यह आलेख क्यों पढ़ें?

  • खाद्य सुरक्षा और कीड़ों के संबंधों को समझने के लिए
  • कीड़ों को भोजन के तौर पर अपनाने की बात क्यों हो रही?
  • कीड़े खाने से पर्यावरण को कैसे फायदा होगा?
  • क्या भारत और बाकी दुनिया में लोग कीड़े खाते हैं?

यह भी सुनें या पढ़ें : क्या जुबान पर चढ़ेगा शाकाहारी मीट?
यह भी सुनें या पढ़ें :
सात्विक भोजन पर क्यों हो रही बहस?

इंसानों के खानपान का इतिहास काफी दिलचस्प है। शुरुआती दौर में आदिमानव जंगली जानवरों का शिकार करता और उनके मांस को कच्चा ही खाता। फिर उसका वास्ता आग और मसालों से पड़ा, तो वह मांस को भूनने और पकाने भी लगा। फिर इंसानी सभ्यता परवान चढ़ी। खाने लायक जानवरों को पाला जाने लगा। फल-फूल और साग-सब्जियां भी उगाई जाने लगीं। अब इंसानी खुराक का सफर पालतू जानवरों, फल-फूल और साग-सब्जियों से होता हुआ कीड़ों तक जाने वाला है। वैसे भारत समेत दुनिया के कई देशों में कीड़े खाने की पुरानी रवायत है, लेकिन आने वाले वक़्त में कीड़ों का बाज़ार काफी बड़ा बन सकता है। चीन और यूरोपीय देशों में तो कई बड़े रेस्तरां कीड़े-मकोड़ों से बने पकवान परोसते हैं। वहां यह अच्छे-खासे कारोबार की शक्ल भी अख्तियार कर रहा है।

कीड़ों के बारे में अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट (ATREE) ने एक दिलचस्प स्टडी की है। यह स्टडी बताती है कि इंसान ऐतिहासिक रूप से कीटभक्षी (entomophagous) रहे हैं। ट्रस्ट की एक रिसर्च टीम ने इंसानों के खाने के लिए झींगुर (Cricksts) से बनी एक चॉकलेट चिप कुकीज भी तैयार की है। उनका इरादा है कि कीड़े-मकोड़े भी बकरे और मुर्गों की तरह इंसानों की थाली का हिस्सा बने। इस स्टडी से पता चलता है कि आगे चलकर वैश्विक खाद्य सुरक्षा एक बड़ी चुनौती होगी।

दुनिया में खाने-पीने का संकट किस कदर गहरा सकता है, इसकी झलक रूस-यूक्रेन युद्ध के दरम्यान भी दिखी। इस युद्ध के चलते कई देशों में खाने का गंभीर संकट पैदा हो गया। दोनों देश मिलकर दुनिया को करीब एक तिहाई गेहूं बेचते हैं। लेकिन, जब जंग के चलते आपूर्ति बाधित हुई, तो गेहूं की क़ीमतों में तगड़ा उछाल आया। एक वक़्त तो दाम करीब दोगुना हो गया था। हालांकि, बाद में इसमें सुधार आया। अभी वैश्विक आबादी करीब 8 अरब है। अगर इस सूरत में एक युद्ध से खाद्य संकट की आशंका बन जाती है, तो अगले 30 वर्षों में जब जनसंख्या 9 अरब के पार पहुंची जाएगी, तो जाहिर तौर पर खाने-पीने की समस्या और भी गहरी हो जाएगी।

Cricket Chocolate Chip Cookie

यही वजह है कि दुनियाभर के साइंटिस्ट खाने-पीने के क्षेत्र में लगातार नए प्रयोग कर रहे हैं। अशोका ट्रस्ट की रिसर्च भी इसी दिशा में एक नई पहल है। इसके वैज्ञानिकों का कहना है कि जनसंख्या 9 अरब होने के बाद प्रोटीन स्रोत की भारी कमी हो जाएगी। उस वक़्त कीड़े प्रोटीन का अच्छा जरिया बन सकते हैं, जो आसानी से मिल भी जाएंगे। ऐसा नहीं है कि कीड़े-मकोड़े खाना कोई नई बात है। यह डेढ़ सौ देशों में करीब 2 अरब लोगों के आहार का हिस्सा है। कीड़े-मकोड़ों की करीब 14 सौ ऐसी प्रजातियां हैं, जिन्हें इंसान खा सकते हैं।

