यह आलेख क्यों पढ़ें?

  • भारत में हेल्थकेयर सेक्टर का हाल जानने के लिए
  • क्या सभी लोगों को मुफ्त इलाज दिया जा सकता है?
  • सबके मुफ्त इलाज देने के लिए पैसे कहां से आएंगे?
  • इसके लिए कोई कारगर सिस्टम बनाया जा सकता है?

Problem in Regulate to Free Health Care Policy in India: भारत का हेल्थकेयर सिस्टम दुनिया के कई देशों के मुकाबले सस्ता है, लेकिन फिर भी यह आबादी के एक बड़े हिस्से लिए किफायती नहीं है। आप ग़रीब तबके को छोड़ ही दीजिए, अगर 30-50 हज़ार रुपये महीना कमाने वाले को भी अपने किसी परिजन को आईसीयू में एडमिट कराना पड़ गया, तो वह उसका खर्चा नहीं उठा पाएगा। ऐसे में सवाल उठता है कि जनता को अच्छा और किफायती इलाज कैसे मिल सकता है? जवाब है- जनता की मदद से।

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भारत ने बेशक हेल्थ सेक्टर में काफी अच्छा काम किया है। पिछले सिर्फ सात बरसों में अंडर-ग्रेजुएशन और पीजी की सीटें दोगुनी हो गईं। यह मेडिकल एजुकेशन के क्षेत्र में बेहतरीन बदलाव है। लेकिन, अभी हमें लंबा सफर तय करना है। ख़ासकर, जनता के लिए अच्छी क्वॉलिटी की मेडिकल सुविधा कम क़ीमत में उपलब्ध कराने के मामले में। अभी क्या होता है कि अगर लागत कम करवाने पर जोर दिया जाता है, तो क्वॉलिटी से समझौता हो जाता है। इस समस्या को एक ही सूरत में दूर में किया जा सकता है- फाइनैंशल इंटरमीडियटरी बनाकर। आप उसे हेल्थ इंश्योरेंस, हेल्थ स्कीम, कुछ भी कह लीजिए।

इसमें सभी सिटिजन हर महीने एक मामूली रकम जमा करेंगे। इसका फायदा उन्हें किफायती इलाज के रूप में मिलेगा। इस चीज़ को एक उदाहरण से समझते हैं। हमारे देश में करीब 90 करोड़ मोबाइल सब्सक्राइबर्स हैं। इनमें से कम से कम 50 करोड़ लोग हर महीने 300 से 500 रुपये का रिचार्ज कराते हैं, बात करने या फिर फिल्म देखने जैसे कामों के लिए। अगर हर महीने एक मोबाइल यूजर से 50 रुपये लिया जाए, तो एक महीने में करीब ढाई हज़ार करोड़ रुपये इकट्ठा हो जाएंगे। फिर इसका इस्तेमाल लोगों के मुफ्त इलाज के लिए बड़े आराम से किया जा सकता है।

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इस तरह से पैसे जुटाने की ज़रूरत इसलिए भी है, क्योंकि आज भी ज़्यादातर लोग इंश्योरेंस की अहमियत नहीं समझते, ख़ासकर ग्रामीण इलाक़ों में। मैं करीब 17 साल पहले कर्नाटक गया था, स्टेट कोऑपरेटिव सोसायटी की यशस्वनी हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम लॉन्च करने। इसके प्रचार-प्रसार के लिए मुझे पूरे राज्य में घूमना पड़ा। मैं एक गांव में पहुंचा। शाम का वक़्त था और किसानों की चौपाल लगी थी। मैंने उन्हें माइक्रो हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम के बारे में समझाने की कोशिश की। मैंने उनसे कहा, 'इस स्कीम में आपको हर महीने 5 रुपये जमा करने पड़ेंगे। फिर अगर कभी आप बीमार होते हैं, आपको हार्ट ऑपरेशन, ब्रेन ऑपरेशन या किसी तरह की सर्जरी की ज़रूरत पड़ती है, तो वह बिल्कुल मुफ्त होगा।'

