यह आलेख क्यों पढ़ें?

  • गले से जुड़ी समस्याओं के बारे में जानने के लिए
  • बदलते मौसम में किस तरह रखें गले का ख्याल?
  • किन वजहों से खराब हो सकता है हमारा गला?
  • गले की परेशानी में कब तक करें घरेलू उपाय?

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जब कफ से जुड़ी परेशानी होती है, खराश होती है, तो कई बार गले में दर्द भी होने लगता है। कुछ लोगों को सांस भी फंसती हुई महसूस होती है कई बार। इन सभी के निदान के लिए हम गरारे करते हैं। गुनगुना पानी पीना शुरू करते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि गले की परेशानी में कब तक हम घरेलू उपायों से काम चला सकते हैं? जानने वाली बात यह भी है कि गले के इलाज में एलोपैथी की तरह आयुर्वेद कितना कारगर है? पेश है एक्सपर्ट्स से बात कर ज़रूरी जानकारी :

सबसे ख़ास बातें
1.
जब गला खराब हो, खराश हो या हल्की खांसी, तो इलाज घरेलू तरीकों से हो सकता है। अगर साथ में बुखार और गले में दर्द भी है, तो डॉक्टर के पास ज़रूर जाना चाहिए। डॉक्टर की सलाह से कोरोना टेस्ट भी कराना चाहिए।
2. मुंह की सफाई न रखने पर भी गला खराब होता है। इसलिए रोज सुबह और रात को सोते वक़्त हर दिन 2 मिनट ब्रश ज़रूर करें।
3. मॉनसून में इंफेक्शन की आशंका इसलिए बढ़ जाती है, क्योंकि इस दौरान बैक्टीरिया, वायरस, फंगस आदि के पनपने के लिए मौसम मुफीद होता है। हमारे शरीर की इम्यूनिटी कुछ कम होती है। इसलिए सब्जी और फलों आदि को अच्छी तरह धोकर ही खाएं।
4. गले में घाव, जलन या रैशेज आदि की एक बड़ी वजह एसिड रिफ्लक्स है। इसलिए ज़्यादा तेल-मसाले वाली चीज़ें खाने से बचें।
5. अगर मॉनसून में हर बार इस तरह की परेशानियां होती है, तो बारिश शुरू होने से 15 दिन पहले से ही आधा चम्मच सितोपलादि चूर्ण या तालिसादि चूर्ण का सेवन एक चम्मच शहद या पानी के साथ करना चाहिए। सितोपलादि चूर्ण का इस्तेमाल वे करें, जिन्हें शुगर नहीं है, क्योंकि इसमें चीनी होती है। वहीं, तालिसादि चूर्ण शुगर वाले ले सकते हैं।

आंख, कान, नाक और मुंह जिस जगह पर आपस में जुड़ते हैं, वह है गला। इतना ही नहीं, पेट तक पहुंचने वाला फूड पाइप भी गले से ही शुरू होता है। सीधे कहें, तो गला एक जंक्शन है। ऐसे में गले में होने वाली समस्या से इन अंगों पर भी बुरा असर पड़ता है या इन अंगों में होने वाली परेशानी का असर सीधे गले पर होता है। बरसात के मौसम में परेशानी ज़्यादा बढ़ जाती है।

Throat health guide

गले की 3 तरह की परेशानियां

1. खराश और सूखी खांसी होना
जुकाम, बुखार की शिकायत होने पर सूखी खांसी मुमकिन है। यह ज़्यादा पलूशन की वजह से भी हो सकती है। चूंकि आजकल बरसात का मौसम है, इसलिए धूल कम है, लेकिन परागकण (पॉलन ग्रेंस: फूलों से निकलने वाले छोटे कण), फंगस आदि मौजूद रहते हैं। ये सांस लेने पर नाक से होते हुए गले तक पहुंचते हैं और एलर्जी पैदा करते हैं। इनकी वजह से भी कई बार गले में खराश और सूखी खांसी होती है। कभी-कभी इसमें नाक से पानी निकलता है या छींक आती है। यह समस्या ज़्यादातर नाक और गले से ही जुड़ी होती है। इसे ठीक करने के लिए खांसी को दबाने वाली और एलर्जी कम करने वाली दवा या सिरप देते हैं।

