यह आलेख क्यों पढ़ें?

  • एचपीवी वैक्सीन और सर्विकल कैंसर के बारे में जानने के लिए
  • भारत में लोग एचपीवी वैक्सीन के बारे में बात क्यों नहीं करते हैं?
  • एचपीवी वैक्सीन के बारे में किस तरह की गलत धारणाएं हैं?
  • सस्ती एचपीवी वैक्सीन बनने से लगवाने वालों की संख्या बढे़गी?

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कुछ महीने पहले एक फेसबुक पैरेंटिंग ग्रुप के सदस्य ह्यूमन पैपिलोमा वायरस यानी एचपीवी की वैक्सीन की जरूरत पर चर्चा कर रहे थे। यह वैक्सीन सेक्शुअल कॉन्टैक्ट से फैलने वाले एचपीवी से बचाती है, जो अक्सर सर्विकल कैंसर का कारण बनता है। एक इंजीनियरिंग ग्रैजुएट लड़की ने कहा कि अगर उसने इस वैक्सीन की खबर अपनी फैमिली के साथ शेयर की, तो लोग उसके बारे में न जाने क्या सोचेंगे। इसी दौरान एक महिला ने पूरे आत्मविश्वास के साथ ऐलान किया कि अगर कोई अपने जीवनसाथी के प्रति वफादार है, तो उसके एचपीवी का शिकार होने की गुंजाइश 'शून्य प्रतिशत' है।

इस बातचीत से पता चलता है कि भारत में एचपीवी वैक्सीन के बारे में लोगों की समझ कितनी कम है और इससे कितने मिथक जुड़े हैं। एचपीवी यौन संबंधों के जरिए फैलता है, लिहाजा लोग इसके बारे में खुलकर बात करने में घबराते हैं। भारत में रूढ़िवादी लोग यह स्वीकार नहीं करना चाहते कि किशोर उम्र के लड़के-लड़कियां भी शारीरिक संबंध बना सकते हैं। इन लोगों का यह मानना भी गलत है कि अपने जीवनसाथी से वफादारी का मतलब है कि उन्हें एचपीवी वैक्सीन की जरूरत नहीं। इस तरह के मामले में एचपीवी का शिकार होने का खतरा कम जरूर रहता है, लेकिन फिर भी रहता तो है।

सर्विकल कैंसर (cervical cancer) अपनी तरह का इकलौता कैंसर है, जिसे काफी हद तक वैक्सीन के जरिए रोका जा सकता है। फिर भी भारत में हर साल इसके करीब 1 लाख 25 हजार नए मामले आते हैं और करीब 75 हजार लोगों को जान गंवानी पड़ती है। इसकी एक बड़ी वजह लोगों में वैक्सीन को लेकर जागरूकता की कमी है। भारत में साल 2008 से एचवीपी की दो वैक्सीनें (Gardasil और Cervarix) उपलब्ध हैं। ये एचपीवी से संक्रमित होने का खतरा काफी कम कर देती हैं। 70 प्रतिशत मामलों में एचपीवी इंफेक्शन ही सर्विकल कैंसर का कारण होता है।

hpv vaccine cervical cancer

लेकिन, हैरानी की बात है कि अभी तक देश में 1 फीसदी महिलाओं को भी यह वैक्सीन नहीं लगी है। इसकी दो बड़ी वजहें हैं। एक तो अभी बहुत से लोगों की ऐसी वैक्सीन के बारे में पता नहीं है। दूसरे, कई लोगों को लगता है कि उन्हें वैक्सीन लगवाने की जरूरत नहीं है क्योंकि वे अपने पार्टनर के प्रति वफादार हैं। ये टीके काफी महंगे भी हैं। इनकी कीमत 2 से 4 हजार रुपये प्रति डोज है। 9 से 15 साल की लड़कियों को अमूमन दो डोज लगती है। इससे ज्यादा उम्र की लड़कियों को तीन डोज लगवाने की सलाह दी जाती है।

जाहिर तौर पर भारत जैसे देश में यह कई लोगों के लिए काफी बड़ी रकम है। पिछले दिनों सीरम इंस्टीट्यूट ने बताया कि उसने सर्विकल कैंसर की पहली स्वदेशी वैक्सीन तैयार कर ली है, जिसकी कीमत 2 से 4 सौ रुपये के बीच होगी। लेकिन, क्या किफायती होने से वैक्सीन लगवाने वालों की संख्या बढ़ जाएगी? दिल्ली सरकार के फ्री एचपीवी वैक्सीनेशन प्रोग्राम का हाल देखकर तो ऐसा नहीं लगता। इस साल फरवरी की एक रिपोर्ट बताती है कि 8 हजार से अधिक एचपीवी वैक्सीन एक्सपायर हो गईं क्योंकि लड़कियां टीका लगवाने के लिए आई ही नहीं।

