यह आलेख क्यों पढ़ें?

  • दरभंगा से क्या कनेक्शन है मुग़ल वंश का?
  • बहादुर शाह जफर के पोते ने क्यों छोड़ी थी दिल्ली?
  • अपनी क़िताब में क्या-क्या लिखा है गोरगान ने?
  • अभी किस हालत में है गोरगान की क़ब्र?

'कितना है बद-नसीब 'जफर' दफ्न के लिए
दो गज ज़मीन भी न मिला कू-ए-यार में'

Bahadur Shah Zafar Royal Family: भारत पर तकरीबन 300 साल तक राज करने वाले मुग़ल वंश के अंतिम बादशाह बहादुर शाह जफर ने रंगून में निर्वासित जीवन व्यतीत करते हुए जब यह लिखा होगा तो उनके ज़हन में 'कू-ए-यार' (प्रियतमा की गली) यानी दिल्ली थी। दिल्ली के साथ-साथ उनके ख्याल में मुग़लिया सल्तनत में चलने वाले राजनीतिक षड्यंत्रों, प्रेम के किस्सों और शहंशाहों के अंत का गवाह रहा लाल क़िला भी होगा।

वह लाल क़िला जिसे मुग़ल शासक शाहजहां ने यमुना नदी के किनारे 1638 में बनवाना शुरू किया था। 15 जून 1648 को इस क़िले में प्रवेश करके शाहजहां ने तय कर दिया कि लाल क़िला हिंदुस्तान की राजनीति का अहम किरदार होगा। लेकिन, इस क़िले से जुड़ी एक कहानी के तार दिल्ली से तकरीबन 12 सौ किलोमीटर दूर बिहार के दरभंगा तक जाते हैं। यह कहानी भी क्या खूब बन सकती थी, अगर इसे पूरा होने का मौका मिलता।

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दरभंगा शहर के रेलवे स्टेशन के पास मशहूर चंद्रधारी म्यूजियम के ठीक पीछे है दिग्घी तालाब। इस तालाब के दक्षिण पश्चिमी हिस्से पर तीन क़ब्र है। स्थानीय लोगों में इस जगह की पहचान है 'लाल क़ब्र' के तौर पर। टूटी फूटी लाल नक्काशीदार दीवार से घिरी हुई इन क़ब्रों पर स्थानीय लोग रस्सी बांधकर अपने कपड़े सुखाते हैं। क़ब्र तक जाने वाली सीढ़ियां भी टूटी हैं और कभीकभार कुत्तों-बकरियों की आरामगाह बन जाती हैं।

Mughal Zubairuddin Bahadur Gorgan

इन तीनों में से एक क़ब्र है मिर्जा मो. रईस बख्त जुबैरूद्दीन 'गोरगान' की। बहादुर शाह जफर के सबसे बड़े बेटे मिर्जा मोहम्मद दारा बख्त के बेटे थे जुबैरूद्दीन। दारा बख्त की मौत 1849 में मामूली से बुखार के चलते हो गई थी।

गोरगान के जीवन पर एमएलएमएस कॉलेज के प्राचार्य और इतिहासकार मुश्ताक अहमद ने 'आतिश-ए-पिन्हां' लिखी है। वह बताते हैं कि अगर 1857 के विद्रोह में मुग़लिया सल्तनत का तख्ता नहीं पलटता, तो गोरगान दिल्ली की गद्दी पर गद्दीनशीं होते।

दरअसल 1857 की क्रांति में मुग़लिया राज का सूरज अस्त होने के बाद मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफर, उनकी बेगम जीनत महल और बेटे मिर्जा जवान बख्त को अंग्रेज़ों ने रंगून (म्यांमार) निर्वासित कर दिया था। विजयी अंग्रेज़ कमांडरों ने मुग़ल साम्राज्य के उत्तराधिकारियों की बेरहमी से हत्या करना और उनके शवों का सार्वजनिक अपमान करना शुरू कर दिया।

ऐसे में शाही परिवार के बचे हुए लोग अपनी जान बचाने के लिए अलग-अलग जगहों पर चले गए। शाही परिवार के ये लोग सामान्य लोगों की तरह जीवनयापन को मजबूर थे। ख़ुद बहादुर शाह जफर रंगून जाने से पहले बेगम समरू की हवेली में थे, जहां उनकी निगरानी चार्ल्स ग्रिफीन नाम का अंग्रेज़ अफ़सर कर रहा था। बाद में चार्ल्स ने अपनी क़िताब 'नैरेटिव ऑफ द सीज ऑफ डेल्ही' में बहादुर शाह जफर का ब्यौरा देते हुए लिखा कि मुग़ल राजवंश का आखिरी प्रतिनिधि एक बरामदे में एक साधारण चारपाई पर बिछाए गए गद्दे पर पालथी मारकर बैठा हुआ था। उनके रूप से कुछ भी भव्य नहीं था, सिवाए उनकी सफे़द दाढ़ी के जो उनके कमरबंद तक पहुंच रही थी।

Mughal Zubairuddin Bahadur Gorgan

साफ़ है कि आलीशान मुग़लिया साम्राज्य से ताल्लुक रखने वाला हर आदमी इसी तरह की या इससे भी बदतर ज़िंदगी बसर करने को मजबूर था। जुबैरूद्दीन गोरगान भी दरभंगा पहुंचने से पहले भारत के अलग-अलग हिस्सों में भटकते रहे। सबसे पहले रतलाम पहुंचे, उसके बाद राजस्थान के कई इलाक़ों में रहे और वहां से फिर इलाहाबाद यानी आज के प्रयागराज। लेकिन, इलाहाबाद में उनका मन नहीं लगा तो वह अजीमाबाद (पटना) आ गए।