भारत की बात करें, तो यहां कई आदिवासी समुदाय कीड़ों की 3 सौ से अधिक प्रजातियां खाते हैं। ये लोकल मार्केट में 5 सौ से लेकर 1 हज़ार रुपये प्रति किलो तक बिकते हैं। क़ीमत साइज, क्वॉलिटी और वैरायटी के हिसाब से तय होती है। कर्नाटक, ओडिशा, असम और नगालैंड जैसे राज्यों की कई जनजातियां कीड़ों को बड़े चाव से खाती हैं।

कर्नाटक के तुमकुरु क्षेत्र में कुछ समुदाय 'दीमक की खेती' करते हैं। वे दीमक के टीलों में पानी भरकर उन्हें कपड़ों से सील कर देते हैं। फिर मरे हुए कीड़ों को इकट्ठा करके तला जाता है और उनकी दावत दी जाती है। यहां कमजोर बच्चों को रानी दीमक ज़िंदा खिलाने का भी चलन है। मलनाड क्षेत्र में कुछ बुनकर चींटियों की चटनी भी बनाते हैं। मध्य प्रदेश में मुरिया जनजाति चिनकारा प्रजाति की चीटियों का लार्वा खाती है। लेकिन, कीड़ों के सबसे ज्यादा शौकीन मिलते हैं उत्तर-पूर्वी राज्यों में। अकेले अरुणाचल प्रदेश में ही लोग करीब 160 प्रजातियों को खा जाते हैं।

दूसरे देशों की बात करें, तो अफ्रीका में कैटरपिलर और टिड्डी को शौक से खाया जाता है। जापानी लोग ततैयों को चाव से खाते हैं। वहीं चीन और थाईलैंड में कीट-पतंगों को खाने का चलन रहा है। यूरोप में कीड़े-मकोड़े खाने के चलन ने साल 2001 से जोर पकड़ा। दरअसल, उस वक़्त वहां मवेशियों में एक बीमारी फैली थी- 'मैड काऊ डिसीज।'

Insects are eaten in many countries

यह बीमार जानवरों के मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डियां पर घातक चोट करती। इंसानों को इस बीमारी से बचाने के लिए यूरोप में प्रोसेस्ड एनिमल मीट पर पाबंदी लग गई। ऐसे में मांसाहार के शौकीनों ने कीड़े से बने पकवानों को आजमाया और उन्हें नई खुराक पसंद भी आई। अब यूरोप में कीट कंपनियां कीड़ों को खानपान की मुख्यधारा में लाने के लिए जी-जान से जुटी हैं।

कुछ रिसर्च बताती हैं कि कीड़ों की उपयोगिता पेट भरने से कहीं ज़्यादा हो सकती है। ये ग्रोथ रेट और इम्यून सिस्टम को भी मजबूत कर सकते हैं। सबसे बड़ी बात कि इनसे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना प्रोटीन की ज़रूरत पूरी हो सकती है। यूरोपियन फूड सेफ्टी एजेंसी भी कीड़ों की तीन प्रजातियों को इंसानी खाने के लिहाज से सुरक्षित बता चुकी है। इनमें पीला मीलवार्म, टिड्डियां और घरेलू झींगुर शामिल हैं।

अगर आबादी का बड़ा हिस्सा कीड़ों को आहार के रूप में अपना लेता है, तो जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी काफी फायदा होगा। इसमें ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की क्षमता भी है। क्लाइमेट चेंज पर संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट बताती है कि जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार कार्बन डाईऑक्साइड को कम करने के लिए मांसाहार से शाकाहार की ओर जाना होगा। ऐसे में मांसाहारियों के लिए कीड़े मीट का अच्छा विकल्प हो सकते हैं और ये पर्यावरण के अनुकूल भी हैं।

फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट भी अशोका ट्रस्ट की बात का समर्थन करती है। इसके मुताबिक, अगले तीन दशक में दुनिया की आबादी 9 अरब होने के बाद कीड़े खाद्य सुरक्षा मुहैया कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। अगर झींगुर वाली चोकोचिप कुकीज की बात करें, तो इसे NTREE के सीनियर फेलो प्रियदर्शन धर्मराजन ने अपनी टीम के साथ मिलकर बनाया। यह जाहिर तौर पर एक्सपेरिमेंटल प्रॉडक्ट है, जिसका नुस्खा NTREE के बाहर एक फूड एक्सपर्ट ने सुझाया था।

Insects can make up for the lack of protein

अपने प्रॉडक्ट के बारे में धर्मराजन का कहना है, 'कुकीज बनाने के लिए हम पिछले दो साल से झींगुर जुटा रहे थे। अब चूंकि हमारा ट्रस्ट गैर-लाभकारी संगठन है, तो हम इसे बिक्री के लिए मार्केट में नहीं उतारेंगे। बस हमारा इरादा है कि लोग ऐसे खाने को गंभीरता से लें और इसके बारे में बात करें।' धर्मराजन बताते हैं कि इंसान हर साल अलग-अलग लाइफस्टाइल और खानपान के ज़रिए एक किलो कीड़े खा जाते हैं।

भारत जैसे कई देशों में किसी भी चीज़ की क़ीमत तय करती है कि उसका भविष्य क्या होगा। यह फैक्टर कीड़ों के साथ जाता है। दरअसल, बकरी, सुअर और मुर्गी जैसे जीवों को पालने के लिए काफी जगह की ज़रूरत होती है। इन्हें खिलाने-पिलाने में भी काफी पैसे लगते हैं। इसका असर क़ीमतों पर भी दिखता है। एक अनुमान के मुताबिक, अगले पांच साल में गोश्त के दाम दोगुने हो सकते हैं। वहीं, कीड़े-मकोड़ों को पालने में ज़्यादा झंझट नहीं। वे कम पानी और कम खुराक में जल्दी तैयार हो जाते हैं। इसलिए उनका भाव भी मीट के मुक़ाबले कम ही रहेगा।

वैसे वैज्ञानिक और पर्यावरण प्रेमी कीड़े-मकोड़े खाने के चाहे जितने फायदे गिनाए, लेकिन सच्चाई यही है कि भारत समेत दुनिया के कई देशों में कीड़ों को लेकर लोगों का नजरिया काफी रूढ़िवादी है। इसे बदलना एक बड़ी चुनौती होने वाली है। ब्रिटेन में हालांकि इसकी शुरुआत हो चुकी है। एक स्टडी के मुताबिक, एक तिहाई अंग्रेज़ मानते हैं कि वे साल 2029 तक कीड़े खाने लगेंगे। वैसे करीब तीन दशक पहले यूरोप में कच्ची मछली को खाना भी सही नहीं समझा जाता था। लेकिन, समय के साथ लोगों की आदतें बदलीं और अब वहां कच्ची मछली से बने सुशी जैसे पकवान को लोग बड़े चाव से खाते हैं।

फूड एक्सपर्ट मानते हैं कि अगर कीड़े खाने का चलन बढ़ाना है, तो लोगों को जागरूक करना पडे़गा। उन्हें बताना होगा कि कीड़ों को खाना इंसान और धरती की सेहत के लिए क्यों अच्छा है। इससे लोगों का कीड़ों के प्रति नज़रिया बदलेगा। फिर शायद बकरा, मुर्गा और मछलियां खाने के आदी हो चुके लोग कीड़े-मकोड़ों को भी अपनी थाली में जगह देने लगें।

आवाज़ : मोहित सिन्हा

आलेख रेट करें

आज ही न्यूजलेटर और नोटिफिकेशंस को सब्सक्राइब करें

हिन्दी हैं हम! भारत की दुनिया, दुनिया में भारत

Copyright @2022 BCCL. All Rights Reserved