CAPED इंडिया की फाउंडर मृदु गुप्ता भारत में सर्विकल कैंसर के प्रति जागरूकता बढ़ाने की दिशा में काम कर रही हैं। उनका कहना है कि एचपीवी वैक्सीन की राह में सबसे बड़ी अड़चन जागरूकता की कमी ही है। 'अगर माता-पिता एचपीवी वैक्सीनेशन की जरूरत समझेंगे, तभी वे अपनी बेटी को टीका लगवाने के लिए लाएंगे।' एचपीवी वैक्सीन लगवाने की बात छोड़ ही दें, लोग इसके बारे में बात करना भी नहीं पसंद करते, क्योंकि यह सेक्शुअल रिलेशनशिप के जरिए फैलता है।

hpv vaccine cervical cancer

मृदु का कहना है, 'इसमें दोष सिर्फ पैरेंट्स का नहीं है। सरकारी अधिकारियों, डॉक्टरों और यहां तक कि सोशल वर्कर्स में भी एचपीवी को लेकर झिझक है। ज्यादातर लोग तो सर्विकल कैंसर के बारे में बात करते वक्त 'सेक्शुअली ट्रांसमिटेड' शब्द का इस्तेमाल भी नहीं करते। ऐसे इसे लेकर जागरूकता फैलेगी भी, तो कैसे?' मृदु एचपीवी के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए स्कूलों में भी जाती हैं। लेकिन, वहां भी लोग इस बारे में बात करने में हिचकते हैं।

वह बताती हैं, 'पहले तो हमें प्रिंसिपल को समझाना पड़ता है। फिर वे हमसे लिखित में अनुरोध करने को कहते हैं। उसके बाद बच्चों के पैरेंट्स से मंजूरी मिलने का इंतजार करने को कहा जाता है क्योंकि विषय सेक्स से जुड़ा है। आखिर में सहमत होने के बाद स्कूल चाहता है कि हम लड़के और लड़कियों से अलग-अलग बात करें। हेल्थ से जुड़े मामले में भी इतनी माथापच्ची करनी पड़ती है।'

CAPED ने हाल ही में एक पुरुष सेलिब्रिटी को अपना ब्रांड एंबेसडर बनने के लिए संपर्क किया। मृदु बताती हैं, 'उनकी दो बेटियां हैं, इसलिए हमने सोचा कि वह हमारे लिए अच्छे विकल्प होंगे। लेकिन उनकी पत्नी ने हमारे प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि हमारे देश में एक ही पार्टनर रखने का रिवाज है। यहां ऐसी चीजें नहीं होतीं। मेरा तो मन किया कि पूछ लूं कि अगर ऐसा है, तो फिर हमारे देश में सर्विकल कैंसर इतनी तेजी से क्यों फैल रहा है?'

साल 2020 में CAPED ने एक सर्वे कराया था। इसमें 38 प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि उन्होंने एचपीवी वैक्सीन इसलिए नहीं लगवाई, क्योंकि उनके डॉक्टर ने इसे जरूरी नहीं बताया। असल बात तो यह है कि कई डॉक्टर अपने मरीजों को वैक्सीन के बारे में बताते ही नहीं। 28 साल की अदिति गुप्ता दिल्ली जैसे बड़े शहर में रहती हैं। वह अपने मेंस्ट्रुअल क्रैम्प्स को लेकर 20 साल की उम्र से ही दो स्त्री रोग विशेषज्ञों के पास जाती थीं, लेकिन किसी ने उन्हें एचपीवी वैक्सीन नहीं लगाई।

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जब वह अपनी मास्टर डिग्री के लिए न्यूयॉर्क जाने से पहले एक और टीका लेने के लिए बाल रोग विशेषज्ञ के पास गईं, तब जाकर उन्हें एचपीवी शॉट के बारे में पता चला। अदिति कहती हैं, 'उस वक्त मैं 26 साल की हो चुकी थी। फिर भी मैंने तुरंत वैक्सीन लगवाने का फैसला किया। काश, जब मैं छोटी थी, तो किसी डॉक्टर ने मुझे इसके बारे में बताया होता।' डॉक्टरों के मुताबिक- एचपीवी वैक्सीन सबसे ज्यादा प्रभावी 9 से 14 साल के बीच लगवाने पर होती है।

कई पैरेंट्स एचपीवी वैक्सीन के नाम से भी झिझकते हैं। लेकिन, जिन्होंने अपने घर में किसी कैंसर मरीज को देखा है, वे इसे लगवाने के लिए आगे आ रहे हैं। बड़े शहरों में 25 से 30 साल की लड़कियां जानकारी मिलने के बाद अच्छा रिस्पॉन्स दे रही हैं, लेकिन माता-पिता अभी भी अपनी कम उम्र की बच्चियों को लेकर आगे नहीं रहे। कुछ लोगों का मानना है कि इसे लगवाने के बाद बच्चियों को सेक्स की जानकारी होगी और वे बिगड़ सकती हैं।

हालांकि, पुणे की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ नीना मनसुखानी को लगता है कि अब धीरे-धीरे पैरेंट्स के रवैये में बदलाव आया है। वे स्वीकार करने लगे हैं कि शारीरिक अंतरंगता युवा पीढ़ी के लिए 'जीवन का हिस्सा' है। कोविड वायरस से बचाने में वैक्सीन ने जिस तरह से अहम भूमिका निभाई, उससे भी लोगों का टीके में भरोसा बढ़ा है।

विशेषज्ञों को उम्मीद है कि नई मेड-इन-इंडिया एचपीवी वैक्सीन से बड़ा बदलाव ला सकती है क्योंकि यह सिंगल डोज होने के साथ ही सस्ती भी है। मृदु कहती हैं, 'मुझे उम्मीद है कि इसे राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम का हिस्सा बनाया जाएगा। हमें सिक्किम से सीख लेनी चाहिए, जहां सभी किशोरियां एचपीवी वैक्सीन लगवा चुकी हैं और वे इस खतरनाक वायरस से सुरक्षित हैं।'

आवाज़ : बबीता जैन

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