गोरगान ने अपने संस्मरणों पर क़िताब लिखी 'मौज-ए-सुल्तानी'। इसका प्रकाशन लखनऊ के मुंशी नवल किशोर प्रेस से सितंबर 1884 में हुआ था। इसको साल 2003 में दरभंगा राजपरिवार द्वारा संचालित कल्याणी फाउंडेशन ने फिर से प्रकाशित कराया है। मौज-ए-सुल्तानी में गोरगान लिखते हैं कि पटना शहर के लोग सभ्य और शिष्टाचार वाले हैं। यहां इस्लामपुर के जागीरदार चौधरी मोहम्मद जहरूलहक से उन्हें विशेष प्रेम मिला।

पटना के बाद गोरगान मुजफ्फरपुर गए, जहां से उनका अगला पड़ाव था बेतिया। इसके बाद वह कुछ दिन बेतिया राज के मेहमान रहे। अपनी क़िताब में गोरगान लिखते हैं कि बेतिया महाराज राजेंद्र किशोर सिंह ने उनके लिए पालकी भेजकर अपने महल में आने का न्योता दिया। गोरगान के महल पहुंचने पर राजेंद्र किशोर उनका स्वागत करने ख़ुद बरामदे तक आए। अपने शीशमहल में ले जाकर गोरगान को बैठने की जगह देकर राजा ख़ुद हाथ बांधे खड़े रहे।

असल में 17वीं शताब्दी में मुग़ल बादशाह शाहजहां के आदेश पर बेतिया राज अस्तित्व में आया था। इसी तरह दरभंगा राज का श्रेय भी मुग़लिया सल्तनत को जाता है। बेतिया में रहने के बाद जुबैरूद्दीन गोरगान दरभंगा पहुंचे। जुबैरूद्दीन कुछ वक़्त के लिए भागलपुर भी रहे थे, जहां उनकी मुलाकात दरभंगा महाराज लक्ष्मेश्वर सिंह के भाई कुंवर रामेश्वर सिंह से हुई। वहीं पर उन्होंने रामेश्वर सिंह को अपनी हालत के बारे में बताया, जिसके बाद 17 मार्च 1881 को जुबैरूद्दीन दरभंगा आए। यहां कुछ दिनों तक उनके रहने का इंतजाम दरभंगा के एक नामी रईस मुहम्मद सादिक अली के यहां किया गया। महाराज लक्ष्मेश्वर सिंह की विनम्रता और आतिथ्य से प्रभावित होकर जुबैरूद्दीन ने दरभंगा को ख़ुद के लिए सुरक्षित महसूस किया। इसके बाद जुबैरूद्दीन अपने परिवार को लेकर दरभंगा आ गए। दरभंगा राज ने अपने महल के पास ही कटहलबाड़ी मोहल्ले में जुबैरूद्दीन और उनके परिवार के लिए एक घर बनवाया और मस्जिद बनवाई।

Mughal Zubairuddin Bahadur Gorgan

मौज-ए-सुल्तानी में इस बात का ज़िक्र बार-बार मिलता है कि जुबैरूद्दीन देश के जिस भी हिस्से में जाते, वहां के स्थानीय अंग्रेज़ अधिकारियों से व्यक्तिगत तौर पर ज़रूर मिलते थे। इस मुलाकात का मकसद था ब्रिटिश अधिकारियों को इस बात के प्रति आश्वस्त करना कि वह अंग्रेज़ों की मुखालफत की कोई योजना नहीं बना रहे। इसी तरह देसी रजवाड़ों और जमींदार वाले इलाके़ में जुबैरूद्दीन अपने मुलाजिम से यह ख़बर भिजवाते थे।

अपने दादा बहादुर शाह जफर की तरह ही जुबैरूद्दीन शायर तबियत के आदमी थी। अपनी क़िताब में उन्होंने बिहार, कलकत्ता, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, मुंबई की यात्राओं का तफसील से वर्णन किया है। साथ ही, मुग़ल शासकों की वंशावली और उनके द्वारा बनवाई गई इमारतों के बारे में भी बहुत विस्तार से लिखा है।

घूमने और समाज को समझने की जिज्ञासा रखने वाले जुबैरूद्दीन गोरगान ने दो क़िताबें और लिखीं। 'चमनिस्तान-ए-सुखन' काव्य संग्रह है। दूसरी क़िताब का नाम है 'मशनाबी दुर्रे शहसवार', जो महाकाव्य है।

1883 में गोरगान के इकलौते बेटे की हैजा से मौत हो गई। एक साल बाद उनकी बेगम का भी देहांत हो गया। इन दोनों की मौत से जुबैरूद्दीन तन्हा हो गए। इस तन्हाई में उन्होंने दरभंगा से बाहर जाने का फैसला लिया। लेकिन, दरभंगा महाराज लक्ष्मेश्वर सिंह ने उन्हें रुके रहने के लिए मना लिया। वह जीवनभर दरभंगा में रहे और तकरीबन 85 साल की उम्र में दरभंगा में ही अंतिम सांस ली। जुबैरूद्दीन गोरगान की मौत के बाद महाराजा रामेश्वर सिंह ने उनके लिए मक़बरा बनवाया। यह बात दीगर है कि दरभंगा राज ने ताज़िंदगी जिस जुबैरूद्दीन को अपना आतिथ्य और भरपूर प्रेम दिया, उनकी दो गज की क़ब्र की कदर भी दरभंगा के शहरी और बिहार सरकार नहीं कर सकी।

आवाज़ : बबीता जैन


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(Hindi podcast on Navbharat Gold)

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