2. बलगम आना
गले में इंफेक्शन होने का मतलब है कि गले में, गले से फेफड़ों तक जाने वाली विंड पाइप में या फिर फेफड़ों में बलगम जमा हुआ है। यह मौसम में बदलाव की वजह से, ठंडी चीज़ें खाने से, बारिश में भीगने से, इस मौसम में एसी में सोने से, एक दिन का बासी खाना खाने से, फ्रिज का पानी पीने से, वायरल और बैक्टीरियल इंफेक्शन आदि की वजह से हो सकता है। डॉक्टर इसके लिए ऐसी दवा या सिरप देते हैं, जो कफ निकाले।

यह नोट करने वाली बात है कि अगर परेशानी बड़ी नहीं है, तो खराश, सूखी खांसी और बलगम - इन सभी समस्याओं में गरारे से फायदा हो जाता है। लेकिन, अगर परेशानी इससे बड़ी है, तो गले का दर्द बुखार में तब्दील हो सकता है।

3. दर्द, जलन महसूस होना, बुखार आना
इसे खराश और खांसी का अगला पड़ाव कह सकते हैं। इसमें गले में दर्द, जलन और बुखार- तीनों हो सकते हैं या फिर पहले दो हो सकते हैं। यह अमूमन खराश और खांसी के दूसरे या तीसरे दिन हो सकता है। अगर समस्या सामान्य है यानी खराश और हल्की खांसी है, तो गुनगुने पानी से गरारे करने पर काफी हद तक कम हो जाती है। लेकिन, जब दर्द और जलन महसूस हो तो समझना चाहिए कि डॉक्टर की ज़रूरत है।

इन वजहों से भी होता है गला खराब
साइनस :
सिर दर्द और सूखी या कफ वाली खांसी। इसे साइनोसाइटिस भी कहते हैं। इसमें साइनस में इंफेक्शन और सूजन आ जाती है।

गला (फेरिंग्स) खराब : इसमें सूखी खांसी होती है। चूंकि इसकी शुरुआत गले यानी यहां मौजूद फेरिंग्स से होती है, इसलिए इसे फेरिंजाइटिस भी कहते हैं। इसमें गले में सूजन हो जाती है।

गले से नीचे लेरिंग्स में सूजन : इसे लेरिंजाइटिस भी कहते हैं। बलगम वाली खांसी की शुरुआत यहीं से होती है। आवाज़ सही तरीके से नहीं निकलती। गले में कुछ फंसा हुआ महसूस होता है।

ट्रेकिया में इंफेक्शन : इसमें खांसी होने पर 'कुत्ते के भौंकने' जैसी आवाज़ आती है। कई बार बलगम भी आता है। उंगली से छाती का ऊपरी हिस्सा और गर्दन के नीचे का हिस्सा दबाने पर दर्द होता है। अगर इंफेक्शन गंभीर है, तो कई बार ट्रेकिया के करीब मौजूद लिंफनोड में सूजन आ जाती है, जिससे गांठ बनने लगती है। जब डॉक्टर मरीज के सीने को जांचने के लिए दबाते हैं, तो वहां दर्द महसूस होता है और खांसी आने लगती है। इसकी जांच को पुख्ता करने के लिए एक्सरे और सीटी स्कैन की ज़रूरत पड़ती है।

फेफड़ों में इंफेक्शन : फेफड़ों में होने वाला ज़्यादातर इंफेक्शन निमोनिया होता है। यह बैक्टीरिया और वायरल, दोनों तरह का होता है। इसमें बलगम वाली खांसी होती है। यह कई दिनों या हफ्तों तक हो सकती है। इसमें इंफेक्शन पैदा करने वाले वायरस या बैक्टीरिया को ख़त्म करने के लिए ऐंटिबायोटिक दवा लेनी पड़ती है।

दमा : यह बिना मौसम के भी होता है, लेकिन पलूशन बढ़ने या मौसम बदलने पर ज़्यादा होने लगता है। खांसी एक बार शुरू होती है, तो लगातार होती रहती है। आमतौर पर बलगम वाली खांसी होती है। यह ट्रेकिया और उसके छोटे ट्यूब में सिकुड़न की वजह से होती है। इसमें छाती से सांय-सांय की आवाज आती है। सांस लेने में परेशानी होती है।