मैंने उन्हें एकदम उदाहरण के साथ समझाया कि इस स्कीम का खर्च आपकी बीड़ी के एक बंडल के बराबर है। तभी एक किसान ने उठकर कहा, 'अगर मैं हर महीने 5 रुपये जमा करता हूं और सालभर में मुझे किसी तरह का ऑपरेशन कराने की ज़रूरत नहीं पड़ती, तो क्या साल के आखिर में आप मेरे पैसे वापस लौटा देंगे?' यह बात उस एक किसान या एक गांव की नहीं है, भारत में अधिकतर लोग इंश्योरेंस के बारे में यही सोचते हैं, फिर चाहे वह हेल्थ इंश्योरेंस या फिर गाड़ी का। यही वजह है कि मैं उनसे मोबाइल रिचार्ज के ज़रिए पैसा जुटाने के लिए कह रहा हूं, क्योंकि मैं उनके बिहेवियर को समझता हूं।

अगर आप उनसे कहेंगे कि हेल्थकेयर के लिए 5 रुपये दीजिए, तो वे नहीं देंगे। लेकिन, यही पैसा किसी दूसरे के लिए देने को कहेंगे, तो वे मान जाएंगे। मैंने यह चीज़ कुछ जगहों पर आजमाई भी। मैंने किसानों से कहा कि कोऑपरेटिव सोसायटी दूध के बदले आपको हर महीने जो पैसा देती है, अब वह उसमें पांच रुपये काटकर देगी, तो वे कहने लगे कि हां काट लीजिए, कोई दिक्कत नहीं है। इस तरह की सोच वाले देश में अगर कामकाजी वर्ग और ग़रीब तबके को हेल्थ इंश्योरेंस के दायरे में लाना है, तो उनसे मोबाइल, इलेक्ट्रिसिटी या फिर वाटर बिल के ज़रिए ही पैसा वसूलना होगा। अब तो बिल कलेक्शन डिजिटल तरीके से होता है यानी सरकार को पैसे जुटाने के लिए अलग भर्तियां भी नहीं निकालनी पड़ेगी। बस जो बिल वसूली जा रही है, उसमें 5 रुपये और जोड़ना होगा।

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अगर भारत ऐसा करने में सफल रहता है, तो इसमें कोई शक नहीं कि हमारी हेल्थ सर्विस आला दर्जे की हो जाएगी। फिर हम दुनिया के सामने साबित कर सकते हैं कि किसी मुल्क की अमीरी-ग़रीबी का उसके हेल्थकेयर सर्विस की क्वॉलिटी से कोई लेनादेना नहीं होता। एक विकासशील देश भी अपने नागरिकों को विकसित देशों से बेहतर स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध करा सकता है। और सबसे बड़ी बात है कि ऐसा करने में भारत को बमुश्किल 5 से 10 साल लगेंगे। जनता को महंगे इलाज से बचाने का यही सबसे कारगर रास्ता है। ऐसा नहीं है कि भारत जब विकसित हो जाएगा, तो स्वास्थ्य सेवाएं किफायती हो जाएंगी। तब भी आबादी का एक बड़ा हिस्सा ऐसा रहेगा, जो भारी-भरकम मेडिकल खर्च के सामने बेबस नज़र आएगा। कई विकसित देश इसकी मिसाल हैं।

अब कहा जा सकता है कि हमारे देश में पहले से ही आयुष्मान भारत जैसी योजना चल रही है, जो ग़रीबों का मुफ्त में करती है। फिर किसी दूसरी हेल्थ स्कीम की क्या ज़रूरत है। आयुष्मान भारत बेशक बेहतरीन स्कीम है और यह अच्छे से काम भी कर रही है। लेकिन, इसमें एक बंदिश है। यह सिर्फ बीपीएल कार्डधारकों यानी ग़रीबी रेखा से नीचे वालों के लिए है। 30-40 हज़ार रुपये महीना कमाने वाला मिडल क्लास इसके दायरे में नहीं आता। अगर मिडल क्लास वाले शख़्स को कोई बड़ा ऑपरेशन या सर्जरी करानी पड़ गई, तो उसका घर बिकने की नौबत आ जाएगी। यह वर्ग उतना ग़रीब भी नहीं है। अगर आप अच्छी क्वॉलिटी की सर्विस के बदले उनसे हर महीने 50-100 रुपये देने को कहेंगे, तो वो खुशी-खुशी दे देंगे।

लेकिन, अफसोस की बात है कि हमारे पास ऐसा कोई फाइनैंशल सिस्टम ही नहीं है, जहां लोग स्वास्थ्य सेवाओं के लिए कंट्रीब्यूट कर सकें। अगर हेल्थकेयर सेक्टर में क्रांतिकारी बदलाव लाना है, तो फिर ऐसा सिस्टम बनाना पड़ेगा। यह हेल्थ इंश्योरेंस की तरह सालाना नहीं, बल्कि मंथली बेसिस पर होना चाहिए। इससे लोगों को यह रकम बोझ भी नहीं लगेगी। इसमें सरकार को री-इंश्योरर बनना चाहिए। मान लीजिए, किसी साल प्रोजेक्ट के लिए पैसा कम पड़ गया, तो उसे पूरा करने का जिम्मा सरकार पर रहेगा।

