यह आलेख क्यों पढ़ें?

  • क्या ख़ास है गया के पटवा टोली मोहल्ले में?
  • मुग़लों से क्या कनेक्शन है बुनकर बस्ती का?
  • बुनकरों के बीच से कैसे निकलने लगे इंजीनियर?
  • यहां के IITian को मानना पड़ता है कौन-सा नियम?

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Patwa Toli The IIT Factory: बिहार की राजधानी पटना से स्टेट हाईवे 4 पर साढ़े तीन घंटे की यात्रा के बाद आप पहुंचेंगे गया ज़िले के मानपुर ब्लॉक में। इस ब्लॉक में एक मोहल्ला है, पटवा टोली यानी बुनकरों की टोली। 12 हज़ार पॉवरलूम और 250 हैंडलूम वाले इस इलाके़ में आपकी चार पहिए की गाड़ी विशालकाय दुर्गा स्थान से आगे नहीं बढ़ सकती।

दुर्गा स्थान के आगे बहुत संकरी गलियां हैं। इनमें अगर ठीक-ठाक डील-डौल के दो लोग साथ चलें, तो पक्का है कि आपस में टकराकर गिर पड़ेंगे। 24 घंटे इन गलियों से सिर्फ एक आवाज़ निकलती सुनाई पड़ती है, खट-खट, खट-खट। किसी बाहरी व्यक्ति के लिए यह आवाज़ शोर हो सकती है, कानों को चुभने वाली, दिमाग भन्ना देने वाली। लेकिन, इन पॉवरलूम और हैंडलूम से जुड़े तकरीबन 40 हज़ार बुनकरो के लिए यही उनके जीवन का संगीत है। पतली-पतली गलियों के बीच यह शोर कभी-कभार इस कदर बढ़ जाता है कि आपस में बात करना भी मुश्किल हो जाता है।

लेकिन, इन्हीं पतली गलियों के भूगोल से परे और इसी शोर के बीच पटवा टोली की दो पहचान पूरी दुनिया में है। पहली 'बिहार का मैनचेस्टर' और दूसरा 'IITian का गांव'।

माना जाता है कि तकरीबन 400 साल पहले बुनकरों की इस बस्ती को बसाया गया। मुग़ल बादशाह अकबर के शासनकाल में राजा मानसिंह ने फल्गू नदी के तट पर स्थित विष्णुपद मंदिर के दूसरी ओर इसे बसाया था।

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पिंडदान के लिए पूरी दुनिया में मशहूर गया में पिंडदान पूजा के समय कपड़े दिए जाते है। पिंडदानियों की इसी ज़रूरत को ध्यान में रखकर पटवा समुदाय को यहां बसाया गया। चूंकि राजा मानसिंह ने इसे बसाया था, इसलिए ब्लॉक का नाम मानसिंह के सम्मान में मानपुर और बुनकरों की बस्ती का नाम पटवा टोली हो गया। 'पट' संस्कृत भाषा का शब्द है। इसका मतलब होता है कपड़ा।

बाद में जब मानसिंह जयपुर वापस जाने लगे, तो राजस्थान से आए कुछ बुनकर वापस लौट गए, लेकिन कुछ यहीं रह गए। गया में बस गए बुनकरों की पीढ़ी दर पीढ़ी ने सूती और रेशमी कपड़ों का उत्पादन किया। उनकी मेहनत ने पटवा टोली को 'बिहार के मैनचेस्टर' के तौर पर स्थापित कर दिया।

हालांकि यह समझ पाना मुश्किल था कि बुनकरी और आईआईटी का क्या रिश्ता हो सकता है? तो इसका जवाब मिलता है मंदी में। दरअसल, आज़ाद भारत के औद्योगिकीकरण में दो बातें एक साथ हो रही थीं। पहला तो यह कि मिल के कपड़ो की मांग बढ़ रही थी। लेकिन, साथ में बिहार में बढ़ रहा था बिजली का संकट। इन दोनों वजहों से काम में मंदी आने लगी और बुनकरों का यह पारंपरिक पेशा ठप पड़ने लगा। इस मंदी ने इन बुनकर परिवारों को रोज़गार का विकल्प खोजने को मजबूर किया। इन परिवारों के बच्चों ने पढ़ाई का रुख अपनाया।

1985 में ही पटवा टोली के सामुदायिक भवन में श्रीदुर्गा पुस्तकालय की स्थापना की गई, ताकि बच्चे रोज़गार के नए रास्ते तलाशें। दुर्गा पुस्तकालय खुलने के सात साल बाद यानी 1992 में बदलाव का पहला असर दिखता है।

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यही वो साल था, जब बिहार के इस पिछड़े इलाके़ के एक ग़रीब बुनकर परिवार के लड़के जितेंद्र प्रसाद ने आईआईटी का एंट्रेंस एग्जाम निकाला। जितेंद्र 1997 में 'प्राइसवाटर हाउसकूपर्स : ग्लोबल' में नौकरी के लिए न्यू जर्सी गए। इस एक चीज़ ने यहां के पढ़ने वाले छात्रों को प्रेरित किया। इसका नतीजा आया 1998 में, जब तीन लड़कों ने आईआईटी प्रवेश परीक्षा पास कर ली।

