के लिए तैयार न हुए। उनका कहना था कि हिंदू सिर्फ जन्म लेते हैं। किसी गैर-हिंदू को हिंदू बनाना धर्म के विरुद्ध है।

कश्मीर के इतिहास को करीब से देखने वाले रिटायर्ड कर्नल तेज टिक्कू ने बताया कि रणबीर सिंह से पहले भी मुसलमानों के हिंदू धर्म में आने की चर्चा उठी थी। तब देव स्वामी अखंड भारत के मशहूर पंडित हुआ करते थे। उन्होंने यह तर्क दिया था कि ‘हिंदू धर्म में गाय पूजनीय है। मुसलमानों ने इनका मांस खाकर म्लेच्छ का काम किया है। ऐसे में इन्हें हिंदू धर्म में शामिल कराना अपमान होगा।‘ यह दौर महाराजा रणजीत सिंह का था। कश्मीर में डोगरा राजवंश की तब शुरुआत नहीं हुई थी।

कश्मीरी मुस्लिम घर वापसी

नोएडा में रहने वाले उत्पल कौल पेशे से प्रकाशक हैं। कश्मीर के इतिहास पर उन्होंने कई शोध किए हैं। कौल ने बताया कि श्रीनगर की जामा मस्जिद पर महाराजा रणजीत सिंह ने तोप लगा दी थी। तब कश्मीरी पंडित ही सामने आए और मस्जिदों को बचाने की गुहार लगाई। रणजीत सिंह ने नियम लागू कर दिया था कि मुसलमान अपने मुहल्ले की मस्जिद में ही नमाज पढ़ेंगे। किसी जगह कई मुहल्लों के लोग जमा नहीं होंगे। उनके वक्त भी ऐसी चर्चा ने जोर पकड़ा कि मुसलमान हिंदू धर्म अपनाना चाहते हैं। हालांकि इसका कोई लिखित प्रमाण नहीं मिलता। चर्चा का यही सिलसिला महाराजा रणबीर सिंह के शासनकाल तक पहुंच गया। इन चर्चाओं पर संदेह इसलिए होता है कि करीब 120 साल हिंदू राजाओं का कश्मीर में शासन रहा, लेकिन किसी ने भी मुस्लिमों के धर्मांतरण का ठोस प्रयास नहीं किया।

इतिहासकार मानते हैं कि महाराजा रणबीर सिंह के शासन के बाद मुसलमान फिर हिंदू बनने के लिए खड़े नहीं हुए। महाराजा चाहते थे कि कश्मीरी मुस्लिम दोबारा हिंदू बनें। इसके लिए उन्होंने अपने अन्न भंडार का भी दरवाजा खोल दिया था। इसी दरियादिली की वजह से उनका अन्न भंडार लगभग खाली हो गया। उसी समय अकाल पड़ा। कहते हैं कि अकाल की वजह से तब घाटी में लगभग आधी आबादी खत्म हो गई। 12 सितंबर 1885 को महाराजा रणबीर सिंह का भी निधन हो गया। घाटी के मुसलमानों की ‘घर वापसी’ का किस्सा भी उनके साथ ही थम गया।

आवाज़ : रोहित उपाध्याय

Web Title:

Are Muslims in Kashmir converted? |History of Islam in Kashmir | Which caste is in majority in Kashmir? | Hindu Majority in Kashmir | जानिए, कश्मीर में हिंदुओं और मुसलमानों के बारे में | क्या कश्मीरी पंडित इस्लाम में परिवर्तित हो गए हैं?

(Hindi podcast on Navbharat Gold)

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