टीबी : इस बीमारी में सबसे ज़्यादा फेफड़े प्रभावित होते हैं। इसका शुरुआती लक्षण खांसी ही है। इसमें पहले सूखी खांसी होती है। बाद में गंभीर होने पर खांसी के साथ बलगम और खून भी आने लगता है। अगर 14 दिनों या उससे ज़्यादा समय तक खांसी लगातार रहे, तो टीबी की जांच करा लेनी चाहिए। टीबी की वजह से फेफड़ों में पानी भी भर जाता है।

How to take care of throat

पेट से भी जुड़ा है गले का इंफेक्शन
सुनने में यह भले ही अजीब लगे, लेकिन कई बार हमारे ज़्यादा तेल-मसाले, देर से खाने, खाने का एक समय तय नहीं करने आदि की वजह से भी गले में खराश, खांसी की परेशानी हो जाती है। दरअसल, इस वजह से हमारी पाचन क्रिया प्रभावित होती है और शरीर खाना पचाने के लिए ज़्यादा मात्रा में एसिड निकालता है। यह एसिड कई बार पेट में वायरल या बैक्टीरियल इंफेक्शन की वजह से पेट से ऊपर गले तक पहुंच जाता है। इससे खांसी होने लगती है। सांस लेने में भी परेशानी आती है।

इलाज
- बाहर का खाना कम खाएं या न खाएं। आजकल फूड पॉइजनिंग के मामले काफी देखे जा रहे हैं। ऐसी जगह का पानी तो बिलकुल न पिएं, जिसके साफ़ न होने की आशंका हो।
- एसी चला सकते हैं, लेकिन तापमान 24 से 27 डिग्री सेल्सियस के बीच ही रखें।
- मुंह अच्छी तरह साफ करें। 2 मिनट तक ब्रश करें। पेस्ट किस तरह का उपयोग करते हैं, इससे ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता। फर्क इससे पड़ता है कि हमने दांतों और मसूढ़ों पर ब्रश कितनी देर, किस तरह घुमाया है।
- गले में जरा भी खराश महसूस हो, खांसी हो तो घरेलू उपाय शुरू कर देना चाहिए। लेकिन, बुखार, गले में दर्द और दूसरी परेशानियां भी साथ में हैं, तो डॉक्टर की सलाह ज़रूर लेनी चाहिए।
- गरारे करना भी एक अच्छा विकल्प है। इसके लिए पानी और बीटाडीन को बराबर मात्रा में मिलाकर यानी 20 एमएल गुनगुना पानी तो 20 एमएल बीटाडीन (दो-दो चम्मच) मिलाएं। फिर गरारे करें। इसे दिनभर में 2 से 3 बार कर सकते हैं।
- अगर किसी को एलर्जी की परेशानी रहती है, तो बाहर निकलने से पहले मास्क लगाएं।
- स्टीम गले में जमे हुए बलगम को बाहर निकालने में मदद करती है।
- गुनगुने पानी में फिटकरी मिलाकर भी गरारे कर सकते हैं। एक गिलास गुनगुने पानी में 2 चुटकी फिटकरी पाउडर मिला सकते हैं। अगर फिटकरी पाउडर नहीं है, तो साबुत फिटकरी को ही गुनगुने पानी में 2 से 3 मिनट के लिए छोड़ दें, फिर छानकर उससे गरारे करें। फिटकरी से मुंह के छालों आदि में फायदा होता है।
- एक गिलास गुनगुने पानी में एक चम्मच हल्दी पाउडर या एक गिलास पानी में कच्ची हल्दी के एक टुकड़े को 5 मिनट उबालकर गरारे करने से काफी फायदा होता है।
- दिन में किसी भी समय 20 से 25 ml तिल या नारियल का तेल मुंह में भर लें और 5 से 7 मिनट तक रखे रहें। फिर कुल्ला करके फेंक दें। आयुर्वेद में इस क्रिया को गण्डूष कहते हैं।
- 50 ml सरसों के तेल में 2 चुटकी नमक मिलाकर 2 मिनट तक गर्म कर लें। फिर इस तेल से सीने की मालिश करें। इससे खांसी में राहत मिलती है।
- हर दिन सुबह फ्रेश होने के बाद नाक के दोनों सुराखों में उंगली से तिल, सरसों या बादाम का तेल लगाएं।

आवाज़ : रोहित उपाध्याय

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