यह आलेख क्यों पढ़ें?

  • महारानी विक्टोरिया और अब्दुल करीम की कहानी जानने के लिए
  • अब्दुल को महारानी हद से ज़्यादा क्यों पसंद करती थीं?
  • विक्टोरिया का अब्दुल के साथ किस तरह का रिश्ता था?
  • महारानी की मौत के बाद अब्दुल का क्या हुआ?

Queen Victoria India Abdul Karim Love Story: यह कहानी है 1880 के दशक की। तब यह कहावत हक़ीक़त हुआ करती थी कि अंग्रेज़ों के राज में कभी सूरज नहीं डूबता। उनका साम्राज्य दुनियाभर में फैला था, जिसकी बागडोर थी ब्रिटेन की राजगद्दी पर बैठीं महारानी विक्टोरिया के हाथों में। जून 1887 में उन्हें तख्तनशीं हुए 50 साल पूरे हो रहे थे। इसका जश्न मनाने के लिए ब्रिटेन में गोल्डन जुबली समारोह आयोजित हुआ। मकसद था वैश्विक शक्ति के रूप में ब्रिटेन की ताकत का अहसास कराना। इस समारोह में ब्रिटिश हुकूमत के तमाम अधिकारियों ने हिस्सा लिया और महारानी विक्टोरिया की खिदमत में महंगे उपहार पेश किए।

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जो अधिकारी व्यक्तिगत रूप से नहीं पहुंच पाए, उन्होंने भी किसी तरह से अपना उपहार विक्टोरिया तक भिजवाया। इस ख़ास मौके पर आगरा जेल के अधीक्षक ने रानी की सेवा में भारत से दो नौकर भेजे। उनके लिए ख़ास किस्म की सिल्क की वर्दियां सिलवाई गईं, ताकि वे विक्टोरिया के सेवादार बनने लायक लगें। लेकिन, महारानी ने अपनी सेवा के लिए एक ही नौकर को चुना। उसका नाम था अब्दुल करीम। अब्दुल इंग्लैंड जाने से पहले आगरा जेल में क्लर्क थे। उनकी पैदाइश झांसी की थी। उनके पिता आगरा जेल में हकीम थे। कहने का मतलब कि अब्दुल एक औसत हिंदुस्तानी परिवार से थे।

गोल्डन जुबली समारोह के बाद अब्दुल को महारानी अपने शाही महल में ले गईं। यहीं पर अब्दुल ने उन्हें पहली दफा चिकन करी बनाकर खिलाया, वह भी खालिस हिंदुस्तानी तरीके से। यहां तक कि मसाले भी सिल बट्टे पर पीसे गए। यह पकवान महारानी को इतना अच्छा लगा कि वह इसे हफ्ते में दो बार खाने लगीं। महारानी भले ही मलिका-ए-हिंदुस्तान थीं, लेकिन उन्हें कभी भारत आने का मौका नहीं मिला। उन्होंने भारत के बारे में सुन बहुत रखा था। वह इस देश को करीब से जानना चाहती थीं। मसलन- भारत में लोग सड़कों पर कैसे चलते हैं, महिलाओं का पहनावा कैसा है, खाने-पीने में लोग क्या पसंद करते हैं? और ये सब जानने का इकलौता जरिया थे अब्दुल।

Queen Victoria

लेकिन, दोनों के बीच भाषाई दीवार थी, जिसे गिराने के लिए विक्टोरिया हिंदुस्तानी ज़बान यानी हिंदी-उर्दू का मिलाजुला स्वरूप सीखने लगीं। अब्दुल अब महारानी के खानसामे से आगे बढ़कर उनके मुंशी बन गए। उनको भी अंग्रेज़ी का ट्यूशन लगवा दिया गया, ताकि दोनों की बातचीत में किसी किस्म की भाषाई बंदिश न रहे। महारानी जहां भी जातीं, अब्दुल उनके साथ होते। यहां तक कि देश-विदेश के दौरों पर भी। क्वीन विक्टोरिया का अब्दुल से लगाव काफी बढ़ गया और वह महारानी के सेक्रेटरी तक बन गए। विक्टोरिया को जब पता चला कि अब्दुल की शादी हो चुकी है, तो उन्होंने उनके परिवार को भी इंग्लैंड बुलवा लिया।

जाहिर तौर पर एक नौकर से महारानी की इतनी करीबी शाही परिवार के बाकी सदस्यों को रास नहीं आई। पति प्रिंस अलबर्ट की मौत के बाद रानी विक्टोरिया के एक नौकर, जॉन ब्राउन से 'घनिष्ठता' के काफी चर्चे थे। यहां तक कि कुछ जगहों पर उन्हें 'मिस ब्राउन' लिखा जाने लगा था। गोल्डन जुबली समारोह से करीब चार साल पहले 1883 में ब्राउन की मौत हो गई। उसकी मौत के बाद महारानी फिर ख़ुद को अकेला महसूस करने लगीं। हर कोई, यहां तक कि उनके अपने बच्चे भी उनसे महारानी की तरह पेश आते। विक्टोरिया का मन अपनेआप के लिए तरसता रहता। शायद यही वजह उन्हें अब्दुल के करीब ले गई, क्योंकि वह नौजवान महारानी के दुख-दर्द और अकेलेपन को बखूबी समझता था।