इसके बाद तो इस इलाके़ ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1999 में सात और लड़के आईआईटी पहुंच गए। साल 2000 में अपने इलाक़े के बच्चों के सपनों को रफ्तार देने के लिए जितेंद्र प्रसाद के प्रयास से ही 'नवप्रयास' नाम की संस्था बनाई गई।

यह संस्था बच्चों को ग्रुप स्टडी के लिए प्रेरित करती। उनका मार्गदर्शन करती और यह बताती कि 10वीं के बाद 11वीं की पढ़ाई के साथ-साथ योजनाबद्ध तरीके से आईआईटी की प्रवेश परीक्षा की तैयारी कैसे की जाए। इसके बाद तो ऐसे पांच स्टडी सेंटर खुल गए, जिसमें आईआईटी के पासआउट छात्र ही अपने समुदाय के बच्चों को गाइड करने लगे।

नतीजा यह हुआ कि बीते 23 साल से यहां हर साल औसतन 15 बच्चे आईआईटी की परीक्षा पास करते हैं। तकरीबन 350 बच्चे दुनिया के 12 से ज़्यादा मुल्कों में पटवा टोली का परचम लहरा रहे हैं।

गया ज़िला नक्सल प्रभावित है। साल 2006 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार यहां आए थे, बुनकरों की बिजली समस्या को लेकर। लेकिन, उसी समय यह इलाक़ा आईआईटी पास कर रहे छात्रों को लेकर चर्चा में आ गया। पहले सिर्फ बिहार में 'IITian की नर्सरी' के तौर पर पटवा टोली की पहचान बनी। फिर धीरे-धीरे हिंदुस्तान और फिर पूरी दुनिया यहां के बारे में जान गई।

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बुनकर इलाके़ की इस नई पहचान के चलते कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का ध्यान पटवा टोली की तरफ गया। परिणाम यह है कि देशभर में कई शिक्षण संस्थान यहां के छात्रों को अपने यहां मुफ्त शिक्षा देते हैं। फिलहाल पटवा टोली में 'वृक्ष - बी द चेंज' नाम की संस्था काम कर रही है। आईआईटी एंट्रेंस एग्जाम निकाल चुके पुराने छात्रों के सहयोग से चल रही यह संस्था सुबह 9 बजे से रात आठ बजे तक स्टूडेंट्स को लाइब्रेरी, क़िताबों और ऑनलाइन क्लासेज से निशुल्क जुड़ने का मौका देती है। ज़रूरत के मुताबिक हर स्टूडेंट की मेंटरशिप भी करती है। संस्था की लाइब्रेरी में किसी भी उम्र का छात्र आकर पढ़ाई कर सकता है।

साल 2020 की बात करें, तो यहां से 18 बच्चों ने आईआईटी में दाखिल पाया था। इसमें तीन लड़कियां थीं। साल 2021 में 15 बच्चों ने सफलता पायी, जिसमें एक छात्रा है। दीपा कुमार इलाके़ की पहली छात्रा थीं, जिन्होंने आईआईटी की प्रवेश परीक्षा पास की। हाल के बरसों में पटवा टोली के इन बच्चों की आंखों में इंजीनियर के अलावा बैंकर, डॉक्टर और यूपीएससी क्रैक करने के सपने भी पलने लगे हैं।

बिहार में अन्य पिछड़ी जाति से आने वाला पटवा समुदाय बहुत क्लोज्ड सोसायटी है। पूरा समाज श्रीदुर्गाजी पटवाय जाति सुधार समिति से संचालित होता है। इसका दफ्तर दुर्गा स्थान में पहली मंजिल पर है। इस जाति सुधार समिति के चलते ही किसी मकाम पर पहुंच चुके समाज के स्टूडेंट्स, तैयारी कर रहे दूसरे बच्चों की आर्थिक, शैक्षणिक मदद करते हैं। लेकिन, इस समिति ने उन्हें बांध भी रखा है। बुनकर परिवारों से निकलने वाले आईआईटीयन अपने जीवन के व्यक्तिगत फैसले लेने के लिए आज़ाद नहीं।

दरअसल इस समाज में शादी को लेकर ख़ास नियम है। यहां अब भी पटवा समाज से बाहर शादी कर लेने पर 'समाज से बाहर' किए जाने का चलन है। समाज से बाहर किए जाने का मतलब है शादी करने वाले परिवारों के साथ खाना-पीना और किसी भी तरह का रिश्ता ख़त्म। आलम यह है कि पटवा टोली से सबसे पहले डॉक्टर बने सीताराम प्रसाद को समाज से बाहर शादी करने के चलते कई बरसों तक समाज से बाहर कर दिया गया था।

आवाज़ : रोहित उपाध्याय
*ये लेखक के निजी विचार हैं

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