यह आलेख क्यों पढ़ें?

  • क्या ये ठग अंग्रेज़ों से बचाते थे क्रांतिकारियों को?
  • ठगों के अद्भुत कारनामे जानने के लिए
  • अंग्रज़ों से कैसे लड़ते थे और कैसे लोगों को लूटते थे?
  • नटवरलाल का क्या कनेक्शन था इन ठगों से?

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यूपी के इटावा ज़िले की चकरनगर तहसील का गांव सिंडौस। आज सब गांवों की तरह सामान्य-सा दिखता है, पर अंग्रेज़ों के जमाने में इसकी सूरत-सीरत कुछ और ही थी। पूरे गांव में ठग बसा करते थे और यह ठगों के गांव के नाम से मशहूर था। अपनी करतूतों से गांव के माथे पर तमाम कलंक लगाने वाले ठगों में एक ख़ासियत भी थी। वह थी, उनके भीतर कूट-कूटकर भरा देशभक्ति का जज्बा। यही एक जज्बा ऐसा है, जिसके कारण लोग आज उन्हें ठगी के लिए कम, उनकी देशभक्ति के लिए ज़्यादा याद करते हैं। उनकी ठग विद्या भी कमाल की थी, जिसके आगे ख़ुद को बड़ा बुद्धिमान समझने वाले अंग्रेज़ भी झूल जाते थे।

आपको शोले फिल्म के जय-वीरू (अमिताभ बच्चन-धर्मेंद्र) तो याद होंगे ही। दुनियाभर में उठाईगीरी करने वाले जय-वीरू में हिम्मत, ताकत, बहादुरी थी, जिसे फिल्म के ठाकुर (संजीव कुमार) ने पहचाना और उनकी इन्हीं ख़ासियतों का डाकू गब्बर सिंह (अमजद खान) के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया। ठगों के अंदर भी यही गुण थे और इन्हें पहचाना राजा रूप सिंह और राजा निरंजन सिंह ने, जो इटावा से सटे चंबल के बीहड़ों में रहकर अंग्रेज़ों से गुरिल्ला युद्ध लड़ा करते थे। इनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलते थे।

Thugs Of Hidustan

अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ ज़्यादातर रणनीति ये ठग ही बनाते थे। ठगों के दिमाग़ के आगे अंग्रेज़ भी पानी मांगते। सब जानते थे कि विद्रोही राजाओं की मदद ठग कर रहे हैं। उन्हें गांव में शरण दे रहे हैं। बीहड़ों में खाना पहुंचा रहे हैं, पर क्या मजाल कि कभी कोई अंग्रेज़ इन क्रांतिकारियों की छाया भी छू सका हो। इसके पीछे काम करती थी ठगों की ठग विद्या। ठगों की एक ख़ास बात यह भी थी कि उन्होंने कभी अपने ज़िले में जालबट्टा नहीं फैलाया। ठगी के लिए वे ग्वालियर, मध्य प्रदेश, राजस्थान के दूरदराज इलाक़ों में निकलते थे। इसका एक फायदा यह भी मिलता था कि वे भ्रमण के दौरान अंग्रेज़ों की जासूसी भी कर लिया करते थे, जिसके सहारे वे क्रांतिकारियों को बचा भी पता थे।

क्रांतिकारियों को अंग्रेज़ों से बचाने के लिए ठगों ने अपने गांव के बाहर चारों दिशाओं में चार अड्डियां बना रखी थीं। इन अड्डियों पर ठगों के ख़ास 'सिपाही' चौबीस घंटे पहरा दिया करते। ख़तरा भांपकर ये इशारा करते थे और क्रांतिकारी सुरक्षित रास्ते से बीहड़ों या दूरदराज के इलाक़ों में निकल जाते। इन खूबियों पर फिल्म के डायरेक्टर ने तो जय-बीरू को हीरो बना दिया, पर आज़ादी के बाद इन ठगों को बिसरा दिया गया। इतिहास के पन्नों में जगह मिलना तो दूर, शाबाशी के तौर पर किसी ने छोटा-सा इनाम देना तक गंवारा न किया। शायद इसके पीछे का कारण रहा हो इनके जीवन से जुड़ा ठगी का पन्ना। लेकिन, गांव के बुजुर्ग आज भी इनकी ठगी को नहीं, इनकी देशभक्ति को याद करते हैं।

Thugs Of Hidustan

गांव के विरुद्ध सिंह कहते हैं, 'ठगों के किस्से हमारे बुजुर्ग हमको बचपन में सुनाया करते थे। इस गांव के ठग देश दुनिया के सबसे होशियार ठग थे।'

बनवारी लाल बताते हैं कि ठगों के जाने के बाद ही हम लोग इस गांव में बसे। ठगों के रीत-रिवाज बिल्कुल अलग थे। उस समय उनकी पहचान ठगों के रूप में नहीं, बल्कि क्रांतिकारियों के शरणदाताओं के रूप में थी।

अनुरूप सिंह कहते हैं, 'हम लोगों ने देखा तो नहीं पर सुना ज़रूर है कि बरसों पहले हमारा गांव ठगों का अड्डा था, जो क्रांतिकारियों की मदद किया करते थे।'

महावीर सिंह बताते हैं, 'गांव के ठगों की कहानी तो हमने भी अपने पुरखों से सुनी है। यहां के ठग ज़्यादातर ग्वालियर में जाकर बड़े पैमाने पर ठगी करते। कुख्यात ठग मिथिलेश श्रीवास्तव उर्फ नटवरलाल ने यहां ट्रेनिंग ली थी। इसी के बाद उसने साथियों के संग ग्वालियर में एक सुनार के यहां लाखों की ठगी की। सुनार दो नंबर का व्यापारी होने के कारण क़ानूनी कार्रवाई नहीं कर सका था। इसी के बाद नटवरलाल कानपुर और उसके आसपास के इलाक़ों में सक्रिय हुआ था। नटवरलाल के अलावा भी दूरदराज के ठग यहां ट्रेनिंग लेने आया करते थे। ट्रेनिंग के बाद यहां के उस्ताद उनसे छोटी-मोटी ठगी कराके उन्हें परखते थे। पूरी तरह ट्रेंड हो जाने के बाद ही वे नए ठग अपने-अपने इलाक़ों की ओर निकलते।

Thugs Of Hidustan

ग्राम प्रधान सज्जन सिंह राजावत बताते हैं, 'ठग ऑफ हिंदुस्तान मिस्टर नटवरलाल उर्फ मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव ने कोलकाता में ठगी के बाद हमारे गांव में शरण ली थी। यहीं से निकलकर उसने ग्वालियर में सुनार के यहां ठगी की थी।'

ग्राम प्रधान के मुताबिक, 'आज़ादी के बाद हमारे गांव के ठगों को परिहार ठाकुरों ने खदेड़ा, तो वे परिवार के साथ मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ की ओर चले गए। इसके बाद उनका कुछ पता नहीं चला। परिहारों ने कुछ दिनों बाद अपने रिश्तेदार कछवाहे ठाकुरों को गांव में बसाया, जो आज भी हैं। ठगों के अलावा हमारे गांव के लोग भी क्रांतिकारी राजाओं की मदद किया करते थे, लेकिन आज़ादी की लड़ाई में उनके योगदान की कहीं कोई चर्चा नहीं होती।'

आवाज़ : सरोज

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