लेकिन, शाही परिवार नहीं चाहता था कि ब्राउन वाले मामले की तरह एक बार फिर राजघराने की 'बदनामी' हो। इसलिए वे लोग अब्दुल को वापस हिंदुस्तान भेजने की मांग करने लगे। हालात यहां तक पहुंच गए कि पूरे राजमहल ने करीम के ख़िलाफ़ हड़ताल करने की धमकी दे दी। उन्होंने यह भी कहा कि अगर अब्दुल को महारानी अपने साथ यूरोप के दौरे पर ले गईं, तो वे सब सामूहिक इस्तीफा देकर विक्टोरिया को 'पागल' घोषित कर देंगे। महारानी को जब इसका पता चला, तो वह आगबबूला हो गईं। उन्होंने सबको बुलाया और कहा कि जो भी इस्तीफा देना चाहता है, वह आगे आए। लेकिन, कोई आगे नहीं बढ़ा। रानी विक्टोरिया ने यह तक कह दिया कि शाही परिवार के लोग नस्लभेद के चलते अब्दुल से चिढ़ते हैं। उन्होंने गुस्से में अपने मेज पर रखी हर चीज़ ज़मीन पर फेंक दी। वह अब्दुल को अपने साथ यूरोप ले गईं और किसी की भी इस्तीफा देने की हिम्मत नहीं हुई।

Victoria and Abdul

अपने परिवार की लाख बगावत के बावजूद अब्दुल के प्रति महारानी का लगाव रत्तीभर कम नहीं हुआ। उलटा वह बढ़ता ही गया। एक बार जब अब्दुल बीमार पड़े, तो वह सारे प्रोटोकॉल तोड़कर उन्हें देखने पहुंच गईं। जब अब्दुल की तबीयत ज़्यादा ख़राब हुई और उनका बिस्तर से उठना मुश्किल हो गया, तो महारानी उन्हें दो बार देखने जाने लगीं। वह अपना बस्ता भी साथ ले जाती थीं ताकि करीम उन्हें लेटे-लेटे ही उर्दू पढ़ा सकें। अब्दुल का इलाज रानी के डॉक्टर जेम्स रीड ही कर रहे थे। उनका कहना था कि उन्होंने एकाध बार तो विक्टोरिया को अब्दुल का तकिया ठीक करते हुए भी देखा। अब्दुल की बीवी से भी महारानी की खूब जमती। दोनों घंटों बात करतीं। विक्टोरिया की दिली ख्वाहिश थी अब्दुल के परिवार के साथ भारत जाकर आम खाने की।

लेकिन, महारानी की यह ख्वाहिश अधूरी ही रही, क्योंकि वह भी अचानक काफी बीमार हो गईं। उन्हें पता था कि उनकी मौत के बाद अब्दुल के साथ अच्छा सलूक नहीं होगा। यही वजह है कि उन्होंने भारत के वायसराय से कहकर अब्दुल को आगरा में 300 एकड़ की जागीर दिलवाई। उन्होंने अब्दुल से यह भी कहा कि अब उसका वापस भारत चले जाना ही बेहतर होगा। लेकिन, अब्दुल को यह गवारा न हुआ कि वह महारानी को ऐसी हालत में छोड़कर जाएं। साल 1901 में महारानी का देहांत हो गया। विक्टोरिया के बेटे किंग एडवर्ड सप्तम ने अब्दुल को रानी के शयनकक्ष में दाखिल हो श्रद्धांजलि देने की इजाज़त दी। उनके पार्थिव शरीर को एकांत में देखने वाले अब्दुल अंतिम शख़्स थे। यही महारानी की इच्छा भी थी।

Abdul Karim

लेकिन, महारानी के गुजरने के साथ ही अब्दुल के बुरे दिन भी शुरू हो गए, जैसी आशंका उन्होंने जताई भी थी। उनके घर पर सरकारी छापा पड़ा। उनसे कहा गया कि वह हर उस पत्र को किंग एडवर्ड के हवाले कर दें, जो रानी ने उन्हें लिखे थे। फिर उनके सामने उन सारे पत्रों को जलाकर राख कर दिया गया। उन्हें सबके सामने जलील किया गया। उनसे कहा गया कि वह फौरन इंग्लैंड छोड़कर वापस हिंदुस्तान लौट जाएं। अब्दुल का भी अब उस मुल्क में ऐसा कोई अपना नहीं था, जिसके लिए वह वहां रुकते। उन्होंने वापस आकर महारानी की दी गई ज़मीन के सहारे गुजारा किया। आठ साल बाद उनका भी देहांत हो गया। उस वक़्त उनकी उम्र सिर्फ 46 बरस थी।

अब सवाल उठता है कि महारानी के साथ अब्दुल का 'रिश्ता' क्या था? इस बारे में शाही राजघराने से जुड़े लोग कई तरह की बातें कहते थे। उनका दावा था कि महारानी एक बार अब्दुल को अकेले एक हाईलैंड के कॉटेज में ले गई थीं। उन्होंने अब्दुल को किसिंग सिंबल वाला खत भी लिखा, जो उस जमाने में काफी असामान्य बात थी। लेकिन, महारानी के जितने भी लेटर मिले, उसमें वह ख़ुद को 'तुम्हारी प्यारी मां' या 'तुम्हारी सबसे करीबी दोस्त' लिखा करती थीं। जाहिर तौर पर यह भावनात्मक रिश्ता था, जो कई परतों में था। उनकी उम्र मां-बेटे जैसी ही थी। लेकिन, एक-दूसरे का दुख-दर्द समझने की वजह से वे अच्छे दोस्त भी थे।

जब महारानी के पति प्रिंस अलबर्ट की मौत हुई, तो उन्होंने कहा था, 'वह मेरे सबसे अजीज दोस्त थे, जिन्होंने माता-पिता की तरह मेरा ख्याल रखा।' शायद महारानी और अब्दुल का रिश्ता भी कुछ इसी तरह का था।

आवाज़ : अरुण कुमार

Web Title:

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(Hindi podcast on Navbharat Gold)

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