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यह सिस्टम जनता और सरकार, दोनों के लिए फायदेमंद होगा। आजकल फ्रीबीज पर काफी बहस हो रही है। कुछ लोग हेल्थकेयर सर्विसेज को मुफ्त करने की मांग भी कर रहे हैं। लेकिन, आर्थिक तौर पर इसे सबसे लिए मुफ्त करना मुमकिन नहीं। दूसरी तरह के भी नुकसान हैं। आप कर्नाटक की यशस्वनी इंश्योरेंस स्कीम को ही लें, तो उसमें 5 रुपये देना पड़ता था। अगर कोई किसी योजना में हर महीने कंट्रीब्यूट करता है, भले ही वह रकम 5 रुपये हो, तो वह उसके लिए लड़ सकता है। वह पूरे हक के साथ कह सकता है कि मैंने इस स्कीम के लिए पैसे दिए हैं, तो मुझे इसका फायदा मिलना चाहिए। लेकिन, सुविधा मुफ्त रहेगी, तो उसे देने वाले के ऊपर कोई दबाव नहीं रहेगा। उसके व्यवहार में वह गंभीरता नहीं दिखेगी। मरीज भी अपने हक के लिए उस मजबूती से नहीं लड़ पाएगा, क्योंकि उसे भी लगेगा कि मैं इस सुविधा के लिए कोई शुल्क नहीं दे रहा हूं।

दूसरी दिक्कत पैसों से जुड़ी है। फ्री हेल्थकेयर का सिस्टम उन्हीं देशों में चल सकता है, जिनके पास काफी बड़ा टैक्सबेस होगा। इस सूरत में टैक्स से होने वाली आमदनी से मुफ्त हेल्थकेयर का खर्च निकल जाएगा। मिसाल के लिए आप इंग्लैंड को लीजिए। चाहे आप करोड़पति हों या फिर मामूली मज़दूर, आपका इलाज एक ही वॉर्ड में होगा। वहां रईसों को कोई वीआईपी ट्रीटमेंट नहीं दिया जाता। किसी को पैसे भी नहीं पड़ते। नैशनल हेल्थ सर्विस के किसी अस्पताल में कैश काउंटर तक नहीं होता। वहां हर कोई फ्री हेल्थ स्कीम के दायरे में आता है और उनका सिस्टम काफी अच्छे से काम कर रहा है। लेकिन, अब वहां भी फाइनैंस की दिक्कत आ रही है। लोगों की औसत आयु बढ़ रही है और टैक्स बेस घट रहा है।

ऐसे में जितने भी फ्री हेल्थकेयर वाले देश हैं, वे अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार कर रहे हैं। अगर भारत की बात करें, तो यहां लोग मोबाइल सर्विस के लिए पैसे देते हैं, एंटरटेनमेंट के लिए पैसे देते हैं और अगर उन्हें अच्छी क्वॉलिटी की सर्विस मिलेगी, तो वह हेल्थकेयर के लिए पैसे देने में नहीं हिचकेंगे। आदर्श स्थिति में तो सरकार को सभी को फ्री हेल्थकेयर देना चाहिए। लेकिन, भारत जैसे मुल्क में टैक्स देने वालों की तादाद डबल डिजिट में भी नहीं होगी, तो हमारी अर्थव्यवस्था फ्री हेल्थकेयर का बोझ नहीं उठा पाएगी। ऐसे में हम सभी लोगों को साथ लाकर सेल्फ फंडिंग हेल्थकेयर टाइप स्कीम ला सकते हैं, जो काफी अच्छा काम करेगी।
(इस आर्टिकल के दूसरे हिस्से में डॉक्टर देवी प्रसाद शेट्टी बताएंगे फिट रहने के फंडे)

(नवभारत टाइम्स के वरिष्ठ पत्रकारों के साथ बातचीत पर आधारित)
आवाज़ : मोहित सिन्हा
*ये लेखक के निजी विचार हैं

Web Title:

भारत में स्वास्थ्य देखभाल | Should all citizens get free healthcare in India? | Free Health Care Podcast in Hindi | Healthcare in India | Healthcare System in India | access to healthcare in India

(Hindi podcast on Navbharat Gold)

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